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Tamil Nadu: हाईकोर्ट ने खारिज की जयललिता की मौत के मामले में CBI जांच की मांग, कहा- सुनवाई योग्य नहीं याचिका
Thu, 17 Nov 2022 07:15 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
Published by: निर्मल कांत
Updated Thu, 17 Nov 2022 07:15 PM IST
सार
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता की कॉर्पोरेट अस्पताल में हुई मौत (2016) की सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
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जयललिता का जन्मदिन
- फोटो : facebook
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विस्तार
मद्रास हाईकोर्ट ने गुरुवार को उस जनहित याचिका (पीआईएल) खारिज कर दिया है, जिसमें दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता की मौत की सीबीआई जांच कराने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि जयललिता की कॉर्पोरेट अस्पताल में हुई मौत (2016) की सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका 'सुनवाई योग्य नहीं' है।
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कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश टी. राजा और न्यायमूर्ति डी. कृष्ण कुमार की पीठ ने सीबीआई और अन्य संबंधित एजेंसियों को निर्देश देने की याचिका खारिज किया। सुनवाई के दौरान आध्यात्मिक और सामाजिक कार्यकर्ता आर. गोपालजी भी वहां मौजूद थे, जिनकी ओर से यह जनहित याचिका दाखिल की गई थी।
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याचिकाकर्ता के मुताबिक, न्यायमूर्ति अरुमुगासामी जांच आयोग ने इस साल 23 अगस्त को तमिलनाडु सरकार को रिपोर्ट सौंपी, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री के दुर्भाग्यपूर्ण निधन के बारे में सच्चाई बताई गई थी। उनकी मौत को लेकर सवाल उठाए गए थे। खंडपीठ ने कहा कि याचिका विचार योग्य नहीं है, क्योंकि याचिकाकर्ता ने जनहित याचिका दायर करने से पहले सीबीआई और अन्य एजेंसियों के साथ कोई संपर्क नहीं किया।
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जांच रिपोर्ट में क्या-क्या कहा गया था?
सबसे पहले जयललिता की मौत की असली तारीख को लेकर विवाद उठा। हॉस्पिटल ने जो बुलेटिन जारी किया था उसके अनुसार, जयललिता की मौत पांच दिसंबर 2016 की रात 11:30 को हुई थी। जयललिता की देखभाल करने के लिए लगी नर्स, तकनीशियन व कुछ अन्य हॉस्पिटल स्टाफ ने जांच कमेटी को बताया कि चार दिसंबर 2016 की दोपहर 3.50 से पहले ही उनका कार्डिक फेल्योर हुआ था। तब उनके हृदय में कोई इलेक्ट्रिक एक्टिविटी नहीं हो रही थी। ब्लड सर्कुलेशन भी रुक गया था।
रिपोर्ट में ये भी कहा गया था कि जयललिता को सीपीआर भी देरी से दिया गया। 3.50 से पहले उनका कार्डिक फेल्योर हुआ था, जबकि उन्हें सीपीआर 4.20 पर दिया गया। तब तक उनका निधन हो चुका था। जांच रिपोर्ट के अनुसार, इससे पता चलता है कि चार दिसंबर की शाम 3.50 पर ही जयललिता दम तोड़ चुकीं थीं।
कमेटी के सामने पेश होने वाले गवाहों में एआईडीएमके के नेता ओ पन्रीरसेल्वम, जयललिता की भतीजी दीपा, भतीजे दीपक, डॉक्टर्स, तमिलनाडु के टॉप रैंक के तत्कालीन अधिकारी, तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री सी विजयभास्कर, एम थंबी दुरई, सी पोन्नियिन, मनोज पांडियन और जयललिता की देखभाल में लगाए गए सभी हॉस्पिटल स्टाफ शामिल थे।
जांच कमेटी ने किन-किन लोगों पर सवाल थे उठाए?
जस्टिस ए अरुमुघसामी की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कई लोगों के बयानों का जिक्र किया था। इसके आधार पर जयललिता की करीबी सहयोगी रहीं शशिकला पर सबसे पहले सवाल खड़े हुए। इसके अलावा जयललिता के निजी डॉक्टर केएस शिवकुमार (शशिकला के रिश्तेदार), उस समय के स्वासथ्य सचिव जे. राधाकृष्णनन और तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री सी विजयभास्कर, अस्पताल में जयललिता का इलाज करने वाले डॉक्टर वाईवीसी रेड्डी, डॉ. बाबू अब्राहम, अपोलो हॉस्पिटल के चेयरमैन प्रताप रेड्डी, पूर्व चीफ सेक्रेटरी राम मोहन राव, पूर्व सीएम पन्नीरसेल्वम की भूमिका को संदेह के घेरे में रखा गया। जांच कमेटी ने इन सभी की भूमिका की जांच कराने की सिफारिश की थी।
कब और कैसे हुई जयललिता की मौत?
22 सितंबर 2016 को बीमार होने पर जयललिता को चेन्नई के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह 75 दिन तक वह अस्पताल में रहीं और पांच दिसंबर 2016 को उनकी मौत हो गई थी। जयललिता के निधन के बाद उनकी भतीजी दीपा और उनके भतीजे दीपक समेत अन्नाद्रमुक (एआईडीएमके) के कई नेताओं ने पूर्व मुख्यमंत्री की मौत की परिस्थितियों को लेकर सवाल उठाए थे। 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी ने इसकी जांच के लिए जस्टिस ए अरुमुघसामी की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था। जिसकी रिपोर्ट मिलने के बाद अब तमिलनाडु सरकार ने इसे विधानसभा में पेश किया। इस रिपोर्ट में भी कई गंभीर सवाल खड़े किए गए थे।
हाईकोर्ट ने भाजपा नेता को मानहानिकारक बयान देने से रोका
हाईकोर्ट ने गुरुवार को तमिलनाडु भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी सीटीआर निर्मल कुमार को राज्य के बिजली मंत्री वी. सेंथिल बालाजी के खिलाफ कोई भी मानहानिकारक ट्वीट/बयान देने से रोक दिया। निर्मल कुमार भाजपा की आईटी विंग के सचिव हैं।
याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता पी विल्सन ने कहा कि कुमार पिछले कई महीनों से राजनीतिक कारणों से उनके खिलाफ लगातार झूठे और मानहानिकारक बयान देकर बालाजी को बदनाम करने का अभियान चला रहे थे। इरादा उनकी व्यक्तिगत और पेशेवर प्रतिष्ठा को बदनाम करने और धूमिल करने का था। कुमार किसी रचनात्मक आलोचना या राजनीतिक विरोध में शामिल नहीं थे, बल्कि बिना किसी आधार के केवल अपमानजनक और बदनामी के आरोपों के माध्यम से बदनाम कर रहे थे।