फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   rajpath ›   Lok sabha Elections 2019: Priyanka Gandhi may get better to rahul Gandhi, Congress in tension

क्या हैं वो कारण जो प्रियंका गांधी को कांग्रेस के चुनाव अभियान में खुलकर नहीं उतरने दे रहे?

Wed, 13 Mar 2019 09:37 AM IST
Nilesh Kumar निलेश कुमार, चुनाव डेस्क, अमर उजाला
निलेश कुमार, चुनाव डेस्क, अमर उजाला Published by: Nilesh Kumar Updated Wed, 13 Mar 2019 09:37 AM IST
विज्ञापन
Lok sabha Elections 2019: Priyanka Gandhi may get better to rahul Gandhi, Congress in tension
नेपथ्य से राजनीति करतीं प्रियंका गांधी(प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : PTI

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक और जनसभा के लिए सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, ज्योतिरादित्य समेत कई नेता गुजरात पहुंचे। बैठक के बाद रैली में प्रियंका गांधी का भाषण तय नहीं था। प्रियंका गांधी ने अपने संबोधन के दौरान मंच से यह स्वीकार भी किया। उन्होंने कहा कि मैं तो मीटिंग में आई थी। मुझे लगा नहीं था कि भाषण देने की जरुरत होगी। लेकिन मैं पहली बार गुजरात आई हूं, तो दो बातें जरुर करूंगी। इतना कहते ही तालियों की गड़गड़ाहट से अडालज का मैदान गूंज उठा। हालांकि राहुल गांधी की अपेक्षा उन्हें काफी कम समय दिया गया।

विज्ञापन


आखिर ऐसा क्यों है कि 

  • कांग्रेस को मजबूती देेने की क्षमता रखने वाली प्रियंका सक्रिय राजनीति में आने के बावजूद बहुत सक्रिय नहीं दिखाई देती हैं?
  • विज्ञापन
  • भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की ताबड़तोड़ रैलियों के बाद भी कांग्रेस की चुनावी रैलियों में उनकी मौजूदगी लगभग नहीं के बराबर है?
  • विज्ञापन
    विज्ञापन
  • पार्टी में महासचिव पद और देश के सबसे बड़े राज्य की आधे से ज्यादा सीटों की जिम्मेदारी के बावजूद वह अपेक्षाकृत कम चर्चा में हैं?

एक मूल वजह तो साफ दिखती है कि कांग्रेस राहुल गांधी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समकक्ष खड़ा करने की कोशिश में है। दूसरी वजह ये हो सकती है कि पार्टी 2024 के लिए प्रियंका को ट्रंप कार्ड के तौर पर बचा कर रखना चाहती है। 2019 में पूरी तरह प्रियंका को झोंकने का कांग्रेस को फिलहाल ज्यादा फायदा नहीं दिखता। लेकिन इसके अलावा भी कई और कारण हैं कि प्रियंका की राजनीति पर्दे के पीछे ज्यादा है और फ्रंट पर उनकी मौजूदगी कम रहती है। 

'बड़ी पॉलिटिकल एंट्री, पहला रोड शो और दो शब्द भी नहीं बोलीं'

एक लंबे इंतजार के बाद प्रियंका गांधी सक्रिय राजनीति में आईं, तो उन्हें कांग्रेस का ट्रंप कार्ड कहा जाने लगा। विरोधी पार्टियां खुलकर भले ही प्रियंका की मजबूती को स्वीकार न करें, लेकिन भाजपा जैसी बड़ी पार्टी भी मानती है कि प्रियंका के आने से कांग्रेस मजबूत हुई है। कथित मनी लॉन्ड्रिंग घोटाले में पूछताछ के लिए ईडी ने रॉबर्ट वाड्रा को तलब किया हो और ऐसी विपरीत परिस्थिति के बीच प्रियंका गांधी सक्रिय राजनीति में आईं। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने न केवल उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया, बल्कि उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्य की आधे से ज्यादा लोकसभा सीटों की जिम्मेदारी भी सौंप दी।

उत्तर प्रदेश में जहां पिछले चुनावों तक प्रियंका, अमेठी और रायबरेली में अपने भाई राहुल गांधी और मां सोनिया गांधी के लिए प्रचार करती रही थीं, अब उसी उत्तर प्रदेश की 41 सीटों की चुनावी कमान प्रियंका के हाथ में है। पिछले दिनों जब उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कांग्रेस का रोड शो हुआ, तो राहुल-प्रियंका की अगुवाई में कांग्रेस के चुनावी अभियान का ऐतिहासिक आगाज हुआ। रोड शो के समापन पर प्रियंका गांधी के संबोधन के लिए समर्थक इंतजार करते रहे, लेकिन वह दो शब्द भी नहीं बोलीं। वहीं, राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस भी की और कार्यकर्ताओं से मुखातिब भी हुए। ये प्रियंका के भाषण का इंतजार कर रहे लोगों के लिए काफी चौंकाने वाला पल था।

Lok sabha Elections 2019: Priyanka Gandhi may get better to rahul Gandhi, Congress in tension
Priyanka Gandhi- Rahul Gandhi

प्रियंका के राहुल से आगे निकल जाने का डर! 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस प्रियंका को अगली कतार में रखना तो चाहती है, लेकिन यह भी डर बना रहता है कि वह राहुल गांधी से आगे न निकल जाएं। इधर, प्रियंका को पार्टी संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गई है। यूपी में वह अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा भी रही हैं। बिहार के दरभंगा विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन की फाउंडर लेक्चरर रह चुकीं और वर्तमान में पोस्ट डॉक्टरल फेलो डॉ. चित्रलेखा अंशु कहती हैं कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा से असंतुष्ट हिस्से को नरेंद्र मोदी के समकक्ष एक मजबूत दावेदार की तलाश है और ऐसे में कांग्रेस राहुल को विकल्प के तौर पर पेश करना चाहती है। 

डॉ चित्रा कहती हैं कि कांग्रेस को यह भी डर है कि प्रियंका सार्वजनिक मंचों पर लोगों से मुखातिब होती रहीं, तो मैदान मार ले जाएंगीं। कारण कि समर्थक और काफी हद तक कार्यकर्ता भी प्रियंका में उनकी दादी इंदिरा गांधी की छवि तलाशने लगते हैं। लखनऊ के बीबीए केंद्रीय विश्वविद्यालय से लघु शोध कर चुकीं मीडिया फेलो आरती भी उनकी इस बात से इत्तेफाक रखते हुए कहती हैं कि भले ही इंदिरा गांधी की कुशल प्रशासक और आयरन लेडी वाली बात प्रियंका में न हो, लेकिन भावनात्मक तौर पर और अपने भाषणों से वह काफी हद तक प्रभावित तो कर ही देती हैं। 
 

पितृसत्तात्मक सोच का भी असर?

डॉ चित्रलेखा कहती हैं कि शुरू से यही धारणा रही है कि एक परिवार का संचालन, एक कॉरपोरेट संस्थान का संचालन, एक राष्ट्र का संचालन अच्छे से एक पुरुष ही कर सकता है। पार्टी की अध्यक्ष रहते सोनिया गांधी चाहतीं तो 2009 में या 2014 में प्रधानमंत्री बन सकती थीं, लेकिन नहीं बनीं। कारण और भी रहे होंगे, लेकिन उनका महिला होना भी बड़ा फैक्टर रहा होगा। उन्हें विदेशी बता-बता कर विरोधी उन पर हमलावर रहे। यही फैक्टर प्रियंका गांधी के संदर्भ में भी है। 

डॉ चित्रा अमेरिकी चुनाव का भी उदाहरण देती हैं। वो कहती हैं कि अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्र ने हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप के बीच में से ट्रंप को ही चुना। उनकी नजर में हिलेरी राजनीतिक दृष्टि से ट्रंप से कहीं ज्यादा सशक्त दिखती थीं, बावजूद इसके ट्रंप को पुरुष होने का फायदा मिल गया। राजनीतिक जानकार डॉ अभिषेक श्रीवास्तव मानते हैं कि जितनी मेहनत कांग्रेस ने राहुल गांधी के पीछे की, जितने मौके, जितना बड़ा पद और जितनी बड़ी जिम्मेदारी राहुल को दी गई, उनकी तुलना में आधा भी प्रियंका गांधी को मिला होता तो कांग्रेस की स्थिति बेहतर होती।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed