इन्फोसिस में भी टाटा जैसी जंग के संकेत
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सॉफ्टवेयर कंपनी इन्फोसिस का इतिहास भले ही 150 साल पुराने टाटा समूह जैसा ना हो मगर विदेशों में अभी भी ये एक जाना-पहचाना भारतीय नाम है। इन्फोसिस भारत में आईटी इंडस्ट्री की बुनियाद रखनेवाली शुरूआती कंपनियों में से एक है। 1981 में सात इंजीनियरों ने मिलकर मात्र 250 डॉलर में इसकी शुरूआत की थी जो आज 10 अरब डॉलर से भी ज्यादा की संपत्ति वाली कंपनी बन चुकी है।
मगर उन सात संस्थापकों में से आज किसी का भी कंपनी के काम से कोई संबंध है, हालाँकि उनके पास कंपनी के शेयर हैं। सातों संस्थापकों में से सबसे चर्चित रहे एन आर नारायणमूर्ति, उनकी पत्नी, बेटा और बेटी कंपनी में 3.44% संपत्ति के हिस्सेदार हैं। ये इकलौता परिवार है जिसके पास कंपनी की इतनी बड़ी हिस्सेदारी है और अब नारायणमूर्ति ने कह दिया है कि उन्हें कंपनी को जिस तरह से चलाया जा रहा है उसपर चिन्ता हो रही है।
क्यों चिंतित हैं नारायणमूर्ति
उन्होंने इकोनॉमिक टाइम्स अखबार को एक इंटरव्यू में खास तौर से कंपनी के कुछ कर्मचारियों को कंपनी छोड़ने के बदले में दिए गए "अत्यधिक भुगतान" को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा,"ऐसे भुगतानों से ऐसा संदेह होता है कि कहीं कंपनी कुछ छुपाने के लिए तो ये पैसे नहीं दे रही।"
इन्फोसिस के मुख्य कार्यकारी विशाल सिक्का के वेतन पर भी सवाल उठते रहे हैं जो पिछले साल 70 लाख डॉलर से बढ़कर 1 करोड़ 10 लाख डॉलर हो गई। इन्फोसिस ने कंपनी के कामकाज में कोताहियाँ बरते जाने के आरोप से इनकार किया है और एक बयान जारी कर कहा है कि किसी मुद्दे पर विचारों में भिन्नताएँ हो सकती हैं, मगर इन मुद्दों पर शेयरधारकों से स्वीकृति ली गई है।
बयान में कहा गया है कि बोर्ड सदस्य संस्थापकों की बातों की सराहना और आदर करते हैं मगर वो शेयरधारकों के हित में स्वतंत्र रूप से फैसले लेने की जिम्मेदारी पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध है।
सिक्का की सफाई
उनकी नियुक्ति में नारायणमूर्ति ने खुद काफी सक्रिय भूमिका निभाई थी। तब कंपनी फायदे में थी मगर उसकी कमाई मंद पड़ती जा रही है। सिक्का के कमान संभालने के बाद कुछ समय तक कमाई उम्मीद से भी तेज गति से बढ़ी मगर हाल के समय में कंपनी ने अपने राजस्व में वृद्धि होने के अनुमानित लक्ष्य में कटौती की है।
टाटा संकट से तुलना
इन्फोसिस की छवि एक जिम्मेदार और भरोसेमंद संस्था की रही है, मगर कंपनी के अधिकारियों और संस्थापकों के बीच सार्वजनिक रूप से दिख रहे इन मतभेदों से ना केवल लोगों को हैरानी हो रही है बल्कि कॉरपोरेट जगत में चिन्ताएँ भी दिख रही हैं कि कहीं इन्फोसिस में भी तो टाटा की तरह की स्थिति नहीं बनने जा रही।
इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस में अधिकारी कविल रामचंद्रन कहते हैं कि वो लोग जिन्होंने संस्थाएँ खड़ी की हैं उन्हें कई बार ऐसा लगता है कि वे उस संस्था के बारे में सबसे ज्यादा जानते हैं, जिन्हें संस्था की सबसे ज्यादा फिक्र है और वो जो चाहें कह सकते हैं। वो कहते हैं, "उन्हें लगता है कंपनी चलाने की जिम्मेदारी अभी भी उनके ही हाथ में है, मगर एक बार आपने जिम्मेदारी दूसरों को सौंप दी तो आपको उनके फैसलों में भरोसा करना होगा।"
कविल कहते हैं कि टाटा और इन्फोसिस दोनों दिग्गज कंपनियाँ रही हैं जहाँ के काम करने के तरीके का आदर किया जाता रहा है, मगर संस्थापक स्वयं आपत्तियाँ रखने लगें या अपनी बेबसी प्रकट करने लगें, तो कंपनी के काम करने के तरीके पर सवाल उठेंगे।