कानों देखी: निर्मला के बजट में जेटली की छाप, ठन ठनाठन लालू परिवार
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केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में लाल कपड़े में ब्रिटिश शाही को धता बताकर अंग्रेजी में बजट पेश कर दिया है, लेकिन आईआरएस कॉडर के अधिकारियों को इसमें पूर्व केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली की छाप दिखाई पड़ रही है। अफसरशाही का मानना है कि निर्मला के इस बजट पर जेटली का आशीर्वाद साफ दिखाई दे रहा है। जेटली ने भी अपने बजट में अमीरों पर कर बढ़ाया था। निर्मला ने और बढ़ा दिया। जेटली ने अपने बजट में वित्तीष घाटे को नियंत्रण में रखा तो निर्मला ने भी 3.3 प्रतिशत ही रखा। जेटली ने कच्चे तेल के गिरते दामों के बीच हाई दाम पर पेट्रोल डीजल बेचा। निर्मला ने सीधे दो-दो रुपये सेस लगा दिया।
इतना ही नहीं वित्त मंत्री बनते ही निर्मला पहले 2, कृष्णमेनन मेनन मार्ग पर जेटली का आशीर्वाद लेने गई थी। बजट पेश करने से पहले कैलाश कालोनी के मकान में शिफ्ट हुए जेटली का आशीर्वाद भी लेने फिर गई। जाएं भी तो क्यों न। जेटली के कुर्सी खाली करने पर वित्तमंत्री पीयुष गोयल को बनना था। साफ संकेत मिल गए थे और जब प्रधानमंत्री जेटली से मिलने गए तो पिटारे से नाम निर्मला का निकला। निर्मला सीतारमण भी यह कैसे भूल जाएं कि वित्त मंत्री से पहले रक्षा मंत्री और रक्षा मंत्री से पहले वाणिज्य एवं उद्योग में भी जेटली ने ही उनके कौशल को पहचाना था। ब्रिगेड जेटली भी मानती है कि निर्मला सीतारमण जितनी तेजतर्रार हैं, उतनी ही वफादार भी। इगो तो बिल्कुल भी नहीं है।
अमित शाह ने मंत्री बनने के बाद डाल दी है जान
केंद्रीय गृहमंत्री बनने के बाद से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने संसद के दोनों सदनों में पार्टी में जान डाल दी है। सबको पता है कि शाह प्रधानमंत्री मोदी के बाद सबसे प्रभावी हैं। वह पार्टी के अध्यक्ष भी हैं। संगठन पर मजबूत पकड़ रखने वाले शाह अनुशासन, बेलाग चर्चा में यकीन रखते हैं। जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाने संबंधी प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान अमित शाह ने पार्टी लाइन पर बेबाक वक्तव्य देकर जम्मू-कश्मीर से कन्या कुमारी तक भाजपा को पॉवर बूस्टर दे दिया है। इतनी ही नहीं वह दक्षिण में कमल खिलाने की योजना पर काम कर रहे हैं। उनके निशाने पर केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना है। तमिलनाडु को लेकर भी दिमाग में प्लान तैयार हो रहा है।
शाह भाजपा के पहले नेता है, जिनके पास गृहमंत्रालय होने के साथ-साथ भाजपा अध्यक्ष का अभी जिम्मा है, क्योंकि भाजपा के संविधान में जेपी नड्डा को मिला कार्यवाहक अध्यक्ष का कोई स्थान नहीं है। सनद रहे कि यह पॉवर न तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पा सके और न हीं कभी लालकृष्ण आडवाणी के ही पास आ सका। इतना ही नहीं शाह के गृहमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उत्तराधिकारी बनने का सपना पालने वाले नेताओं और कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी अपना भविष्य पढ़ लिया है। वह अब सावधान होकर खुद को सुरक्षित करने में लग गए हैं।
रुद्रावतार में तेज प्रताप...ठन ठनाठन लालू परिवार
लालू यादव बिहार के कभी कद्दावर नेता थे। अब रांची में कस्टडी में रहकर स्वास्थ्यलाभ ले रहे हैं। पुत्र तेज प्रताप खुली धमकी दे रहे हैं कि जो उनके और तेजस्वी के बीच में आएगा, सुदर्शन चक्र......। तेज प्रताप निराले हैं। बीबी से पटी नहीं। मथुरा वृंदावन से लेकर पटना तक रुद्रावतार बने हैं। जटाधारी, त्रिशूलधारी, शिव अवतार में नजर आते हैं। मूड में आया तो ध्वंस विध्वंस की धमकी देने में देर नहीं लगाते। तेज प्रताप के इस रुख से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का खेमा खुश रहता है।
मीसा भारती की टीम भी उम्मीद लगाए रहती है। अभी हाल में पार्टी स्थापना दिवस मना रही थी। लालू यादव को जमानत नहीं मिल पाई तो रघुवंश प्रसाद समेत अन्य के साथ राबड़ी को नेता की औपचारिकता पूरी करनी पड़ी। स्थापना दिवस का कार्यक्रम चल ही रहा था कि अचानक तेज प्रताप त्रिशूल लेकर प्रकट हो गए। प्रकट ही नहीं हुए बल्कि लालू प्रसाद के उत्तराधिकार बनकर जम गए। वहीं तेजस्वी हैं कि सामने खड़ी चुनौतियां देखकर उनका सिर चकरा रहा है। तेजस्वी एक नहीं कई मोर्चे पर लड़ रहे हैं। विधानसभा चुनाव आने वाला है, लोकसभा चुनाव में अरमानों पर पानी फिर गया। डगमगाती नाव में मीसा भारती एक तरफ तो तेज प्रताप एक तरफ अवतार में हैं। अविवाहित तेजस्वी का अपना भी मिजाज है और इसमें कई राजद के बड़े नेताओं चाल तिरछी हुई जा रही है।
चुल्लूभर पानी में कैसे डूब गई कांग्रेस किश्ती?
इसका दर्द कोई कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से पूछ ले। सच पूछिए को राहुल बहुत तंग चल रहे हैं। उनकी युवा ब्रिगेड के देशभर के नेता बहुत आहत हैं। सुष्मिता देव, मिलिंद देवड़ा, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत सबके भीतर आग धधक रही है। आग राहुल और प्रियंका के भीतर भी धधक रही है। वहीं यूपीए चेयरपर्सन भी हालात देखकर हैरान और हतप्रभ हैं। सबकी जड़ में बस युवा और वरिष्ठ नेताओं की बढ़ी खाई है। राहुल ब्रिगेड का मानना है कि गुजरात चुनाव में अच्छी सीटें आई तो सफलता अशोक गहलोत समेत कई ले उड़े। म.प्र. में चुनाव जीते तो दिग्विजय, कमलनाथ समेत अन्य की जोड़ी ले उड़ी। राजस्थान में चुनाव जीते तो वहां भी श्रेय लेने वालों की कमी नहीं रही। यही नहीं राजस्थान, म.प्र., छत्तीसगढ़ में कुर्सी पाने के लिए भी होड़ मच गई।
लोकसभा चुनाव में केवल 52 सीटें आई तो निबट गए राहुल गांधी और चुक गई प्रियंका। असल का दर्द इसी का है। इतना ही नहीं चुनाव प्रचार के दौरान वह कई मोड़ पर कांग्रेस अध्यक्ष अकेले नजर आए। राहुल कुछ इसी तरह का दर्द अपने वफादार युवा कांग्रेस नेताओं से भी साझा कर रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष का आज भी मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के लिए 2019 का चुनाव आसान नहीं था। कांग्रेस पार्टी 100 लोकसभा सीट तक आसानी से जा सकती थी। लेकिन कांग्रेस पार्टी ही एकजुटता से चुनाव नहीं लड़ी। कई नेता तो बस दिखाने, नंबर गिनाने के लिए साथ दे रहे थे। कई तो घर से भी संभलकर ही निकले। पार्टी के एक रणनीतिकार का कहना है कि जब प्रधानमंत्री की छवि पर सीधा हमला होलकर कांग्रेस ने भाजपा से मोर्चा ले लिया तो राहुल गांधी अभिमन्यु की तरह अकेले लडऩे लगे थे। लिहाजा अब कांग्रेस अध्यक्ष मुखर हैं। हैरानी इसके बाद भी हुई। उनके संकेत देने के बाद भी कोई वरिष्ठ कांग्रेस अपनी कुर्सी नहीं छोड़ रहा।
खल रही है अरुण जेटली की कमी
संसद के दोनों सदनों और सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकट मोचक रहे हैं। अब स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं। प्रधानमंत्री उन्हें अपना सच्चा मित्र मानते हैं। इसलिए समय-समय पर हाल-चाल लेना टेलीफोन करना नहीं भूलते। सलाह के स्तर पर भी सरकार चलाने में जेटली की सलाह काफी अहम होती थी, अब प्रधानमंत्री को उनके मंत्रिमंडल में साथ न होने की कमी खल रही है। प्रधानमंत्री ने संसद में अपने संबोधन में भी जेटली का जिक्र करके उनका महत्व बताया था। एक केन्द्रीय मंत्री की माने तो मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री के पास ऐसा कोई मित्र या फिर बराबर का महसूस होने वाला सहयोगी नहीं है, जिसपर वह आंख मूंद कर भरोसा कर लें। वह जेटली ही थे जब प्रधानमंत्री गुजरात के मुख्यमंत्री थे और जेटली दिल्ली में हर पल उनके साथ थे।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को कुछ समय दिल्ली में गुजारना पड़ा था। तब अरुण जेटली बड़ा सहारा थे। यही वजह रही कि प्रधानमंत्री के 2014 के मंत्रिमंडल में जेटली की छाप साफ दिखाई पड़ी। पीयुष गोयल, निर्मला सीतारमण समेत कई चेहरे इसका हिस्सा बने। हरदीप पुरी समेत कई अन्य भी शामिल हुए। दूसरे कार्यकाल में भी जेटली के करीबियों की जगह बनी रही। यहां तक कि पीयुष गोयल रह गए और निर्मला सीतारमण वित्तमंत्री बन गई। अनुराग ठाकुर वित्तराज्यमंत्री बने तो उ.प्र. सरकार में श्रीकांत शर्मा की जगह बनी।
2022 की बसपा बना रही हैं मायावती
बसपा प्रमुख मायावती काफी संवेदनशील हो गई हैं। उन्हें भी लग रहा है कि बसपा में आमूल-चूल परिवर्तन लाना जरूरी है। पुराने थके नेताओं के साथ अब बसपा प्रमुख ने युवा नेताओं को जोड़ने का मन बनाया है। गांव-गांव तक बसपा के कॉडर को जगाने, सर्वजन हिताय के फार्मूले पर चलकर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर और संस्थापक कांशीराम के बहुजन समाज को साधने की क्रांति शुरू कर दी है। इसके लिए बसपा ने छिटक गई और छिटकने की संभावना वाली जातियों पर खासा फोकस कने की रणनीति बनानी शुरू की है। बसपा प्रमुख लगातार बैठक कर रही हैं। बसपा के नेताओं की जिम्मेदारी तय करके उनसे गांव, ब्लाक, तहसील और जिला स्तर पर मूवमेंट में तेजी लाने के लिए कहा जा रहा है।