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Manipur Election Result: पहली बार भाजपा ने अपने दम पर खिलाया कमल, भूपेंद्र यादव और हिमंता बिस्वा की जोड़ी ने दिखाया कमाल

Thu, 10 Mar 2022 03:43 PM IST
Rahul Sampal राहुल संपाल
Updated Thu, 10 Mar 2022 03:43 PM IST
सार

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को मणिपुर में 2014 के बाद से अहमियत मिलना शुरु हुई है। 2016 में कांग्रेस के निवर्तमान मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह भाजपा में आए तो पार्टी का ग्राफ और बढ़ा। भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में पहली बार 21 सीटें जीतीं।

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Manipur Election Result : Big victory for BJP, shameful defeat for Congress
भूपेंद्र यादव-हिमंता बिस्वा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मणिपुर में एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी सत्ता पर काबिज होने जा रही है। यह पहला मौका होगा जब भाजपा अपने दम पर राज्य में सरकार बनाने जा रही है। चुनावों में पार्टी 60 विधानसभा सीटों में से 31 सीटों पर जीत हासिल कर इतिहास रचते हुए दिखाई दे रही है। भाजपा ने पूर्वोत्तर के इस अहम राज्य की चुनावी कमान वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और प्रवक्ता संबित पात्रा को सौंपी थी। वहीं प्रदेश के चुनावी प्रबंधन और रणनीति में असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा का भी अहम रोल रहा है।

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मणिपुर में भाजपा के लिए चुनौतियां कम नहीं
पूर्वोत्तर के अहम राज्यों में से एक मणिपुर में भाजपा की यह जीत सीएम बीरेन सिंह के द्वारा चलाई गई योजनाओं और कार्यक्रमों के कारण हुई है। भाजपा सरकार के 'पहाड़ों की ओर चलो', गांवों की ओर चलो' के साथ 'सीएम दा हाइसी'(मुख्यमंत्री को बताइए) जैसे कार्यक्रम जनता के बीच बेहद लोकप्रिय है। वहीं कोरोना की तीनों लहर में भाजपा सरकार के फ्री राशन से लेकर फ्री इलाज को स्थानीय लोगों ने खूब सराहा है। लेकिन भाजपा को अपने इस दूसरे कार्यालय में कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ेगा। मणिपुर के लोग लंबे समय से एएफएसपीए को हटाए जाने की मांग कर रहे है। इस मुद्दे पर राज्य के सभी दल भी एकजुट हैं। भाजपा के निवर्तमान मुख्यमंत्री एन.बीरेन सिंह भी इसके पक्षधर बताए जाते है। वे भी कई बार एएफएसपीए को हटाने की वकालत कर चुके है। लेकिन उनकी सरकार ने अब तक इसे हटाने को लेकर कोई ठोस प्रयास नहीं किए हैं। हालांकि इन चुनावों में भाजपा ने वादा किया है कि इस संबंध में केंद्र सरकार के साथ जल्द बातचीत शुरु की जाएगी। जल्द ही इस दिशा मे कोई फैसला लिया जाएगा।
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इसके अलावा लोग मणिपुर में बढ़ती हिंसा से बहुत परेशान हैं। वे इस समस्या का स्थायी समाधान चाहते हैं। इसी साल जनवरी से लेकर चुनाव की घोषणा होने तक मणिपुर के अलग-अलग हिस्सों में कई हिंसा की घटनाएं हुईं। भाजपा ने चुनावों में इस तरह की हिंसा को रोकने को लेकर प्रदेशवासियों से वादा किया है। हिंसा की घटनाओं को रोकना नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी। मणिपुर सूखा प्रभावित राज्य है और यहां पहाड़ी और मैदानी इलाकों के बीच सड़क संपर्क भी बेहतर नहीं है। राज्य के लोग लंबे समय से सड़क संपर्क को ठीक करने की मांग उठा रहे है।
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भाजपा ने इस बार भी बीरेन सिंह पर खेला था दांव
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को मणिपुर में 2014 के बाद से अहमियत मिलना शुरु हुई है। 2016 में कांग्रेस के निवर्तमान मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह भाजपा में आए तो पार्टी का ग्राफ और बढ़ा। भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में पहली बार 21 सीटें जीतीं। सरकार बनाने के लिए बीजेपी ने नेशनल पीपुल्स पार्टी और नगा पीपुल्स फ्रंट के साथ समझौता किया। पार्टी इन चुनावों में एन बीरेन सिंह के चेहरे को आगे रखकर चुनावी मैदान में उतरी। फिर भाजपा, फिर विकास और डबल इंजन की सरकार के नारे के भाजपा इन चुनावों में मैदान में उतरी। मणिपुर के सीएम बीरेन सिंह एक कुशल राजनेता के पहले पत्रकार रहे हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वे इकलौते नेता हैं, जो घाटी और पहाड़ी इलाकों के बीच संतुलन साधना जानते हैं।

कांग्रेस ने बड़े नेताओं ने नहीं दिया ध्यान
अमर उजाला से चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते है कि, कांग्रेस पार्टी के पास मणिपुर में कोई एक सर्वमान्य चेहरा नहीं है। इसी का खामियाजा पार्टी को चुनावों में भुगतना पड़ा। बड़े नेताओं का पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने से कांग्रेस का संगठन लगातार कमजोर होता गया। जिससे कार्यकर्ता भी इस बार पार्टी के प्रचार के लिए जमीन पर नहीं उतरे। जबकि इधर भाजपा ने मई से ही मणिपुर की तैयारी शुरु कर दी थी। असम के सीएम हेमंत बिस्वा से लेकर केंद्रीय मंत्री तक चुनावों में डटे रहे।

उन्होंने कहा कि, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी अगर मणिपुर में थोड़ी भी रुचि लेते तो आज परिणाम पार्टी के पक्ष में जा सकते थे लेकिन दोनों ही नेताओं ने इस ओर कोई दिलचस्पी नहीं ली। आज कांग्रेस के पास कई बड़े नेता हैं जिनके पास राज्य चलाने के साथ-साथ संगठन में काम करने का लंबा अनुभव है। ऐसे नेता वहां जाकर स्थानीय पार्टियों के साथ समय से पहले ही गठबंधन करते तो कांग्रेस के लिए फायदेमंद होता और पार्टी मणिपुर जीतने की स्थिति में होती।


यह था पिछली बार का नतीजा
मणिपुर की 60 सदस्यीय विधानसभा के लिए दो चरणों में चुनाव संपन्न हुए। यहां 28 फरवरी को हुए पहले चरण के मतदान में 38 सीटों पर करीब 78.03 फीसद वोटिंग हुई। तो वहीं, पांच मार्च को हुए दूसरे चरण के मतदान में 22 सीटों के लिए 76.04 वोटर्स ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। मणिपुर में 2017 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 28 सीटों पर जीत हासिल की थी। जबकि भाजपा को  21 सीटें मिली थीं। लेकिन बीजेपी ने निर्दलीयों और कांग्रेस के बागियों के दम पर सरकार बना ली थी। इस चुनाव में एनपीएफ ने 4, एनपीईपी ने 4, टीएमसी ने 1, निर्दलीय ने 1 सीट हासिल की थी। जबकि साल 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 42 सीटें मिली थी। भाजपा का यहां खाता तक नहीं खुला था।

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