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फ्लॅाप हुई राज ठाकरे की मनसे, क्या है पार्टी का भविष्य?

Thu, 23 Feb 2017 03:58 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 23 Feb 2017 03:58 PM IST
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maharashtra navnirman sena performence going down
राज ठाकरे (फाइल)
60 के दशक में शिवसेना के गठन के साथ ही मुंबई ही नहीं महाराष्ट्र की राजनीति में भी उसकी अहम भूमिका रही। हिंदुत्व की राजनीति करने वाले बाल ठाकरे ने मुंबई और महाराष्ट्र के विकास के लिए एक अलग पैमाना बनाने के साथ-साथ एक कार्यशैली भी तैयार की, जिसका उन्हें फायदा मिला। इसमें उत्तर भारतीयों का विरोध भी उनकी रणनीति का एक हिस्सा था।
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मार्च 2006 में बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने अपना अलग रास्ता चुन लिया। उन्होंने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नाम से नई पार्टी बनाई। 'मनसे' शिवसेना से एक कदम आगे बढ़ते हुए उत्तर भारतीयों के खिलाफ ज्यादा एग्रेसिव दिखी। वहीं, हिंदूत्व के मुद्दे पर भी वह ज्यादा सख्त दिखी।
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शुरुआती दिनों में मनसे काफी मजबूती से आगे बढ़ी और 2009 के विधानसभा चुनाव में उसे 13 सीटों पर जीत मिली। इसमें छह सीट उसे मुंबई, दो सीट थाने, तीन सीट नासिक, एक सीट पुणे और औरंगाबाद के कन्नाद से एक सीट मिली। यही नहीं, 24 सीटों पर वह दूसरे नंबर पर रही। हालांकि, साल 2009 के आम चुनाव में उसकी फजीहत हुई और उसे कोई खास सफलता नहीं मिली।
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साल 2012 के महाराष्ट्र निकाय चुनाव में उसे विधानसभा की तरह सफलता तो नहीं मिली, लेकिन फिर भी उसका प्रदर्शन ठीक-ठाक कहा जा सकता है। बृहन्मुंबई में उसे 227 सीट में से 28 सीट, पुणे में 152 सीट में से 29 सीट, नागपुर में 145 में से दो सीट, थाने में 130 में से दो सीट, पिंपरी-चिंचवाड़ में 128 में से 4 सीट, नासिक में 122 में से 40, सोलापुर और अमरावती में खाता नहीं खुला, उल्हासनगर में 78 में से एक सीट और अकोला में 73 में से एक सीट मिली।  

विधानसभा और लोकसभा में भी मिली असफलता

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राज ठाकरे आखिरी बार नवंबर 2014 में मातोश्री गए थे। - फोटो : Getty Images
साल 2014 के आम चुनाव में एक बार फिर मनसे को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा। यही नहीं, उसका वोटिंग प्रतिशत भी काफी घटा। साल 2014 के विधानसभा में भी उसे बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। जहां 2009 में उसे 13 सीट मिली थी, वहीं इस बार उसे मात्र एक सीट मिली। 

इन चुनावों में हार के साथ ही मुंबई में राज ठाकरे की धमक कमजोर पड़ने लगी। जिसे एग्रेसिव और परिवर्तन की राजनीति के साथ वह शिवसेना से अलग हुई थी वह फीकी पड़ने लगी। इसका असर 2017 निकाय चुनाव में भी देखने को मिला। वहां उसे अभी तक कोई बड़ी सफलता नहीं मिलती दिख रही है। लगातार गिरते प्रदर्शन से मनसे का भविष्य खतरे में दिख रहा है। देखते हैं राज ठाकरे आगे कौन सी रणनीति बनाते हैं?
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