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परिसीमन संशोधन विधेयक: सरकार का विपक्ष को जवाब, रिजिजू ने खरगे को पत्र लिखकर क्या बताया? सहयोग पर कही ये बात

Mon, 19 Oct 2026 05:50 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Mon, 19 Oct 2026 05:50 PM IST
सार

परिसीमन संशोधन विधेयक पर चर्चा से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग को लेकर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखा है। उन्होंने सरकार के बातचीत के प्रयासों का ब्योरा दिया और संसद के सत्रावसान पर भी तर्क रखे। आखिर खरगे ने प्रधानमंत्री से क्या मांग की थी? सरकार ने विपक्ष से कब-कब संपर्क किया? रिजिजू ने कांग्रेस से किस तरह के सहयोग की अपील की? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

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Kiren Rijiju Letter to Mallikarjun Kharge on Delimitation Amendment Bill
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने परिसीमन संशोधन विधेयक पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखा है। 19 अक्तूबर 2026 को लिखे इस पत्र में रिजिजू ने सरकार की ओर से विपक्ष से बातचीत के लिए किए गए प्रयासों का ब्योरा दिया। उन्होंने कहा कि सरकार इस विधेयक पर चर्चा और विपक्ष के सहयोग के लिए लगातार प्रयास करती रही है। साथ ही उन्होंने कांग्रेस से महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा में रुकावट डालने के बजाय रचनात्मक भूमिका निभाने की अपील की।

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खरगे ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर क्या मांग की थी?
रिजिजू ने अपने पत्र में बताया कि खरगे ने 16 अक्तूबर 2026 को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर परिसीमन संशोधन विधेयक को संसद में विचार के लिए लाए जाने से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी। इसके जवाब में रिजिजू ने सरकार की ओर से विपक्ष के साथ हुई बातचीत और पत्राचार का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सरकार इस विधेयक पर विपक्ष का समर्थन और सहयोग मांगती रही है। पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार संसद में चर्चा और विचार-विमर्श के लिए तैयार है।
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संसद का सत्रावसान नहीं होने पर रिजिजू ने क्या तर्क दिया?

  • रिजिजू ने खरगे की इस टिप्पणी का जवाब दिया कि 13 अगस्त 2026 को लोकसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के 64 दिन बाद भी संसद का सत्रावसान नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि संविधान में ऐसी कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं है, जिसके भीतर सदन की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद सत्रावसान करना अनिवार्य हो। उनके मुताबिक, केवल इस आधार पर कि संसद का सत्रावसान नहीं हुआ है, किसी संवैधानिक या प्रक्रियागत अनियमितता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
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  • रिजिजू ने अपने पत्र में इसके समर्थन में पुराने उदाहरण भी दिए। उन्होंने बताया कि अतीत में कई बार संसद लंबे समय तक बिना सत्रावसान के रही है। उनके अनुसार, 2008 में लोकसभा 21 और 22 जुलाई को विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के लिए बैठी थी। इसके बाद सदन 17 अक्तूबर को फिर बैठा और 24 अक्तूबर को स्थगित हुआ, जबकि अगली बैठक 10 दिसंबर को हुई। उन्होंने 1987 में 76 दिन, 1989 में 54 दिन, 2006 और 2013 में 49-49 दिन तथा 1963 में 41 दिन के अंतराल का भी उल्लेख किया।


सरकार ने परिसीमन विधेयक पर विपक्ष से कब-कब संपर्क किया?
रिजिजू ने कहा कि सरकार ने कांग्रेस से कई बार बातचीत करने की कोशिश की है। उन्होंने पत्र में लिखा कि उन्होंने 16 मार्च, 26 मार्च और 12 अप्रैल 2026 को खरगे को इस विषय पर पत्र लिखे थे। इसके अलावा, उन्होंने व्यक्तिगत रूप से भी खरगे से चर्चा कर विधेयक पर समर्थन और सहयोग मांगा था। रिजिजू के मुताबिक, मानसून सत्र के दौरान उन्होंने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से भी मुलाकात कर इस मुद्दे पर सहयोग मांगा था।

दूसरी पार्टियों से चर्चा का हवाला देकर रिजिजू ने क्या कहा?

  • रिजिजू ने पत्र में कहा कि कांग्रेस की ओर से चर्चा के लिए तारीखें नहीं दिए जाने के बाद सरकार ने अन्य राजनीतिक दलों से संपर्क किया। इस दौरान द्रमुक, समाजवादी पार्टी, वाईएसआरसीपी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, शिवसेना (यूबीटी), एआईएमआईएम और बीजद के प्रतिनिधियों से बातचीत की गई। उनका उद्देश्य विधेयक पर चर्चा को आगे बढ़ाना और व्यापक सहमति बनाना था।
  • रिजिजू ने कहा कि सरकार संसद में सार्थक चर्चा और सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कांग्रेस से अपील की कि वह भी रचनात्मक सहयोग करे और भविष्य में महत्वपूर्ण विधेयकों की प्रक्रिया में बाधा न डाले। हालांकि, पत्र में सरकार ने परिसीमन संशोधन विधेयक के प्रावधानों का विस्तृत विवरण नहीं दिया है। पत्र का मुख्य जोर विपक्ष से बातचीत के लिए सरकार की ओर से किए गए प्रयासों और संसद की प्रक्रिया को लेकर दिए गए तर्कों पर है।
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