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भाजपा को चेतावनी दे रहे हैं रामदास आठवले? आरपीआई के बदले सुर के मायने समझिए

Mon, 25 Feb 2019 05:56 PM IST
Prabudhh Jain चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Prabudhh Jain Updated Mon, 25 Feb 2019 05:56 PM IST
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Lok Sabha elections 2019: Ramdas Athawales RPI relations with BJP-Shiv Sena
केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री रामदास आठवले, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से नाराज चल रहे हैं। वह अपनी यह नाराजगी खुलेआम जाहिर भी कर चुके हैं।

केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री रामदास आठवले, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से नाराज चल रहे हैं। वह अपनी यह नाराजगी खुलेआम जाहिर भी कर चुके हैं। साल 2011 में एनडीए में शामिल होने की घोषणा करने वाले आठवले की इस वक्त एनडीए से रस्सा-कशी जोरों पर है। इसकी वजह महाराष्ट्र में उनकी पार्टी को तवज्जो नहीं मिलना है। रामदास आठवले पिछले हफ्ते महाराष्ट्र में हुए भाजपा-शिवसेना गठबंधन में खुद की पार्टी के लिए भी सीटों का बंटवारा चाहते थे। लेकिन, भाजपा ने न ही उनसे कोई सलाह ली और न ही उन्हें गठबंधन कार्यक्रम में शामिल किया। ऐसे में आठवले खुद को उपेक्षित और ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। यही वजह है कि उन्होंने यहां तक कह डाला है कि राजनीति में दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं।

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क्या भाजपा को चेतावनी दे रहे हैं आठवले?
आठवले ने कहा है कि हम एनडीए में बने रहेंगे लेकिन हमारी कुछ मांगें हैं। पार्टी मुंबई में शिवसेना के हिस्से से एक सीट चाहिए और भाजपा से भी मुंबई के बाहर एक सीट चाहिए। उन्होंने ये भी कहा कि अगर एनडीए, असम और उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी के साथ सीटों को लेकर गठबंधन नहीं करती है तो इससे यह संदेश जा सकता है कि राजग, अनुसूचित जाति के सशक्तीकरण पर बातचीत नहीं करना चाहती। ऐसे में क्या आरपीआई अध्यक्ष रामदास आठवले अनुसूचित जाति वाले कार्ड के जरिए भाजपा को चेतावनी देने की कोशिश कर रहे हैं।

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Lok Sabha elections 2019: Ramdas Athawales RPI relations with BJP-Shiv Sena
रामदास आठवले की पार्टी आरपीआई महाराष्ट्र में सीमित है। पार्टी के पास खुद का चुनाव चिन्ह तक नहीं है। - फोटो : अमर उजाला

आठवले की पार्टी के बदले सुर 
रामदास आठवले के सुर शनिवार से बदले हुए हैं। उन्होंने शनिवार को कहा था कि महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना का गठबंधन हुआ यह अच्छी बात है लेकिन उनकी पार्टी के लिए एक भी सीट नहीं छोड़ी गई जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है।

महाराष्ट्र में क्या है आरपीआई की स्थिति?
रामदास आठवले की पार्टी आरपीआई महाराष्ट्र में सीमित है। पार्टी के पास खुद का चुनाव चिन्ह तक नहीं है। महाराष्ट्र में जहां अनुसूचित जाति की जनसंख्या 11 फीसदी है उसमें रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया-ए का मत प्रतिशत 1 फीसदी से भी कम है। 

Lok Sabha elections 2019: Ramdas Athawales RPI relations with BJP-Shiv Sena
रामदास आठवले का कहना है कि उत्तर प्रदेश में सीट बंटवारे को लेकर उन्होंने सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी बात की है। - फोटो : अमर उजाला

रामदास आठवले ने जहां अपनी नाराजगी जताई है, वहीं यह बात भी कही कि वह चाहते हैं कि अगली सरकार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही बने। आठवले का कहना है कि 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लिए वोट जुटाने में आरपीआई ने सहायता की थी। लेकिन जब 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन हुआ तो उन्हें बुलाया तक नहीं गया।

उत्तर प्रदेश में तीन सीट चाहते हैं आठवले
रामदास आठवले का कहना है कि उत्तर प्रदेश में सीट बंटवारे को लेकर उन्होंने सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी बात की है। वह उत्तर प्रदेश से तीन सीटें चाहते हैं। यूपी में अनुसूचित जाति के वोटों की संख्या अच्छी-खासी है ऐसे में आठवले महाराष्ट्र चूकने के बाद अब उत्तर प्रदेश और असम में अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए टिकट चाहते हैं।

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Lok Sabha elections 2019: Ramdas Athawales RPI relations with BJP-Shiv Sena
1980 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शरद पवार ने आठवले के कौशल को पहचाना और उन्हें अपनी सरकार में सामाजिक कल्याण मंत्री बनाया। - फोटो : ani

रामदास आठवले महाराष्ट्र में अनुसूचित जाति की राजनीति के बड़े चेहरों में से एक हैं। क्रांतिकारी कवि और सामाजिक कार्यकर्ता नामदेव ढसाल ने जब महाराष्ट्र में 1972 में दलित पैंथर्स की स्थापना की तो आठवले भी उनके साथ सक्रिय हुए। यह वह दौर था जब महाराष्ट्र में आठवले और शिव सैनिकों की भिड़ंत आम बात थी। इसके बाद आठवले ने पूरे महाराष्ट्र में घूमकर अनुसूचित जाति को अपने पक्ष में इकट्ठा किया।

1980 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शरद पवार ने आठवले के कौशल को पहचाना और उन्हें अपनी सरकार में सामाजिक कल्याण मंत्री बनाया। यहीं से आठवले की राजनीति शुरू हुई। सन 1980 के मध्य से लेकर 2011 तक रामदास आठवले की पार्टी कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ गठबंधन में रही। 2014 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आठवले ने कांग्रेस-एनसीपी से अपना गठबंधन तोड़ लिया और राजग का दामन थामा।

अब नए समीकरणों में आठवले अलग-थलग दिखाई दे रहे हैं और भाजपा-शिवसेना के गठबंधन के बाद उनके लिए सीटों की गुंजाइश नहीं दिखती।

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