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उपलब्धि :77 साल बाद जीका वायरस का टीका मिला, परीक्षण के लिए आईसीएमआर ने आईआईएल कंपनी से साझेदारी की
Fri, 13 Sep 2024 04:07 AM IST
शिव शुक्ला
परीक्षित निर्भय
परीक्षित निर्भय
Published by: शिव शुक्ला
Updated Fri, 13 Sep 2024 04:07 AM IST
सार
आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने बताया कि हाल ही में आईसीएमआर ने पहले चरण के परीक्षण को लेकर एक ऐसा नेटवर्क लॉन्च किया जिसमें छोटे अणुओं, जैविक पदार्थों या फिर टीका पर कोई भी संस्थान या फार्मा कंपनी मानव सुरक्षा अध्ययन कर सकती है।
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जीका वायरस
- फोटो : ANI
विस्तार
1947 से दुनिया के लिए जोखिम बना जीका वायरस अब ज्यादा दिन मुसीबत नहीं रहेगा। ऑस्ट्रेलिया की मदद से भारत ने इस संक्रमण से बचने के लिए टीका खोज निकाला है। इस पर जल्द ही देश के अलग-अलग हिस्सों में परीक्षण शुरू होंगे।
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इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लि. कंपनी ने ऑस्ट्रेलिया के ग्रिफिथ विवि के साथ मिलकर कोडन डी-ऑप्टिमाइज्ड लाइव एटेन्यूएटेड जीका टीका विकसित किया जिसने प्री-क्लीनिकल मूल्यांकन पूरा कर लिया है लेकिन अभी तीन चरण के क्लीनिकल परीक्षण होने जरूरी हैं। इनमें से पहले चरण के परीक्षण भारत में होंगे जिसके लिए नई दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के साथ समझौता हुआ है। सरकार से अनुमति के बाद आईसीएमआर ने अपने नेटवर्क में शामिल सभी चिकित्सा संस्थानों में परीक्षण की मंजूरी दी है।
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छोटे अणुओं, टीका पर कोई भी कर सकेगा अध्ययन
आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने बताया कि हाल ही में आईसीएमआर ने पहले चरण के परीक्षण को लेकर एक ऐसा नेटवर्क लॉन्च किया जिसमें छोटे अणुओं, जैविक पदार्थों या फिर टीका पर कोई भी संस्थान या फार्मा कंपनी मानव सुरक्षा अध्ययन कर सकती है। अभी तक इसके लिए विदेशों में जाना पड़ता था लेकिन अब भारत में हमारे पास यह नेटवर्क मौजूद है। इस नेटवर्क में मुंबई के एसीटीआरईसी और केईएम, चेन्नई का एसआरएम और उत्तर भारत में चंडीगढ़ पीजीआई शामिल है। इन चारों स्थान पर टीका का परीक्षण किया जाएगा।
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वहीं इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड के प्रबंध निदेशक डॉ. के. आनंद कुमार ने बताया कि दुनिया भर में कई साल से जीका वायरस का प्रकोप देखने को मिल रहा है। अभी तक इसका कोई भी टीका उपलब्ध नहीं है लेकिन अब हमारे पास कोडन डी-ऑप्टिमाइज्ड वायरल टीका है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि मानव सुरक्षा परिणाम बेहतर मिलने के बाद यह टीका जल्द ही दुनिया के सामने होगा।
आमतौर पर हल्की बीमारी, लेकिन गंभीर भी बहुत
आईसीएमआर ने बताया कि यह बीमारी आमतौर पर हल्की होती है और इसके लिए किसी विशेष उपचार की आवश्यकता नहीं होती है। हालांकि यह तब अधिक गंभीर होता है जब गर्भावस्था के दौरान संक्रमण होता है जो शिशु में माइक्रोसेफली और अन्य जन्मजात विकृतियों, समय से पहले जन्म और गर्भपात का कारण बन सकता है। कुछ मामलों में गुलियन-बैरे सिंड्रोम भी विकसित हो सकता है जो एक न्यूरोलॉजिकल विकार है।
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