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सऊदी के बाद भारत बना हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार

Wed, 28 Dec 2016 04:01 AM IST
एजेंसी/ वाशिंगटन
एजेंसी/ वाशिंगटन Updated Wed, 28 Dec 2016 04:01 AM IST
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India second largest arms purchaser in the world after Saudi Arabia
- फोटो : File Photo
भारत अपने सैन्य बलों के बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण का काम शुरू करने के बाद से विकासशील देशों में सऊदी अरब के बाद हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बन गया है। एक ताजा रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है।
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कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस (सीआरएस) की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2008 से 2015 के बीच भारत ने 34 बिलियन डॉलर के रक्षा उपकरण खरीदे हैं। इस मामले में सबसे बड़ा खरीदार सऊदी अरब है। सऊदी ने 93.5 बिलियन डॉलर के हथियार और उपकरण खरीदे हैं। सीअरएस अमेरिकी कांग्रेस की एक दो दलीय शोध शाखा है। यह संगठन वहां के सीनेटरों के लिए व्यापक पैमाने पर शोध कर रिपोर्ट तैयार करता है। हालांकि सीआरएस की रिपोर्ट अमेरिकी कांग्रेस की आधिकारिक रिपोर्ट नहीं मानी जाती है।
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भारत में सेना के आधुनिकीकरण के प्रयास को रेखांकित करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी अरब विकासशील देशों में हथियारों की खरीद में पहले स्थान पर है। इसने 2008 से 15 के बीच 93.5 बिलियन डॉलर के हथियार खरीदे। जबकि भारत इस सूची में दूसरे स्थान पर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न रक्षा उपकरण जमा करने के हाल के भारत के प्रयासों का सबसे बड़ा लाभार्थी अमेरिका रहा है।
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उल्लेखनीय है कि भारत सबसे ज्यादा रूस से अपने हथियार खरीदता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में उसने हथियारों के आपूर्तिकर्ताओं का दायरा बढ़ा लिया है। उसने इस्राइल से फाल्कन एयरक्राफ्ट खरीदे। उसी तरह फ्रांस से स्कॉर्पीन पनडुब्बी, अमेरिका से सी 130जे कार्गो विमान खरीदे। 2010 में ब्रिटेन से 57 हॉक जेट प्रशिक्षण विमान खरीदे और इटली से 12 हेलीकॉप्टर खरीदे।


हथियारों की खरीद के भारत के इस पैटर्न के बाद रूस को अन्य बड़े हथियार आपूर्तिकर्ता देशों के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। भारत रूस को यह भी आश्वस्त नहीं कर सकता था कि नई पीढ़ी के हथियार वह रूस से ही खरीदेगा। वास्तव में भारत ने 2011 में नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की आपूर्ति में अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया और फ्रांस ने बाजी मार ली थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि हथियारों की खरीद के मामले में रूस पर भारत की निर्भरता कम होने के बाद से मॉस्को ने अन्य विकल्पों पर गौर करना शुरू कर दिया है।
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