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RSS: ‘क्या आरएसएस को कुचलने के लिए लगा था प्रतिबंध’, जानें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने क्यों की ये गंभीर टिप्पणी?

Fri, 26 Jul 2024 11:30 PM IST
मिथिलेश नौटियाल डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला Published by: मिथिलेश नौटियाल Updated Fri, 26 Jul 2024 11:30 PM IST
सार

केंद्र सरकार ने 1966, 1970 और 1980 में केंद्रीय कर्मचारियों के संघ से जुड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था। अदालत ने कहा है कि आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने के समय तत्कालीन सरकार के पास ऐसी कोई ठोस रिपोर्ट आधारित निष्कर्ष नहीं था

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Madhya Pradesh High Court strongly criticised the decision to ban RSS
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक - फोटो : संवाद

विस्तार

केंद्र सरकार ने नौ जुलाई को एक आदेश जारी करते हुए केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों में शामिल होने पर लगी रोक को वापस ले लिया था। लेकिन मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इसी केस से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने के उसके पूर्व के निर्णय की कड़ी आलोचना की है। अदालत ने कहा है कि आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने के समय केंद्र सरकार के पास ऐसी कोई ठोस रिपोर्ट या अध्ययन पर आधारित निष्कर्ष नहीं था जिसके आधार पर उसने एक 'राष्ट्रवादी संगठन' से जुड़ने पर अपने ही कर्मचारियों पर प्रतिबंध लगा दिया। अदालत ने इसे कर्मचारियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया है। केंद्र सरकार ने 1966, 1970 और 1980 में केंद्रीय कर्मचारियों के संघ से जुड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था। 

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अदालत ने अपने आदेश के नवें बिंदु पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है कि केंद्र सरकार के पास इस बात का अधिकार है कि वह अपने कर्मचारियों से संबंधित आदेश पारित करे, लेकिन इसके बाद भी ऐसे किसी संगठन पर अनंतकाल के लिए प्रतिबंध लागू नहीं किया जा सकता। प्रतिबंध लगाने के पहले भी केंद्र सरकार के पास कोई ठोस आधार होना चाहिए जिसके आधार पर वह इस तरह का निर्णय ले। लेकिन वर्तमान मामले को देखकर लगता है कि उसके पास ऐसा कोई ठोस आधार या रिपोर्ट नहीं थी। जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी ने अपनी महत्त्वपूर्ण टिप्पणी में कहा है कि ऐसा लगता है कि (तत्कालीन) केंद्र सरकार ने अपनी विचारधारा से मेल न खाने वाले एक संगठन को 'कुचलने' के लिए उस पर इस तरह का प्रतिबंध लगा दिया था, जबकि उसके पास संगठन को प्रतिबंधित करने के लिए कोई ठोस आधार नहीं था। 
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अदालत ने केंद्र द्वारा अचानक प्रतिबंध उठा लेने पर भी प्रश्न उठाए हैं। अदालत ने पूछा है कि संघ को प्रतिबंधित सूची से हटाने के लिए केंद्र के पास क्या रिपोर्ट थी। अदालत ने कहा है कि वह इस बात की अपेक्षा करता है कि जब संघ से प्रतिबंध सोच-समझकर हटाया जा रहा है तो भविष्य में यदि कभी उस पर दोबारा कभी प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव लाया गया तो ऐसा निर्णय लेने के पहले केंद्र गहन अध्ययन करेगा। अन्यथा ऐसा प्रतिबंध चुनौती के लिए खुला रहेगा। 
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अदालत ने इस बात पर अफसोस जताया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे विश्व प्रसिद्ध संगठन पर से अवांछित प्रतिबंध को हटाने में पांच दशकों का समय लग गया। अदालत ने इसे केंद्रीय कर्मचारियों की संघ से जुड़कर राष्ट्र-समाज सेवा करने के अधिकार से वंचित रखे जाने की तरह देखा है।

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