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चाहे मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ही मामला क्यों न हो, तभी भी वही लेंगे फैसला: सुप्रीम कोर्ट

Wed, 15 Nov 2017 09:24 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो/नई दिल्ली Updated Wed, 15 Nov 2017 09:24 AM IST
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Medical college bribe case SC says CJI decides who hears a case even if facing allegation
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : SOCIAL MEDIA
सुप्रीम कोर्ट ने जजों के नाम पर रिश्वतखोरी के आरोप को अपमानजनक बताया है। मामले की जांच एसआईटी से कराने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए शीर्ष अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि किस मामले की सुनवाई कौन पीठ करेगी, यह तय करने का अधिकार सिर्फ चीफ जस्टिस के पास है चाहे आरोप उनके खिलाफ ही क्यों न हो। हालांकि पीठ ने कहा है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है, फिर भी यह बार और पीठ की जिम्मेदारी है कि वह न्यायिक व्यवस्था की गरिमा का ध्यान रखें। न्यायपालिका को जो नुकसान पहुंचना था, वह तो पहुंच चुका है अब इसकी गरिमा और प्रतिष्ठा के लिए हम सभी एकजुट होकर काम करें।
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CBI की दया पर नहीं छोड़ी जा सकती न्यायपालिका की आजादी: सुप्रीम कोर्ट
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जस्टिस आरके अग्रवाल की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मंगलवार को अपने फैसले में कहा कि इस तरह की याचिका से न्यायपालिका की गरिमा को नुकसान पहुंचा है और लोग बेवजह न्यायपालिका की निष्ठा को संदेह की नजर से देख रहे हैं। पीठ ने याचिकाकर्ता वकील कामिनी जायसवाल और वकील प्रशांत भूषण के प्रयासों को ‘फोरम शॉपिंग’ करार दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह न्यायालय की अवमानना का मामला है, लेकिन यह उम्मीद करते हुए कि जायसवाल और भूषण भविष्य में इस तरह की याचिकाएं दायर नहीं करेंगे, पीठ ने उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से इनकार कर दिया।
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क्या है मामला

Medical college bribe case SC says CJI decides who hears a case even if facing allegation
सुप्रीम कोर्ट
वकील कामिनी जायसवाल की याचिका में आरोप लगाया गया था कि लखनऊ के प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज का लाइसेंस बहाल कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम पर रिश्वत ली गई थी। इस मामले में सीबीआई ने ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व जज इशरत मसरूर कुद्दुसी सहित छह लोगों को गिरफ्तार किया था। कुद्दुसी के ठिकानों पर छापे के दौरान लगभग दो करोड़ रुपये भी बरामद किए गए थे।

मौजूदा जज के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि न्यायपालिका की आजादी सीबीआई या पुलिस की दया पर नहीं छोड़ी जा सकती। शीर्ष अदालत ने फिर कहा है कि हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। पीठ ने इसके समर्थन में संविधान पीठ के 1991 के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि उच्च न्यायपालिका के मौजूदा जजों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती।

याचिकाकर्ता के वकील फोरम शॉपिंग कर रहे थे
पीठ ने याचिकाकर्ता के वकीलों को फोरम शॉपिंग का दोषी माना। पीठ ने इस मामले में एक जज को सुनवाई से अलग करने के अनुरोध की भी आलोचना करते हुए कहा है कि यह सर्वथा अनुचित था और ऐसा लग रहा है जैसे याची के वकील फोरम की शॉपिंग करने निकले थे। जायसवाल ने अपने वकीलों शांति भूषण और प्रशांत भूषण के जरिए दायर अपील में जस्टिस खानविल्कर को इस सुनवाई से अलग करने का अनुरोध किया था लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। 
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