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हत्या के मामले में 55 वर्षीय दोषी को सजा सुनाएगा जुवेनाइल कोर्ट, अजीबोगरीब है केस
Fri, 09 Oct 2020 01:41 AM IST
Jeet Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Jeet Kumar
Updated Fri, 09 Oct 2020 01:41 AM IST
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सुनने में यह अजीबोगरीब लग सकता है, लेकिन यह हकीकत है कि 1981 में हुई हत्या के मामले में 55 साल के एक व्यक्ति को जुवेनाइल कोर्ट (किशोर न्यायालय) में पेश होकर अपनी सजा सुननी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस शख्स को घटना के वक्त नाबालिग करार देते हुई उम्रकैद की सजा को दरकिनार कर दिया।
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जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि भले ही वह जमीन विवाद में एक व्यक्ति की हत्या का दोषी हो, लेकिन उसे एक वयस्क की तरह दंडित नहीं किया जा सकता है। किशोर न्याय अधिनियम के तहत मामले का निपटारा किया जाएगा।
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पीठ ने अपने आदेश में कहा, अगले सात दिनों के भीतर दोषी को उत्तर प्रदेश के बहराइच में किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया जाए। इसके बाद बोर्ड किशोर न्याय अधिनियम, 2000 के तहत उचित निर्देश पारित करे।
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अधिनियम की धारा 15 के तहत एक अपराधी को सजा के तौर पर अधिकतम तीन वर्षों के लिए सुधार केंद्र में रखा जा सकता है। बोर्ड अपने विवेक से सिर्फ नसीहत देने के बाद उसे छोड़ सकता है या सामुदायिक सेवा करने के लिए कह सकता है।
निचली अदालत ने सुनाई थी उम्रकैद की सजा
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अप्रैल, 2018 में चश्मदीद गवाहों के बयान पर भरोसा करने करते हुए इस व्यक्ति की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था। इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए दोषी ने घटना के वक्त नाबालिग होने का मुद्दा उठाया। किशोर कानून के तहत किसी भी वक्त नाबालिग का मुद्दा उठाया जा सकता है।
शीर्ष अदालत के निर्देश पर उम्र का पता लगाया
सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर, 2019 में बहराइच के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश को घटना के समय दोषी की उम्र का पता लगाने के लिए कहा था।
जज ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दोषी का जन्म अप्रैल, 1965 में हुआ था और घटना के वक्त (11 दिसंबर, 1981) उसकी आयु 16 वर्ष सात महीने और 26 दिन थी, यानी वह नाबालिग था। यह रिपोर्ट उसके प्राथमिक विद्यालय के रिकॉर्ड और इंटरमीडिएट कालेज द्वारा स्थानांतरण प्रमाण पत्र पर आधारित थी।