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'आईएस' के चंगुल से बचकर लौटी दो औरतों की आप-बीती

Fri, 25 Nov 2016 04:58 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Fri, 25 Nov 2016 04:58 PM IST
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'IS' escaped from the clutches of the two women came past you,
इराक के बशीर गांव में उन दो महिलाओं का बसेरा है, जिन्होंने चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट के चंगुल से खुद को आजाद कराने का दावा किया था। बीबीसी फोटोग्राफर एबी ट्रेलर-स्मिथ एक गैर सरकारी संस्था 'ऑक्सफैम' के साथ इन दोनों महिलाओं की आप-बीती सुनने बशीर गांव पहुंचे। यहां मुलाकात के दौरान युस्निता मोहम्मद ने बीबीसी को बताया, "मौजूदा संकट शुरू होने के पहले हम बड़े आराम से रह रहे थे, कोई परेशानी नहीं थी। हमारे पास दो मंजिला मकान था, दुकान थी और हम पशु पालते थे।"
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युस्निता बताती हैं, "हमें इस्लामिक स्टेट को लेकर कोई चिेंता नहीं थी, क्योंकि हम सेना और पुलिस से घिरे हुए थे। हम इन चरमपंथियों को लेकर बेफिक्र थे। कभी सोचा ही नहीं था कि वे बशीर भी पंहुच सकते हैं।" उन्होंने बताया कि जब आईएस के चरमपंथी उनके गांव में आए, तो उनके पति कहीं दूर बिजली का कोई काम कराने गए थे। 
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'IS' escaped from the clutches of the two women came past you,
उस दिन को याद करते हुए वो कहती हैं, "हमारे यहां यह परंपरा है कि पुरुष ही घर का मुखिया होता है और औरतें उनकी इजाजत के बगैर अमूमन कुछ नहीं करती हैं। लेकिन मैंने उन्हें बुलवा लिया। इमाम माइक से कह रहे थे कि कोई शख्स गांव छोड़ कर न भागे, जो ऐसा करेगा, कायर माना जाएगा। और तमाम लोग वहीं रुक गए।"
युस्निता मोहम्मद की बेटी यह समझ गई थी कि मामला गड़बड़ है। चरमपंथियों के गांव में दाखिल होने को लेकर वह डरी हुई थी। उसने कहा कि चरमपंथी गोलीबारी कर रहे हैं, लिहाजा हमें निकल जाना चाहिए। लेकिन युस्निता ने अपनी बेटी को समझा बुझा कर शांत कर लिया और भरोसा दिलाया कि जल्द ही उसके पिता आ जाएंगे और सब संभाल लेंगे। चरमपंथी बम फेंक रहे थे। गोलियां बरसा रहे थे। इसी बीच युस्निता अपने बच्चों को लेकर पास के शहर ताजा चली गई।

'IS' escaped from the clutches of the two women came past you,
युस्निता कहती हैं, "हमें लग रहा था कि हमारा अंत आ चुका है। हम आगे बढ़ते रहे और ताजा से दूर चले गए। बाद मे एक मस्जिद में हम सात महीने रहे। फिर हमने एक स्कूल में दो महीने बिताए।" स्कूल खुल गया तो युस्निता को वहां से चले जाने को कहा गया। इसके बाद कुछ समय उन्होंने लेलान के एक तबेले में बिताया, जहां मवेशी रखे जाते थे। युस्निता के बच्चे का स्कूल छूट गया। उसका एक साल बर्बाद हो गया। जब बशीर आजाद कराया गया, युस्निता रोजा में थीं। फिर भी वो अपने गांव लौट आईं।

युस्निता आगे कहती हैं, "मैंने पहली बार अपना घर देखा तो फूट-फूट कर रो पड़ी। मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ गया। मैं बीमार हो गई तो मेरे पति मुझे वहां से दूर ले गए। मैं एक महीने बाद घर लौटी तो पाया कि मकान के हर तरफ लाल टेप लगे हुए हैं और हमें बताया गया कि इसके परे जम़ीनी सुरंगें बिछी हुई हैं। 
 
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आईएस
मैंने किसी की नहीं सुनी और टेप काटकर अंदर घुस गई। मैं अंदर घुसी ही थी कि घर के बाहर एक सुरंग फट पड़ी। मेरे पति नाई थे, लेकिन इस्लामिक स्टेट ने उनकी दुकान तोड़ दी थी और अब उनके पास कोई काम नहीं था। हमने पड़ोसियों की मदद से किसी तरह मकान बनाना शुरू कर दिया। अभी यह बन कर तैयार नहीं हुआ है। पर मैं अपने बच्चों को लेकर वहीं रहने लगी।" युस्निता कहती हैं कि अपने घर लौटकर वो खुश हैं। जीवन चलाने के लिए उन्हें ब्रेड खाकर गुजारा करना पड़े, तो भी वो खुश रहेंगी।
 
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