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Hindi News ›   Rajpath ›   Lok Sabha Elections 2019: How Narendra modi and Amit Shah leadership changed bjp in five years

नई भाजपा के नए मायने और भविष्य के संकेत

Fri, 22 Mar 2019 03:40 PM IST
Prabudhh Jain शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Published by: Prabudhh Jain Updated Fri, 22 Mar 2019 03:40 PM IST
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Lok Sabha Elections 2019: How Narendra modi and Amit Shah leadership changed bjp in five years
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह (फाइल फोटो) - फोटो : एएनआई

पढ़ने में कड़वा भले लगे, लेकिन यह हकीकत है। आइए जुलाई 2013 के दौर में चलते हैं। भाजपा के संस्थापकों में से एक, कभी संगठन को मुट्ठी में रखने वाले पार्टी के भीष्म पितामह (अटल जी की सक्रियता कम हो चुकी थी) लालकृष्ण आडवाणी के विरोध के बावजूद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय प्रचार अभियान समिति का प्रमुख बनाया जाना कितना मायने रखता था। वह नरेंद्र मोदी जिन्हें राजनीति में आडवाणी ने कभी सींचकर बड़ा किया था। कहते हैं पीछे संघ न खड़ा होता तो भाजपा के लिए यह निर्णय आसान नहीं था|  प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने आसानी से उन्हीं आडवाणी को धीरे-धीरे सन्यास के रास्ते पर ला खड़ा किया। अब आडवाणी की जगह भाजपा अध्यक्ष अमित शाह खुद गांधी नगर से लोकसभा प्रत्याशी हैं। ये नई भाजपा है जहां आडवाणी द्वारा कायम अनुशासन एक कदम और आगे बढ़  गया है| नए चेहरों को आगे लाने और पुरानों को पीछे धकेलने में अब ज़्यादा वक्त नहीं लग रहा! 

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कभी भाजपा का लोकतंत्र थे आडवाणी


भाजपा, पार्टी विद द डिफरेंस। यह आडवाणी की सोच थी। सोच नहीं आडवाणी का राजनीतिक अनुशासन था। भाजपा के उदय के साथ उन्होंने जीवन भर कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो कड़ाई से इसका पालन किया। शत्रुघ्न सिन्हा को आडवाणी ने तीसरी बार राज्यसभा में भेजने का निर्णय नहीं लेने दिया। उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ना पड़ा। उमा भारती एक प्रकरण बताती हैं। स्वदेशी जागरण मंच की यात्रा चल रही थी। रथ पर आडवाणी की पत्नी कमला आडवाणी बैठी थीं। उमा समेत कई भाजपा के युवा नेता भी उसी ट्रक पर थे। उसमें एक कोक की क्रेट रखी थी। अचानक कमला आडवाणी को कोक की तलब लगी। लोगों ने एक बोतल निकालकर उन्हें पकड़ाई। 

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उस समय आडवाणी रथ से लोगों को संबोधित कर रहे थे। आडवाणी जैसे ही अपना भाषण समाप्त करके पीछे आए, पत्नी के हाथ में कोक की बोतल देखी। गुस्से से आग बबूला आडवाणी ने आव देखा न ताव पूरी क्रेट उठाकर चलती गाड़ी से नीचे फेंक दी। कभी आडवाणी की टीम में शामिल और अब मौजूदा सरकार में युवा कद्दावर मंत्री का कहना है कि भाजपा यूं ही नहीं खड़ी हुई। यह आडवाणी के खून और पसीने से सींची हुई पार्टी है। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, उमा भारती, नरेंद्र मोदी जैसे नेता राष्ट्रीय राजनीति में छा पाने में सफल हुए तो इसमें आडवाणी का बड़ा योगदान है। 

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यह नई भाजपा है

Lok Sabha Elections 2019: How Narendra modi and Amit Shah leadership changed bjp in five years
भाजपा (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया

यह नई भाजपा है। भाजपा अब सिद्धांत और प्रयोग पर नहीं बल्कि स्थान, काल, पात्र और अवसर को ध्यान में रखकर चल रही है। इस अवसर का मुख्य ध्येय समय पर इसे भुनाना और किसी भी सूरत में सत्ता के रास्ते को तय करना है। आडवाणी ने शत्रुघ्न सिन्हा को तीसरी बार राज्यसभा में भेजने पर अड़ंगा  लगाया, लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इसमें कोई परहेज नहीं किया। कमला आडवाणी का कोक पीना लाल कृष्ण आडवाणी को रास नहीं आया। भाजपा अब अवसर को केन्द्र में रखकर प्रयोगवादी हो गई है। अटल और आडवाणी के युग तक भाजपा में सिद्धांत से समझौता कम हुआ। जोड़-तोड़ की सरकार की पहल कम हुई। राजनीतिक मर्यादा में कमर के नीचे वार से परहेज किया गया। इसी आधार पर आडवाणी कहा करते थे पार्टी विद द डिफरेंस।
इस समय कर्नाटक में भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा लगातार सरकार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा ने पिछले पांच साल में गोवा, बिहार, उत्तराखंड, मणिपुर में सरकार बनाने के लिए अपने सभी घोड़े खोल दिए।  

सफरनामा 


1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की थी। 1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हुआ और 1980 में भाजपा गठित हुई। अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले संस्थापक अध्यक्ष थे। आडवाणी और जोशी संस्थापकों में रहे। भाजपा के पास 1984 में दो सांसद थे। 1989 के आम चुनाव बाद पार्टी के 86 सांसद जीते और 1996 में 13 दिन की सरकार सत्ता में रही। 1998 के चुनाव में 13 महीने की भाजपा के गठबंधन की सरकार सत्ता में रही और अक्टूबर 1999 में सरकार ने सत्ता में वापसी की। 26 मई 2014 को भाजपा ने केन्द्र में अपनी पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का लक्ष्य हासिल किया| सहयोगियों को साथ रखकर भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए की मोदी सरकार ने सत्ता संभाली। 

इस समय पार्टी के पास 11 करोड़ से अधिक सदस्यों का परिवार, केन्द्र में सरकार, 16 राज्यों में सरकार है। कभी यह आंकड़ा 19 राज्यों का था। महाराष्ट्र और उ.प्र. जैसे राज्य में अपने बूते पर पूर्ण बहुमत की सरकार है और भाजपा दक्षिण के राज्यों में अपना पैर पसार रही है। पूर्वोत्तर में सत्ता पर काबिज है। यह बदली हुई भाजपा है जहां केन्द्रीय नेतृत्व के फैसले को पार्टी के नेता और कार्यकर्ता असहमत होने के बाद भी मान रहे हैं, मानते हुए दिखाई दे रहे हैं।

प्राकृतिक बदलाव है

Lok Sabha Elections 2019: How Narendra modi and Amit Shah leadership changed bjp in five years
आडवाणी (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया

याद कीजिए 2003 को। अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और विचारांतर के कारण लालकृष्ण आडवाणी और उनके गुट के नेताओं से दूरी बन रही थी। इससे करीब साल भर पहले इन स्थितियों को पाटने के लिए 29 जून 2002 को आडवाणी को देश का उप प्रधानमंत्री बनाया गया था। लेकिन अंतत: अटल जी ने खुद का कदम पीछे खींचते हुए 2004 का आम चुनाव आडवाणी के नेतृत्व में लड़ने का वक्तव्य दे दिया था। भारतीय राजनीति में संकीर्णता के रोग को त्यागकर भाजपा ने इस मामले में प्राकृतिक बदलाव को अपनाया है। अब पार्टी में इस तरह का कोई घमासान फिलवक्त नहीं है। है भी तो सार्वजनिक नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कड़े फैसले लकर अनुशासन में नए बदलाव को आगे बढ़ाया है। 

91 साल के आडवाणी लोकसभा चुनाव प्रचार, धूल, धूप झेलने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में आडवाणी, जोशी, कलराज, खंडूरी जैसे उम्रदराज नेता राजनीति में कब तक? इसलिए उन्हें इससे अलग रखा जाना चाहिए। पार्टी के भीतर सक्रिय राजनीति, और पद प्राप्त करने की भी एक उम्र सीमा होनी चाहिए। भाजपा ने इसे आगे बढ़ाया है। राजनीति में युवा और नए चेहरे को प्रचुर अवसर मिलना चाहिए। पार्टी ने जिस तरह से हिमाचल, उत्तराखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, त्रिपुरा, उ.प्र. में कम उम्र के मुख्यमंत्री बनाए हैं, यह पहले की भाजपा में नहीं था। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार में रक्षा, रेल, कपड़ा, सूचना प्रसारण, बिजली, पिट्रोलियम एवं रसायन,सांख्यिकी,खाद्य प्रसंस्करण, भारी उद्योग और सार्वजनिक उपक्रम, संस्कृति, दूर संचार, ऊर्जा, शहरी विकास जैसे मंत्रालय या तो युवा चेहरों के पास हैं या फिर पहली बार संसद भवन पहुंचने वाले सदस्यों के पास।  

आज तमाम प्रदेशों में भाजपा की कमान युवा चेहरे के हाथ में हैं। भाजपा के एक शीर्ष नेता भी मान रहे हैं कि इसमें बहुत से निर्णय आसान नहीं है। मसलन भाजपा के मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव से राजनीतिक दल को मुक्त रखना। संघ के ही एक पुराने चिंतक का कहना है कि राम मंदिर निर्माण हो या जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्ज छीनने का मामला, केन्द्र की सरकार ने अपनी मर्यादा को बनाए रखा है। 

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