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खेती के पुराने तरीके पी गए धरती का पानी, किसान हुए बेहाल

Wed, 13 Apr 2016 06:06 PM IST
Updated Wed, 13 Apr 2016 06:06 PM IST
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Irrigation pattern in india is useless
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इस समय जहां देश सूखे की आशंका से सहम रहा है वहीं इसके निदान और कारणों पर भी मंथन हो रहा है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में तो सूखा इसलिए भी प्रलयंकारी हो जाता है क्योंकि देश की 70 फीसदी से ज्यादा आबादी आज भी खेती पर निर्भर है। लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य ये भी है कि खेती का मौजूदा तौर तरीका ही सूखे का एक बड़ा कारक है।

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मौसम विज्ञानी और कृषि विशेषज्ञ भी इस बात पर जोर देते हैं कि पानी को लेकर देशभर में जिस तरह का संकट चल रहा है उसको देखते हुए खेती के पुराने और पारंपरिक तरीकों को बदला जाना चाहिए क्योंकि वर्तमान में जिस तरह से फसलों की सिंचाई की जाती है उससे पानी की बहुत बड़ी मात्रा व्यर्थ चली जाती है। 
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हैरत की बात ये है सरकार जहां पानी बचाने के विभिन्‍न उपायों पर तो जोर देर रही है लेकिन खेती के इस पुराने और गैरजरूरी पड़ चुके ढर्रे में बदलाव की ओर उसका कोई ध्यान ही नहीं है। किसानों में जागरूकता की कमी और सरकार की बेरुखी का बड़ा नुकसान ये है कि भूजल स्तर में तेजी से गिरावट आ रही है, किसानों के खेतों में लगे ट्यूबवैल और पंपिंग सेट अंधाधुंध तरीके से भूगर्भ जल का दोहन कर रहे हैं। और विडंबना ये है कि हाल फिलहाल इसमें राहत मिलने की भी कोई उम्‍मीद दिखाई नहीं देती। 

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सिंचाई के पुराने तरीकों से गिर रहा भूजल स्तर

Irrigation pattern in india is useless

खेती में सिंचाई के पारंपरिक और पुराने तरीके से किस कदर भूजल स्तर में गिरावट आ रही है इसका मौजू उदाहरण है गंगा यमुना का दोआब क्षेत्र। गंगा और यमुना के बीच का यह इलाका भरपूर भूजल के कारण प्राकृतिक रूप से काफी संपन्न माना जाता था। 21वी सदी के शुरुआती सालों में यहां भूजल का स्तर 30-40 फुट तक हुआ करता था।

पश्चिमी यूपी के ज्यादातर इलाकों में उस दौर में 40-50 फुट खुदाई करने पर आसानी से पानी मिल जाता था लेकिन बीते 15 सालों में यहां भूजल स्तर में तेजी से गिरावट हुई है। अब शायद ही कोई इलाका हो जहां 100 फुट से कम गहाई पर पानी मिल पाता हो। राष्ट्रीय राजधानी दिल्‍ली से लगते मेरठ में गंगा और काली नदी के किनारे बसे गांवों में भी 100 फुट खुदाई के बाद पानी निकालना टेढ़ी खीर है। जबकि यह भूजल के मामले में सबसे संपन्न इलाका माना जाता था।

मेरठ के खरखौदा ब्लाक के लालपुर गांव के किसान अशोक बताते हैं कि दस-पन्द्रह साल पहले तक उनके गांव में हैंडपंप लगाने के लिए मात्र 40-50 खुदाई करना ही पर्याप्त रहता था जबकि ट्यूबवैल लगाने के लिए 60-70 फुट तक ही खुदाई करनी पड़ती थी, लेकिन अब हालात तेजी से बदले हैं उस दौर में लगे सारे हैंडपंप और ट्यूबवैल अब फेल हो गए हैं। दोबारा बोरिंग करवाकर नलों को कम से कम 100 फुट गहराई पर लगवाया गया है जबकि ट्यूबवैल के लिए 150 फुट गहराई तक खुदाई करवानी पड़ती है।

हरियाणा की सीमा से लगते सहारनपुर जिले के पहांसू गांव के पूर्व प्रधान राजकुमार बताते हैं कि पहले हमारे खेतों में स‌िंचाई के लिए ट्यूबवैल लगाने के लिए मात्र 70-80 फुट खुदाई ही करनी पड़ती थी लेकिन अब सभी ट्यूबवैल फेल हो चुकी हैं। बीते 10-12 सालों में ही भूजल स्तर 25-30 फुट तक गिर गया है।

पथरीली जमीन होने के कारण पुराने पंपिंग सेट तो अब बेकार ही हो गए हैं, मजबूरी में किसानों को हैवी सबमर्सिबल पंप लगवाने पड़ रहे हैं। राजकुमार मानते हैं कि सिंचाई का यह तरीका पुराना और बेकार पड़ चुका है पैसा और पानी दोनों काफी व्यर्थ होते हैं लेकिन नया क्या करें, इसकी जानकारी उन्हें भी नहीं है।

सिंचाई के दौरान बेकार चला जाता है 70-80 फीसदी जल

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वेस्ट यूपी के जिलों में लंबे समय तक वरिष्ठ गन्ना अधिकारी के पद पर रहे हरि विश्नोई बताते हैं कि मौजूदा दौर में खेती का पुराना तरीका सूखे और भूजल में गिरावट की बड़ी वजह है। विश्नोई बताते हैं कि पुराने तरीके से जिस तरह एक खेत को सींचा जाता है उसमें से 70-80 फीसदी पानी तो बेकार ही चला जाता है। इसके अलावा एक दिक्कत पानी को लेकर किसानों में जागरूकता की भी कमी है, आमतौर पर खेत की सिंचाई करते समय किसान ट्यूबवैल चलता छोड़ देते हैं, जिसके बाद पूरे खेत में पानी भरने के बाद एक क्यारी से दूसरी क्यारी में जाता है और घंटों तक यह सिलसिला चलता रहता है।

बिजली की असामान्य कटौती के कारण भी किसान ट्यूबवैल को चलता छोड़ना ही बेहतर समझते हैं जिससे लाइट आने पर वह अपने आप चल जाए। कई बार तो ट्यूबवैल चलाकर किसान
बाकी काम निपटाने के लिए घर भी आ जाते हैं इसमें लाखों लीटर पानी एक छोटे से खेत की सिंचाई में ही बर्बाद हो जाता है जबकि ड्रिप इरीगेशन और स्प्रिंकलर विधि के द्वारा मात्र एक चौथाई पानी से ही उक्‍त खेत की कम समय में सिंचाई हो सकती है।

स्प्रिंकलर (फव्वारा) विधि में खेतों के बीच में जगह-जगह स्प्रिंकलर लगाकर फसल की सिंचाई की जाती है इससे पौधे तक उतना ही पानी पहुंचता है जितनी उसकी जरूरत। इससे पौधे के पत्तों और तनों तक भी पानी पहुंच जाता है जबकि पुरानी विधि में यह सिर्फ जड़ तक ही पहुंच पाता है। वहीं ड्रिप इरीगेशन विधि के द्वारा पूरे खेत में पाइपों का एक जाल बिछाया जाता है जिससे पौधे की जडों तक बूंद बूंद कर पर्याप्त मात्रा में पानी पहुंचता रहता है, इससे पानी की तो बचत होती ही है पैसा और समय भी बचता है।

विश्नोई बताते हैं कि खेत की सिंचाई को लेकर किसानों में भी जागरूकता का जबरदस्त अभाव है, वह पुराने तरीकों को छोड़ने के लिए तैयार ही नहीं है सरकार भी इस दिशा में कोई मदद नहीं करती। अगर वह दिन के बजाय रात में सिंचाई करे तो उससे भी काफी पानी की बचत हो सकती है, दिन में सिंचाई करने से काफी मात्रा में पानी तो वाष्प के रूप में ही उड़ जाती है।

किसानों को जागरूक करने के प्रति सरकार ही गंभीर नहीं

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विश्नोई कहते हैं कि सरकार भी इस दिशा में कोई पहल करना नहीं चाहती, यही कारण है कि ड्रिप इरीगेशन और स्प्रिंकलर जैसे सिंचाई के नए तौर तरीकों का कोई प्रचार प्रसार नहीं किया जाता। हालांकि सरकार इस पर 70 फीसदी तक सब्सिडी तो देती है लेकिन इसे किसानों तक किस तरह पहुंचाया जाए इस पर कोई मंथन नहीं किया जाता। इसकी बड़ी वजह वह एक ये भी बताते हैं कि सरकार और उनके विभागों के लिए सूखा और बाढ़ जैसे प्राकृतिक आपदाएं कमाई का बढ़िया माध्यम है, हर साल इसके नाम पर करोडों की बड़ी रकम की बंदरबांट कर ली जाती है।

यूं तो देश में कृषि के लिए आईसीएआर जैसे बड़े संस्‍थान भी हैं यहां जल प्रबंधन पर अलग विभाग भी है लेकिन उनकी सक्रियता सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहती है। किसानों के बीच जाकर सेमिनार करने और उन्हें जागरूक करने की पहल शायद ही कभी की जाती हो। वह किसान संगठनों पर भी सवाल करते हैं। किसानों के इतने संगठन हैं लेकिन वह ऐसे मुद्दों पर कभी विचार नहीं करते।

इसी वजह से आम किसान पिछड़ता रहा है। जल संरक्षण और खेती में सुधार के तरीकों पर लंबे समय से काम कर रहे एनजीओ रिसर्च एंड रिलीफ के निदेशक नवीन प्रधान कहते हैं कि किसान की सबसे बड़ी समस्या ये है कि उसके सामने सही से बात रखने वाला ही कोई नहीं है। उसे आज भी सिंचाई के लिए पुराना तरीका ही ठीक लगता है जबकि इससे काफी मात्रा में पानी तो बर्बाद होता ही है खेत में डाले गए खाद और फर्टीलाइजर भी बेकार चले जाते हैं।

इसके अलावा फर्टीलाइजर के कारण भूजल भी दूषित होता है। जबकि पौधे की सिंचाई के लिए पानी की नहीं मिट्टी को नमी की ज्यादा जरूरत होती है। ऐसे में स्प्रिंकलर और ड्रिप इरीगेशन का उपयोग ज्यादा बेहतर रहता है, लेकिन 80 फीसदी किसानों को इसकी कोई जानकारी ही नहीं है। सरकार ने भी अभी तक इसके प्रचार प्रसार का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया है। नवीन कहते हैं कि सरकार अगर ड्रिप इरीगेशन और स्प्रिंकलर से सिंचाई के लिए प्रति किसानों को जागरूक करे तो इसके बेहतर परिणाम हो सकते हैं।

किसान के पास संसाधनों और पैसे की कमी है इसलिए वह न रिस्क लेता है और न इन्हें खरीदने का जोखिम। लेकिन अगर सरकार एक कॉमन सेंटर बनाकर इन संयत्रों को कम से कम कीमत पर किराए पर किसानों को उपलब्‍ध कराए तो यह आसानी से उन तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा सरकार जो सब्सिड़ी दे रही है उसके बारे में किसानों तक पर्याप्त प्रचार करें। नवीन एक समस्या की तरफ और ध्यान दिलाते हैं। वर्तमान में खेती से पर्याप्त मात्रा में लागत पूरी न होने की वजह से किसान फसलों के साथ साथ पेड़ लगाने पर भी बहुत जोर दे रहे हैं।

खेत के चारों ओर मेढ़ पर पेड़ लगाने से आठ दस साल में ही अच्छी खासी रकम मिल जाती है, लेकिन पेड़ लगाते समय ये ध्यान नहीं दिया जाता कि वह भारी मात्रा में पानी सींचता है। आमतौर पर किसान यूकेलिप्टिस और पोपुलर का पेड़ ही ज्यादा लगाते हैं। इनमें से यूकेलिप्टिस का पेड़ बहुत ज्यादा पानी खींचता है, यूकेलिप्टिस के पेड़ों को आस्ट्रेलिया के दलदली जंगलों में लगाया जाता था ताकि वहां पानी को कुछ कम किया जा सके लेकिन भारत में भी इसका प्रचलन बहुत ज्यादा बढ़ गया है। खेतों के बंजर होने का एक ये भी बहुत बड़ा कारण है।

दूसरी समस्या ये है कि किसान कैश क्रॉप पर ज्यादा ध्यान देता है, जिससे उससे अच्छी रकम मिल सके। मसलन उत्तर भारत में खेती के मामले में किसान ज्यादातर गन्ना और गेहूं की परंपरागत खेती पर ही निर्भर है, दोनों ही फसलों को लंबे समय तक भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है। ऐसे में इसके विकल्प के रूप में दलहनी और अन्य अनाज वाली फसलों की खेती की जाए तो उन्हें पानी की भी कम जरूरत होगी और रिस्क भी कम रहेगा।

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