विश्लेषण: भोपाल में दिग्विजय-प्रज्ञा की भिड़ंत से दो राजनीतिक धाराओं पर बहस, जीतेगा लोकतंत्र ही
- एक तरफ हिंदुत्व की ध्वजवाहक ठाकुर हैं, जो मानती हैं कि 'धर्मयुद्ध' है यह चुनाव
- दूसरी तरफ गांधीवादी धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे की पताका थामे हैं दिग्विजय सिंह
- भोपाल चुनाव के बहाने राजनीतिक धाराओं पर बहस लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत
विस्तार
कौन कहता है कि राजनीति से विचार खत्म हो गया है? दो विचारधाराओं के टकराव की वजह से भोपाल लोकसभा चुनाव देश के सबसे चर्चित और दिलचस्प चुनावों में से एक बन चुका है। पहले इस चुनाव में दिलचस्पी केवल प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों को लेकर थी। कांग्रेस ने राजनीतिक दुस्साहस का परिचय देते हुए बीजेपी के इस गढ़ से मध्यप्रदेश के महारथी दिग्विजय सिंह को खड़ा किया है। भाजपा ने लंबी खोज के बाद हिंदुत्व के अपने ताजा-तरीन प्रतीक प्रज्ञा सिंह ठाकुर को मैदान में उतारा है।
धीरे-धीरे यह चुनाव दो विचारधाराओं की जोर आजमाइश का अखाड़ा बन गया है। दिग्विजय को उनकी पार्टी के बाहर से भी समर्थन मिल रहा है। इसमें कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा जावेद अख्तर जैसे प्रगतिशील शामिल हैं। विचारधारा के आधार पर चुनाव लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण है, क्योंकि हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब नेताओं ने विचारधारा को ताक पर रख दिया है, और राजनीति में विचारशून्यता को तमगे की तरह पहना जा रहा है।
भोपाल का चुनावी माहौल ताजी हवा के झोंके की तरह है। यह हमें प्रजातंत्र के भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। आतंकवादी गतिविधियों की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर की उम्मीदवारी को लेकर लेफ्ट-लिबरल कितने भी सवाल खड़े करें, यह नहीं भूलना चाहिए कि वे एक राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती हैं।
यह विचारधारा अभी तक भले हाशिए पर रही हो, पर हाल के वर्षों में वह राजनीति की मुख्यधारा में प्रतिष्ठा हासिल कर चुकी है। केंद्र सरकार के दो मंत्रियों को याद करें। गिरिराज सिंह मोदी विरोधियों को पाकिस्तान जाने की सलाह दे चुके हैं। साध्वी निरंजन ज्योति लोगों को रामजादों और हरामजादों में फर्क करने का नारा बुलंद कर चुकी हैं।
भाजपा ने काफी सोचकर ठाकुर को चुना है। ऐसा नहीं कि उसके पास दिग्विजय सिंह से मुकाबले के लिए योग्य उम्मीदवारों की कमी थी। उसके पास लोकप्रिय शिवराज सिंह चौहान थे, जिन्होंने 13 वर्षों तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाया था। करिश्माई व्यक्तित्व वाली उमा भारती थीं, जिन्होंने 15 साल पहले दिग्विजय राज का खात्मा किया था।
भूतपूर्व सीएम बाबूलाल गौर थे, जिनके खाते में लगातार दस बार भोपाल से विधायक बनने का यश दर्ज है, हर दफा बढ़े हुए मार्जिन के साथ! पर भाजपा ने ठाकुर को चुना। वे 2008 के मालेगांव बम धमाकों की आरोपी हैं, जिसमें 6 लोग मारे गए थे और 101 घायल हुए थे।
'साधु का चोला, रुद्राक्ष की माला और चंदन का टीका'
भाजपा का एजेंडा साफ है- साधु का चोला, रुद्राक्ष की माला और चंदन का टीका धारण किए जमानत पर रिहा 49 वर्षीय साध्वी, पार्टी में उस भगवा शृंखला की कड़ी हैं, जहां से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय मंत्री उमा भारती और सांसद साक्षी महाराज जैसे नेता आते हैं।
बीहड़ों, बागियों और बंदूकों की संस्कृति के लिए विख्यात चम्बल घाटी के भिंड से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाली ठाकुर पहले आरएसएस के छात्र संगठन विद्यार्थी परिषद से जुड़ी थीं। महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद विरोधी दस्ते ने उन्हें मालेगांव ब्लास्ट के सिलसिले में गिरफ्तार किया। वे नौ साल जेल में रहीं। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद जांच एजेंसी ने मुकदमा वापस लेने की कोशिश की, पर अदालत ने मना कर दिया।
साल 2008 में संघ परिवार के सुनील जोशी की सनसनीखेज हत्या के सिलसिले में भी मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया था, पर पुलिस आरोप साबित नहीं कर पाई। सारे आरोपी बरी हो गए। हत्याकांड की गुत्थी आज तक रहस्य है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस ने ठाकुर और उनके साथियों को झूठे मुकदमों में फंसाया था।
पीएम मोदी का प्रतीकात्मक जवाब
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुताबिक भगवा आतंकवाद का ‘झूठ’ गढ़ने वालों के लिए साध्वी की उम्मीदवारी एक प्रतीकात्मक जवाब है, पर जवाब थोड़ा भोंडा है। ठाकुर कभी मुंबई आतंकवादी हमले के शहीद हेमंत करकरे को ‘श्राप’ देती नजर आती हैं तो, कभी ऐलान करती हैं कि उन्होंने खुद बाबरी मस्जिद को तोड़ा था और, ऐसा कर एक ‘कलंक’ मिटा दिया था। चुनाव आयोग जब उनके प्रचार पर पाबंदी लगाता है तो, वे मंदिरों में लाल चुनरी ओढ़े झूम-झूमकर भजन-कीर्तन करती हैं। उन्हें मालूम है कि चुनाव को किस दिशा में ले जाना है।
भाजपा ने हिंदुत्व के इस कट्टर चेहरे को दिग्विजय के खिलाफ इसलिए खड़ा किया है क्योंकि वे संघ के घोर विरोधी हैं। वे संघ पर आतंकी गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप लगा चुके हैं। संघ भी उन्हें हिंदू-विरोधी साबित करने में लगा रहता है। विडम्बना यह है कि व्यक्तिगत जीवन में सिंह निहायत धर्मभीरु और कर्मकांड वाले सनातनी हिंदू हैं। वे कोई उपवास नहीं छोड़ते और सारे पर्व-त्योहारों पर तीरथ जाते रहते हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए एक दफा तो पूरी कैबिनेट लेकर गोवर्धन-परिक्रमा पर गए थे। लौटते में मंत्रियों के पैरों में छाले थे।
पिछले साल ही उन्होंने 3300 किलोमीटर की नर्मदा यात्रा पैदल पूरी की। पर, धर्म उनके लिए व्यक्तिगत आस्था का विषय है। यह हमारे समय की त्रासदी है कि उनके समर्थक इस चुनाव में घरों में नर्मदा जल बांट रहे हैं। आज पूरे देश की नजर भोपाल के चुनाव पर है। एक तरफ हिंदुत्व की ध्वजवाहक ठाकुर हैं, जो मानती हैं कि यह चुनाव ‘धर्मयुद्ध’ है। दूसरी तरफ गांधीवादी धर्मनिरपेक्षता, भाईचारे और गंगा-जमुनी तहजीब की पताका थामे सिंह हैं। राजनीतिक फलक पर विचारधारा की वापसी स्वागतयोग्य है। दो विचारधाराओं की इस लड़ाई में हारे कोई भी, जीतेगा लोकतंत्र।