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राष्ट्रपति चुनाव: संघ की पसंद भी नहीं रह पाए आडवाणी!

Tue, 13 Jun 2017 06:51 PM IST
संजय मिश्र, नई दिल्ली
संजय मिश्र, नई दिल्ली Updated Tue, 13 Jun 2017 06:51 PM IST
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lal krishna adwani is not first choice for president post of RSS
लाल कृष्ण आडवाणी
भाजपाई राजनीति में हाशिए पर धकेल दिए गए लाल कृष्ण आडवाणी अब संघ की पसंद के रूप में भी अपना स्थान गंवा चूके हैं। राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए अपनी पसंद के रूप में संघ ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सामने जो नाम रखा है उसमें आडवाणी का नाम नहीं है। सूत्र बताते हैं कि पूर्व भाजपा अध्यक्ष एवं कानपुर से सांसद डा मुरली मनोहर जोशी अब भी संघ के प्रिय हैं। राजनीतिक विवशताओं के वजह से उनका नाम राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में परवान नहीं चढ पाए। मगर संघ नेतृत्व की नजरों में वे अब भी पसंदीदा बने हुए हैं। राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए संघ ने अपनी पसंद के रूप में जोशी, यूपी के राज्यपाल राम नाईक, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के नाम को आगे बढाया है। हालांकि उम्मीदवारी के नाम पर अंतिम निर्णय पीएम मोदी को लेना है। मगर बीते दो सप्ताह पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत के दिल्ली प्रवास के दौरान अमित शाह ने उनसे मुलाकात की थी। संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक की मानें तो भागवत ने इस मुलाकात में हीं शाह को अपनी पसंद से अवगत कराया था। अब राष्ट्रपति उम्मीदवार चयन के लिए समिति का गठन कर अमित शाह ने प्रक्रिया को तेज कर दिया है। 
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संघ में भी आडवाणी क्यों पडे अलग थलग 
एक समय में संघ और पीएम मोदी के सबसे प्रिय रहे आडवाणी आज दोनों के अप्रिय हो गए हैं। माना जा रहा है कि समय के साथ कदमताल न कर पाना ही आडवाणी की मुख्य कमजोरी रही। वर्ष 2013 में पीएम मोदी की चुनाव अभियान समिति का प्रमुख और पीएम पद की उम्मीदवारी का विरोध कर आडवाणी न सिर्फ मोदी से दूर हुए बल्कि संघ ने भी उनसे अंदरूनी दूरी बरतनी शुरू कर दी। मोदी के विरोध में आडवाणी का इस्तीफा भी संघ को रास नहीं आया था। संघ के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार उम्र के इस पडाव पर आडवाणी समय का रूख भांप नहीं पाए। मार्गदर्शक की भूमिका में आने के बजाय आडवाणी हमेसा सक्रिय राजनीति की ही सोचते रहे। मोदी के पीएम बनने के बाद उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष सरीखे संवैधानिक पद की मंशा पाल ली। वह भी पूरी नहीं हो सकी। सूत्र बताते हैं कि राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को अपनी पसंद जताने से चंद दिनों पहले एक केंद्रीय मंत्री ने मामले में पीएम मोदी से भी मुलाकात की थी। उक्त मंत्री ने पीएम के समक्ष राष्ट्रपति पद के लिए आडवाणी के नाम की चर्चा की। इसपर पीएम मोदी का रूख सकारात्मक नहीं रहा। शायद यही वजह है कि संघ ने भी आडवाणी से पूरी तरह किनारा करना ही मुनासीब समझा है। 
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महज कागजी शेर नहीं रहेगी समिति 
राष्ट्रपति उम्मीदवार चयन के लिए शाह के जरिए बनी समिति महज कागजी शेर बनकर नहीं रहेगी। बल्कि अपना कार्य बखूबी पूरा भी करेगी। यही वजह है कि समिति गठन करने के एक दिन बाद खुद शाह ने समिति के दो अहम सदस्यों केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू और अरूण जेटली से अलग—अलग मुलाकात कर उन्हें आगे के रोडमैप से अवगत कराया है। बताया जा रहा है कि गृहमंत्री राजनाथ के पूर्वोत्तर भारत के दौरे से लौटने के तुरंत बाद ही शाह उनसे भी मुलाकात करेंगे। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति उम्मीदवार चयन को लेकर विपक्ष की ओर से शुरू हुई राजनीतिक चहलकदमी को थामने की कवायद में ही शाह ने अपना अरूणाचल प्रदेश का दौरा रद्द करते हुए मामले में तेजी दिखाई है। एक वरिष्ठ भाजपा नेता के अनुसार शाह के जरिए उम्मीदवार चयन के लिए बनी समिति मार्गदर्शक मंडल की तरह नहीं रहेगी। बल्कि जल्द ही तीनों नेता विपक्षी दल के नेताओं से मिलकर राष्ट्रपति उम्मीदवार पर सहमति बनाने का प्रयास करते नजर आएंगे।
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मुश्किल से बन पाएगी संघ के चेहरों पर विपक्ष की सहमति 
संघ की पसंद को यदि भाजपा ने अपने पसंद के रूप में आगे बढाया तो समिति के सदस्यों को विपक्ष की सहमति बनाने में काफी मुश्किलें आएंगी। संघ ने जोशी, नाईक, सुमित्रा और सुषमा के नाम को आगे बढाया है। इन चारों नामों में गुण और दोष दोनों हैं। जोशी का चेहरा सीधे संघ के विचार पुरूष के रूप में पहचाना जाता है। तो राममंदिर मामले में हाल ही में सीबीआई ने दोबारा से उनपर मामला शुरू किया है। ऐसे में संभावना कम ही है कि विपक्ष उनके नाम पर अपनी सहमति प्रदान करे। वहीं राम नाईक का चेहरा महाराष्ट्र की राजनीति के लिए अहम हो सकता है। उनके नाम को आगे कर भाजपा शिवसेना को थामे रखने के साथ शरद पंवार की रांकपा को तोडकर विपक्षी एकता में दरार डालने का खेल खेल सकती है। मगर उनके जरिए पार्टी 2019 लोकसभा चुनाव के लिए कोई बडा राजनीतिक संकेत नहीं दे पाएगी। सुमित्रा और सुषमा का चेहरा ही ऐसा है जिसके आम राय से राष्ट्रपति बनने के आसार ज्यादा हैं। इनके जरिए भाजपा का राजनीतिक समीकरण भी फिट बैठ रहा है। दोनों ही ब्राह्ण बिरादरी से हैं। सुमित्रा को शिवसेना और शरद पंवार का भी साथ मिल जाएगा। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी उनके रिश्ते बंहत्तर हैं। वर्ष 2015 में महाजन के पोती की मन की बात को पूरा करने के लिए सोनिया गांधी अपनी बेटी प्रियंका को लेकर उनके निवास पधारी थीं। महाजन की पोती को प्रियंका से मिलने की इच्छा थी। इस इच्छा को पूरा करने खुद सोनिया अपनी बेटी को लेकर महाजन के निवास पर पहुंची थी। ऐसी ही स्थिति सुषमा स्वराज के साथ भी हैं। पिछले दस वर्षों से संसदीय राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाली सुषमा के सोनिया समेत विपक्ष के सभी नेताओं संग बेहत्तर संबंध हैं। 
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