INTERPOL General Assembly: 'क्रॉस-बॉर्डर टेररिज्म' से लड़ने के लिए इंटरपोल के जरिए सीमापार सहयोग जरूरी
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विस्तार
आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर नई दिल्ली में आयोजित 90वीं इंटरपोल जनरल असेंबली के समापन सत्र में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, 'क्रॉस-बॉर्डर टेररिज्म' से लड़ने के लिए इंटरपोल के मार्फत 'अक्रॉस-बॉर्डर को-ऑपरेशन' जरूरी है। आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है। यह अत्यंत प्रासंगिक है कि 2020-25 के लिए इंटरपोल के सात वैश्विक पुलिसिंग लक्ष्यों में पहला और सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य 'टेररिज्म के खतरे का मुकाबला करना' है। मेरा स्पष्ट मानना है कि 'टेररिज्म, मानवाधिकार का सबसे बड़ा उल्लंघन है। पहले सभी देशों को 'टेररिज्म' और 'टेररिस्ट' की व्याख्या पर आम सहमति बनानी होगी। अगर 'टेररिज्म' और 'टेररिस्ट' की व्याख्या पर आम सहमति नहीं बनती है, तो हम एकरूप होकर इसके सामने वैश्विक लड़ाई नहीं लड़ सकते।
'गुड टेररिज्म, बैड टेररिज्म' एक साथ नहीं चल सकते
केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा, आतंकवाद के खिलाफ एक साथ लड़ने की प्रतिबद्धता एक ओर, 'गुड टेररिज्म, बैड टेररिज्म' तथा 'टेररिस्ट हमला–बड़ा या छोटा' जैसा नैरेटिव...दोनों एक साथ नहीं चल सकते। कोविड की महामारी के बाद इंटरपोल की इस महासभा का आयोजन अपने आप में महत्वपूर्ण है। कोविड महामारी में दुनिया ने 'पुलिस' के एक मानवीय चेहरे का अनुभव किया है। मानवीय चेहरे को देखकर पुलिस के लिए पूरी दुनिया ने अपनी सोच को बदला है। पिछले 100 वर्षों में, इंटरपोल विश्व के 195 देशों का एक व्यापक और प्रभावी मंच बन गया है। पूरे विश्व में अपराधों पर नकेल कसने में इंटरपोल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत, इंटरपोल के सबसे पुराने सदस्यों में से एक है। आज के विश्व में इंटरपोल जैसा मंच को-ऑपरेशन और मल्टीलेटरिज्म के लिए बेहद जरूरी और महत्वपूर्ण है।
इंडियन साइबर-क्राइम कोआर्डिनेशन सेंटर (I-4C) स्थापित
साइबर अपराध के विरुद्ध व्यापक जवाबी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार ने इंडियन साइबर-क्राइम को-आर्डिनेशन सेंटर (I-4C) की स्थापना की है। आज के डाटा और सूचना क्रांति के समय में, अपराध और अपराधी दोनों का स्वरूप बदल गया है। वर्तमान समय में अपराध की कोई भौगोलिक सीमा नहीं है, अगर ऐसे अपराधों को और अपराधियों को रोकना है, तो कन्वेंशनल जियो-ग्राफिक बॉर्डर से ऊपर उठकर हमें सोचना और कार्य करना होगा। जहां एक ओर 'अपराधी सिंडिकेट' अत्याआधुनिक टेक्नोलॉजी के उपयोग से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सांठ-गांठ कर रहे है, इसे देखते हुए, मुझे कोई कारण नहीं दिख रहा है कि दुनिया के देश एक-दूसरे के साथ सहयोग और समन्वय ना करें। एक तरफ तो राज्य की संप्रभुता के दायरे में हमें कानून को लागू करना है और दूसरी तरफ अपराध के ग्लोबल नेचर को समझकर अपराधियों का पता लगाकर, न्याय की चिंता भी करनी है। इन चुनौतियों के बीच सुरक्षा एजेंसियों का काम आसान करने में इंटरपोल की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है और भविष्य में और भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण होगी।
सीमापार से फैलाई जा रही आतंकवादी विचारधारा बनी चुनौती
अमित शाह ने कहा, ऑनलाइन रेडिकलाइजेशन द्वारा सीमापार से फैलाई जा रही आतंकवादी विचारधारा की चुनौती पर भी इंटरपोल की आम सहमति बनाना आवश्यक है। इसको पॉलिटिकल आइडियोलॉजी के रूप में हम नहीं देख सकते हैं। ऑनलाइन रेडिकलाइजेशन के प्रचार-प्रसार को अगर हम राजनीतिक समस्या मानते हैं, तो टेररिज़्म के खिलाफ हमारी लड़ाई आधी-अधूरी रहेगी। हम सभी यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हों, कि आतंकवाद के विरूद्ध प्रभावी लड़ाई दीर्घकालिक, व्यापक और सतत होनी चाहिए। भारत, वैश्विक आंतकवाद के सभी स्वरूपों से लड़ने के लिए तकनीकी सहायता और मानव संसाधन प्रदान करने के लिए, इंटरपोल के साथ काम करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह देखा गया है कि कई देशों में इंटरपोल की नोडल एजेंसी और देश की काउंटर-टेरर एजेंसी अलग-अलग हैं। ऐसी स्थिति में टेररिज्म की चुनौती से निपटने के लिए दुनिया की सभी काउंटर-टेररिज्म एजेंसियों का एक साथ आना मुश्किल लगता है। इस दिशा में, मेरा इंटरपोल से अनुरोध है कि सभी सदस्य देशों की काउंटर-टेररिज्म एजेंसियों के बीच 'रियल-टाइम इनफार्मेशन एक्सचेंज लाइन’ स्थापित करने के बारे में एक स्थाई तंत्र का विचार करना चाहिए और ये तंत्र आने वाले दिनों में टेररिज्म के खिलाफ हमारी लड़ाई को और पुख्ता करेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
'ऑपरेशन लॉयन-फिश' और 'ऑपरेशन गरुड़' ...
बतौर अमित शाह ने कहा, इंटरपोल के 'ऑपरेशन लायन-फिश' और भारत के 'ऑपरेशन गरुड़' का जिक्र भी मैं जरूर करना चाहूंगा। यह बताना चाहूंगा कि 'ऑपरेशन लायन-फिश' में भारत ने सबसे बड़ी जब्ती कर एक बड़ी सफलता हासिल की है। मेरा ये अनुरोध होगा कि सभी सदस्य देशों की एंटी-नारकोटिक्स एजेंसियों के बीच रियल टाइम इनफॉर्मेशन एक्सचेंज नेटवर्क तथा एक विस्तृत नार्को डाटाबेस स्थापित करने में इंटरपोल को ज़्यादा काम करने की जरूरत है। इस महासभा में इंटरपोल के आई-फैमिलिया और अंतर्राष्ट्रीय बाल यौन शोषण डेटाबेस के उपयोग को बढ़ाने के लिए दो प्रमुख प्रस्तावों को भी पारित किया गया है। जब 1923 में इंटरपोल की स्थापना हुई थी, तब की क्राइम और पुलिसिंग की चुनौतियों तथा आज के क्राइम के विधि और तरीकों में बहुत परिवर्तन आया है, और स्वाभाविक है कि आने वाले दशकों में इसमें और भी बदलाव आयेगा। क्राइम की मनोवृत्ति कभी नहीं बदलती है, लेकिन साधन बदलते रहते रहे हैं। इंटरपोल पिछले 100 साल के अपने अनुभव और उपलब्धियों के आधार पर अगले 50 साल के लिए ‘भावी योजना’ तैयार करे।