न्यूनतम समर्थन मूल्यः असंभव मांग तो नहीं कर रहे किसान, क्या पूरा करने की स्थिति में है सरकार?
देश में ही किसानों की सूरजमुखी की फसल नहीं बिक पा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा देने से देश में फसल महंगी हो जाती है, जबकि प्राइवेट कंपनियां वही चीज विदेश से सस्ते में आयात कर लेती हैं....
देश में ही किसानों की सूरजमुखी की फसल नहीं बिक पा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा देने से देश में फसल महंगी हो जाती है, जबकि प्राइवेट कंपनियां वही चीज विदेश से सस्ते में आयात कर लेती हैं....
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तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने के अलावा आंदोलनकारियों की अन्य प्रमुख मांग है कि सरकार फसलों की बिक्री को किसानों का वैधानिक अधिकार बनाए। यानी वे जितनी भी फसल बेचना चाहें, सरकार द्वारा उसकी खरीद सुनिश्चित की जाए। सरकारी या निजी दोनों प्रकार के बाजारों में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद सुनिश्चित की जाए। परंतु क्या किसानों की यह मांग तर्क संगत है, और क्या सरकार के पास इतने वित्तीय संसाधन हैं कि वह किसानों की पूरी फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद ले? कृषि विशेषज्ञों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है।
दरअसल, सत्तर के दशक में जब देश भारी खाद्यान्न संकट से गुजर रहा था तब सरकार ने किसानों से ज्यादा से ज्यादा अनाज उत्पादन करने का अनुरोध किया। किसानों को सरकार की तरफ से यह भरोसा दिया गया कि वे चाहे जितनी भी फसल का उत्पादन करेंगे, उसकी खरीद की जिम्मेदारी सरकार की रहेगी। इसके लिए बाकायदा न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति की घोषणा की गई। इसे गेहूं से शुरू कर बाद में धान के साथ कुल 23 फसलों तक बढ़ाया जा चुका है।
हरित क्रांति के इस आंदोलन में पूरे देश के साथ-साथ पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और भारी मात्रा में अनाज उत्पादन किया। इससे देश का खाद्यान्न संकट सुलझ गया, लेकिन धीरे-धीरे अनाज का उत्पादन बढ़ता रहा। अब स्थिति यह है कि सरकार के पास पहले से ही गेहूं-धान की फसलों का भंडार मौजूद है। पीडीएस सिस्टम से अनाज के कुल वितरण के बाद भी सरकार के पास अनाज का अतिरिक्त स्टॉक बचा रहता है, जिसके रखने तक की जगह सरकार के पास नहीं होती। अकसर इन अनाजों के बारिश में सड़ने-गलने की खबरें आती रहती हैं।
सवाल यह है कि क्या सरकार के पास इतने आर्थिक संसाधन मौजूद हैं कि वह जितना किसान बेचना चाहें, उतनी फसलों की खरीद कर सकती है? साथ ही उनका उचित भंडारण भी कर सकती है।
किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष पुष्पेंद्र चौधरी का कहना है कि यह संभव है। वर्तमान समय में देश में कुल लगभग 30 लाख मिट्रिक टन खाद्यान्न का उत्पादन होता है। इसका एक तिहाई किसान परिवार अपने इस्तेमाल के लिए रखते हैं, जबकि एक तिहाई यानी लगभग 10 लाख मिट्रिक टन की खरीद सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के जरिए करती है। बाकी का लगभग एक तिहाई या 10 लाख मिट्रिक टन खाद्यान्न आज भी किसानों को खुले बाजार में बेचना पड़ता है। केवल इसी एक तिहाई खाद्यान्न को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचना सुनिश्चित किया जाना है।
चूंकि अभी भी यह खाद्यान्न एक निश्चित कीमत पर प्राइवेट कंपनियों के जरिए खरीदा ही जा रहा है, ऐसे में अगर यही खाद्यान्न कुछ बढ़ी हुई (न्यूनतम समर्थन मूल्य) कीमत पर खरीदा जाए तो इसमें लगभग 50 हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त लागत आएगी। इसका ज्यादातर हिस्सा प्राइवेट कंपनियों के जरिए ही खरीदा जाएगा, इस प्रकार यह अतिरिक्त लागत प्राइवेट सेक्टर द्वारा ही चुकाई जाएगी। अगर कुछ अतिरिक्त खरीद सरकार को करनी पड़ती है तो थोड़े से अतिरिक्त धन से इसे खरीदा जा सकता है।
किसानों को ही होगा भारी नुकसान
वहीं, प्रसिद्ध कृषि विशेषज्ञ विजय सरदाना कहते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सारी फसलों की खरीद को अनिवार्य बनाने से किसानों का भारी नुकसान होगा। प्राइवेट कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार खुला हुआ है। अगर किसी फसल की कीमत ज्यादा होती है तो कंपनियां इसे बाहर के खुले बाजार से करने लगेंगी, जिससे किसानों की फसलों की पूरी खरीद नहीं हो पाएगी और इससे उनका ज्यादा नुकसान होगा।
वे उदाहरण देते हुए बताते हैं कि आज मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1850 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है। लेकिन खुले बाजार में इसकी कीमत 900 से 1100 रुपये के बीच ही मिल रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि प्राइवेट कंपनियों को बेहतर गुणवत्ता की मक्का अंतरराष्ट्रीय बाजार में 1100 रुपये में उपलब्ध है। यही कारण है कि किसानों की फसल इससे ज्यादा कीमत में नहीं बिक पा रही है।
उन्होंने कहा कि देश में लगभग 70 फीसदी खाद्यान्न तेल आज भी अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीदा जा रहा है, लेकिन देश में ही किसानों की सूरजमुखी की फसल नहीं बिक पा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा देने से देश में फसल महंगी हो जाती है, जबकि प्राइवेट कंपनियां वही चीज विदेश से सस्ते में आयात कर लेती हैं। इस प्रकार केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा देना और इसी पर फसलों की खरीद अनिवार्य करना किसानों के लिए अहितकारी कदम है।
इसके अलावा पूरे देश में टैक्स के जरिए कुल 16.5 लाख करोड़ रुपये की आय होती है। अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य के जरिए पूरी फसल की खरीद सुनिश्चित की जाती है तो इसमें लगभग 10 लाख करोड़ रुपये का खर्च आएगा जो सरकार के वश में नहीं है। क्योकि ऐसा करने के बाद सरकार के पास अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए वित्तीय संसाधन नहीं बचेंगे।
कैसे हो किसानों को लाभ
सच्चाई यह है कि पश्चिमी देश किसानों को भारी मात्रा में सब्सिडी उपलब्ध कराते हैं, जिसके कारण किसानों की फसल सस्ती बिकती है। लेकिन इसके बाद भी कटु सच्चाई यह है कि पश्चिमी देशों में भी किसानी घाटे का सौदा बनी हुई है। एक सीमा तक उत्पादन बढ़ाकर इस घाटे को पूरा किया जा सकता है। साथ ही घाटे से मुक्ति के लिए किसानों को लाभकारी चीजों की व्यावसायिक खेती की तरफ कदम आगे बढ़ाने होंगे। खेती के साथ-साथ अन्य सह-उत्पादों को भी साथ-साथ आजमाना होगा। केवल किसानी अब उनकी समस्याओं का पूरा निराकरण करने में सक्षम नहीं है और इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार किया जाना चाहिए।