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धनकुबेरों और गरीबों को कर्ज देने के लिए अलग मानदंड क्यों: मद्रास हाईकोर्ट

Sat, 24 Feb 2018 09:02 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चैन्ने
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चैन्ने Updated Sat, 24 Feb 2018 09:02 AM IST
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Madras High Court asked why there is different rule for rich and poor regarding loan
मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने करोड़पतियों एवं धनकुबेरों और मध्यमवर्ग व गरीबों को कर्ज देने के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाने पर बैंकों को फटकार लगाई है। हाईकोर्ट ने कहा कि पैसे वालों को पर्याप्त जमानत के बिना कर्ज दे दिया जाता है। अदालत ने कहा, बैंक करोड़पति बिजनेसमैन और धनकुबेरों को कर्ज और लेटर ऑफ अंडरस्टैंडिंग अपर्याप्त जमानत के ही दे देते हैं। उनसे रिकवरी की कार्रवाई तब की जाती है, जब कोई घोटाला नियंत्रण से बाहर हो जाता है। वहीं बैंक मध्यम आय वर्ग के लोगों एवं गरीबों के मामले में बिल्कुल अलग मानदंड अपनाते हैं।

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जस्टिस केके शशिधरन और पी वेलमुरुगन की पीठ ने तमिलनाडु के एक पिछड़े समुदाय की लड़की को शिक्षा का कर्ज देने से इनकार करने के लिए इंडियन ओवरसीज बैंक पर 25,000 का जुर्माना लगाया है। बैंक ने इस गरीब किसान की बेटी के शिक्षा कर्ज के आवेदन पर विचार करने के एकल पीठ के फैसले के खिलाफ अपील की थी। पीठ ने कहा, बैंक केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक के निर्देशों को लेकर सजग नहीं हैं, जिनमें साफ कहा गया है कि गरीब छात्रों को शिक्षा के लिए कर्ज देकर उनकी मदद की जानी चाहिए। दंडित न किए जाने के कारण बैंक ऐसे निर्देशों का उल्लंघन कर रहे हैं।
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पीठ ने कहा, यह मामला इस बात का उदाहरण है कि कैसे इंडियन ओवरसीज बैंक ने तमिलनाडु के अति पिछड़े समुदाय की एक लड़की को 3.45 लाख रुपये का शिक्षा कर्ज देने के लिए इधर-उधर दौड़ाया। इस मामले में 30 नवंबर, 2012 के हाईकोर्ट की एकल पीठ के फैसले को बैंक ने चुनौती दी थी। यह मामला एक गरीब छात्रा के कर्ज आवेदन से जुड़ा है। 2011-12 के सत्र में एक निजी कॉलेज में दाखिला लेने के लिए उसने शिक्षा कर्ज के लिए आवेदन दिया था। वह अपनी फीस अदा करने की स्थिति में नहीं थी। जब बैंक ने उसके आवेदन पर विचार नहीं किया तो लड़की ने हाईकोर्ट का रुख किया। एकल पीठ ने बैंक को उसके आवेदन पर विचार करने का आदेश दिया लेकिन बैंक ने कर्ज देने के बजाए इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दे दी।
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शुक्रवार को बैंक की ओर से पेश वकील ने डबल बेंच के समक्ष कहा कि आवेदनकर्ता ने अपना कोर्स 2015 में पूरा कर लिया है। इसलिए उसकी याचिका बेकार हो गई है। इस पर पीठ ने कहा कि बैंकों के पास ऐसा कोई मामला नहीं है जिसमें शिक्षा कर्ज लेने वाला फंसे हुए लोन में शामिल हिस्सेदार हो। पीठ ने कहा, हमारे संज्ञान में लाया गया है कि 50 कंपनियों में प्रत्येक पर 250 करोड़ रुपये की देनदारी है। ये सभी विलफुल डिफॉल्टर हैं। बैंक की अपील खारिज करते हुए कोर्ट ने आवेदनकर्ता को दो हफ्ते के भीतर 25,000 रुपये चुकाने को कहा है।

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