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Manipur: 1992 के उपद्रव में कांग्रेस ने गिराई थी अपनी सरकार, फिर शुरू हुई हिंसा तो खरगे ने याद दिलाया इतिहास

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Wed, 11 Sep 2024 08:08 PM IST
सार

मणिपुर में कुकी और मैतेई समुदाय के बीच मई, 2023 में जातीय हिंसा होने के बाद से हालात बेहद संवेदनशील हैं। 16 महीने से अधिक समय बीतने के बाद एक बार फिर हिंसा, पथराव की घटनाओं के कारण चिंता बढ़ने लगी है। सवाल मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार से पूछे जा रहे हैं। 32 साल पहले 1992 में कांग्रेस सरकार गिरने की घटना का जिक्र भी किया जा रहा है।

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Manipur Unrest CM N Biren Singh Policy State Police and Security forces Home Ministry Role Under Scanner
मणिपुर हिंसा के बीच कांग्रेस के सरकार से तीखे सवाल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मणिपुर में पिछले साल से शुरु हुई हिंसा बंद होने का नाम ही नहीं ले रही है। 3 मई 2023 के बाद से लेकर अब तक हिंसा की अनेक वारदात हो चुकी हैं। कभी सुरक्षा बलों के हथियार लूटे जा रहे हैं तो कभी उनका रास्ता रोका जा रहा है। पिछले दिनों शुरु हुई हिंसा के बाद लोगों ने सुरक्षा बलों को पांच दिन का अल्टीमेटम दे दिया है कि वे या तो हिंसा को रोक दें, अन्यथा उन्हें यहां से जाना होगा। मणिपुर में ड्रोन से हमला हो रहा है। मुख्यमंत्री और राज्यपाल के आवास तक सुरक्षित नहीं हैं। अब ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है कि सीएम बीरेन सिंह को बर्खास्त किया जाए। 8 अप्रैल 1992 को मणिपुर में कांग्रेस की सरकार के दौरान हिंसा हुई तो मुख्यमंत्री राजकुमार दोरेंद्र सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। कांग्रेस पार्टी ने मणिपुर में अपनी ही सरकार गिराने में देर नहीं लगाई।

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बता दें कि मणिपुर में हिंसा की वारदातों में तेजी आ रही है। पिछले साल राजनेताओं से लेकर आम लोगों के हजारों घरों को जला दिया गया था। सुरक्षा कैंपों पर हमले किए गए। एक लाख से अधिक लोगों को अपने घरों से दूर राहत शिविरों और सुरक्षा बलों के कैंपों में रहना पड़ा। मई 2023 में हिंसा शुरू होने के दो दिन बाद ही जब राज्य में सेना, असम राइफल और सीआरपीएफ ने मोर्चा संभाला तो अपने-अपने क्षेत्रों में मैतेई व कुकी समुदाय के लोगों ने सुरक्षा बलों का रास्ता रोक दिया था। तब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा था कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश यात्रा पर हैं, तब 24 जून को सर्वदलीय बैठक बुलाई जा रही है। मतलब यह बैठक पीएम के लिए महत्वपूर्ण नहीं थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 24 जून को मणिपुर के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। कांग्रेस पार्टी ने कहा था कि यह बैठक बहुत देर से हो रही है। सोनिया गांधी ने कहा, इस हिंसा ने हमारे राष्ट्र की अंतरात्मा पर एक गहरा घाव छोड़ा है। मणिपुर में लोगों का जीवन तबाह कर दिया गया। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री बीरेन सिंह को बर्खास्त कर मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की थी।
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कांग्रेस ने मणिपुर में हुई हिंसा की ताजा घटनाओं को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधा है। मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह को तत्काल बर्खास्त करने की मांग की है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 'एक्स' पर लिखा, मणिपुर में प्रधानमंत्री मोदी की घोर विफलता अक्षम्य है। संघर्षग्रस्त राज्य के लोग परेशान और दुखी हैं। वे चाहते थे कि प्रधानमंत्री मोदी उनसे मिलने आएं। उन्होंने लिखा, मणिपुर के मुख्यमंत्री को तुरंत बर्खास्त किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार को मणिपुर में सुरक्षा स्थिति की पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। राज्य बलों की मदद से सभी तरह के विद्रोही समूहों पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई की जाए। खरगे ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि जातीय हिंसा की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देशित और निगरानी वाले 'मणिपुर जांच आयोग' को अपनी जांच में तेजी लानी चाहिए।
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8 अप्रैल 1992 को मणिपुर में कांग्रेस की सरकार बनी थी। राजकुमार दोरेंद्र सिंह, मुख्यमंत्री बनाए गए। तब वहां पर हिंसा हो गई। उस वक्त नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने अपने मंत्रिमंडल की सलाह पर राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की। नौंवी बार 31 दिसंबर 1993 से 13 दिसंबर 1994 तक 347 दिन तक राष्ट्रपति शासन लगा रहा। 18 जून 2001 को जब मणिपुर में हिंसा शुरु हुई तो उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। विपक्षी दलों ने उनसे मिलने का समय का मांगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने छह दिन के भीतर न केवल विपक्षी दलों से मुलाकात की, बल्कि खुद भी मणिपुर के लोगों से शांति की अपील की थी।
 
मणिपुर में पहली बार राष्ट्रपति शासन 19 जनवरी 1967 से 19 मार्च 1967 यानी 66 दिन तक लगाया गया था। उस समय मणिपुर केंद्र शासित विधानसभा का पहला चुनाव होना था। दूसरी बार 25 अक्तूबर 1967 से 18 फरवरी 1968 तक, 116 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया गया। तब मणिपुर में राजनीतिक संकट आ गया था। उसके बाद किसी दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था। तीसरी बार राज्य में 17 अक्तूबर 1969 से 22 मार्च 1972 तक दो साल 157 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा। उस वक्त पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग के दौरान हिंसा हुई। कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी।

चौथी बार 28 मार्च 1973 से 3 मार्च 1974 तक राष्ट्रपति शासन लगा था। उस वक्त विपक्ष के पास इतना कम बहुमत था कि वह स्थायी सरकार नहीं बना सकता था। पांचवीं बार 16 मई 1977 से 28 जून 1977 तक 43 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा। तब दलबदल के चलते सरकार गिर गई थी। छठी बार 14 नवंबर 1979 से 13 जनवरी 1980 तक 60 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा। उस वक्त राजनीतिक कारण जिम्मेदार रहे। जनता पार्टी सरकार के साथ असंतोष और भ्रष्टाचार के आरोप, सरकार की बर्खास्तगी का कारण बना। विधानसभा भंग कर दी गई।

सातवीं बार 28 फरवरी 1981 से 18 जून 1981 तक राष्ट्रपति शासन लगा। तब भी राजनीतिक कारणों के चलते राज्य में स्थायी सरकार का गठन नहीं हो सका। आठवीं बार 7 जनवरी 1992 से लेकर 7 अप्रैल 1992 तक 91 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा था। उस वक्त दलबदल के चलते गठबंधन सरकार गिर गई थी। नौंवी बार 31 दिसंबर 1993 से 13 दिसंबर 1994 तक 347 दिन तक राष्ट्रपति शासन लगा रहा। तब इसका कारण नागा और कुकी समुदाय के बीच हिंसा हुई थी। वह हिंसा लंबे समय तक चली, जिसमें सैंकड़ों लोग मारे गए थे। 


दसवीं बार 2 जून 2001 से 6 मार्च 2002 तक 277 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा था। उस वक्त सरकार ने बहुमत खो दिया था। बुधवार को कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने 'एक्स' पर आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री की 'उदासीनता' अक्षम्य है। मणिपुर डेढ़ साल से जल रहा है। रोज हिंसा, हत्याएं, दंगे, विस्थापन-घर जल रहे हैं, परिवार उजड़ रहे हैं, जिंदगियां तबाह हो रही हैं। हजारों परिवार राहत कैंपों में दिन काटने को मजबूर हैं। प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि पीएम मोदी ने इसे रोकने का अब तक कोई प्रयास भी नहीं किया।

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