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Hindi News ›   Rajpath ›   Lok Sabha chunav 2019: Reality of amount spent by candidates fighting election and reports to EC

चुनाव प्रचार में नेताजी को 70 लाख के खर्च की आजादी लेकिन असल में कितना होता है खर्च?

Sat, 18 May 2019 03:43 PM IST
Prachi Priyam चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Prachi Priyam Updated Sat, 18 May 2019 03:43 PM IST
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Lok Sabha chunav 2019: Reality of amount spent by candidates fighting election and reports to EC
प्रचार में पैसा स्वाहा - फोटो : Amar Ujala

कहने को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए हर उम्मीदवार को 70 लाख रुपये तक खर्च करने की सीमा निर्धारित की गई है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। अनाधिकारिक आंकड़ों में ये संख्या आसमान छूती है। बाकी बात छोड़ भी दें तो चुनाव आयोग ने अब तक लगभग 3,361 करोड़ रुपए के बराबर की तो नकदी समेत शराब, ड्रग और अन्य अवैध चीजें जब्त की है। 2014 में यह मूल्य 1400 करोड़ रुपए था। मतलब 2019 में जब्त किए गए चुनाव से संबंधित अवैध चीजों की कीमत 2014 के मुकाबले दोगुनी है।

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देश के कई राज्यों में 'नोट दो-वोट लो' का फॉर्मूला काफी इस्तेमाल में लाया जाता है। इसमें सबसे आगे तमिलनाडु खड़ा है, जहां से इस बार चुनाव आयोग ने 944 करोड़ रुपए जब्त किये हैं। उसके बाद 545 करोड़ रुपए की जब्ती के साथ गुजरात का नाम आता है। दिल्ली, पंजाब और आंध्र प्रदेश भी इस रेस में पीछे नहीं है। अब तक जब्त की गई अवैध राशि का लगभग 70 प्रतिशत इन्हीं पांच राज्यों से आता है।

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क्यों होता है अवैध पैसे का इस्तेमाल?

राजनीतिक पार्टियों का मानना है कि चुनाव आयोग ने जो खर्च सीमा निर्धारित की है वह चुनाव लड़ने में आने वाले खर्च के हिसाब से अवास्तविक और अव्यवहारिक है। चुनाव लड़ने में कई जगह, कई तरह से पैसे खर्च होते हैं, और यह 70 लाख रुपए में संभव नहीं है। यही कारण है कि अवैध तरीके से पैसे का इस्तेमाल कर जीत सुनिश्चित करने की लड़ाई बढ़ती ही जा रही है।

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देखिए कहां किस हिसाब से खर्च होते हैं पैसे?

रैली आयोजन का खर्च (अनुमानित)

दरअसल एक प्रत्याशी चुनाव प्रचार के लिए लगभग 30-35 रैलियां करता है। एक सामान्य चुनावी रैली के लिए अनुमानित खर्च लगभग 20 से 30 हजार रुपए होता है। ऐसे में अगर एक प्रत्याशी 20 सामान्य रैलियां भी करता है, तो केवल रैलियों का खर्च ही करीब 10 लाख रुपए हो जाता है। 


आने जाने का खर्च (अनुमानित)-

अब रैलियों में आवाजाही का खर्च भी उम्मीदवारों को खुद ही उठाना होता है। अगर एक उम्मीदवार आने-जाने के समय समेत 4 घंटे की 20 रैलियां करता है तो सबसे सस्ते सिंगल इंजन वाले हेलिकॉप्टर का खर्च 65 हजार रुपए प्रति घंटे के हिसाब से 52 लाख रुपए हो जाता है। डबल इंजन के हेलिकॉप्टर के लिए ये खर्च कहीं ज्यादा ठहरता है।


विज्ञापनों का खर्च (अनुमानित)-

इन सब के अलावा प्रचार के अन्य माध्यम जैसे होर्डिंग, अखबार में विज्ञापन, पार्टी झंडे और सोशल मीडिया विज्ञापन पर भी मोटी रकम खर्च होती है। जैसे विज्ञापन के लिए लगाए जाने वाले होर्डिंग का दाम लगभग 1-1.5 लाख रुपए प्रति माह होता है। अगर एक उम्मीदवार 10 होर्डिंग लगवाता है, तो उसका खर्च 10 लाख रुपए हो जाएगा। सोशल मीडिया पर विज्ञापन लोगों की संख्या पर निर्भर करता है, और उसका खर्च लगभग 50 हजार से एक लाख रुपए तक होता है। कुल मिला कर करीब 10 से 15 लाख रुपए केवल विज्ञापनों में खर्च होते हैं। 

कुल खर्च (अनुमानित)-

इन सब के अलावा उम्मीदवारों की तरफ से एक मोटी रकम जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को खुश करने के लिए और लोगों को सीधे पैसे का लालच देने में खर्च की जाती है। हाई प्रोफाइल सीटों में यह रकम बढ़ कर 50 करोड़ रुपए हो जाती है।

अब इन अनुमानित खर्चों के आधार पर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि नोटों की पोटली टांग कर मैदान में पहुंचे उम्मीदवारों का वास्तविक चुनावी खर्च कितना होता होगा। उपर दिए गए अनुमानित आंकड़ों के हिसाब से एक उम्मीदवार का खर्च कम से कम 5 करोड़ के आसपास होता है।

ऐसे पैसा फेंक चुनाव में महज 70 लाख रुपए की वैधानिक राशि न जाने कहां गुम हो जाती होगी। 

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