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टीके की रफ्तार: कोरोना वैक्सीन के 100 करोड़ डोज लगने के क्या मायने हैं, क्या कोरोना खत्म हो गया?

Thu, 21 Oct 2021 10:05 AM IST
Ravinder Bhajni रविंद्र भजनी
Updated Thu, 21 Oct 2021 10:05 AM IST
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सार
100 Crore Vaccination Milestone: हम यह नहीं भूल सकते कि करीब 23-24 करोड़ वयस्क ऐसे हैं, जिन्होंने एक डोज भी नहीं लिया है। इससे सवाल उठता है कि क्या एक-चौथाई आबादी वैक्सीन लगाने से हिचक रही है? 
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India create History with 100 crore vaccination all you need to know about its importance and coronavirus
भारत में 100 करोड़ लोगों को लगा कोरोना का टीका - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत ने कोविड-19 के खिलाफ टीकाकरण में एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। चीन के बाद भारत 100 करोड़ डोज देने वाला दूसरा देश बन गया है। चीन भले ही अपनी वयस्क आबादी को कोविड-19 के खिलाफ वैक्सीनेट करने का दावा करता हो, उसके आंकड़े कभी भी भरोसेमंद नहीं रहे। इस वजह से पश्चिमी देशों के विशेषज्ञ उसे तवज्जो नहीं देते। इस उपलब्धि पर हमने देश के नामी वैक्सीन और महामारी विशेषज्ञों डॉ. गगनदीप कंग और डॉ. चंद्रकांत लहारिया से जाना कि इस उपलब्धि के मायने क्या हैं? क्या यह महामारी के अंत का संकेत है?

भारत में कोविड-19 वैक्सीन के 100 करोड़ डोज हो गए हैं, इसका क्या मतलब है?

महामारी विशेषज्ञ डॉ. लहारिया कहते हैं कि करीब 30 करोड़ वयस्कों को पूरी तरह टीका लग चुका है। वहीं, 70 करोड़ वयस्कों को एक डोज लगा है। 100 करोड़ डोज का आंकड़ा उत्साह बढ़ाने वाला है। इसके बाद भी यह नहीं भूल सकते कि करीब 23-24 करोड़ वयस्क ऐसे हैं, जिन्होंने एक डोज भी नहीं लिया है। इसका कारण जानना बेहद जरूरी है। एक-चौथाई आबादी वैक्सीन लगाने से हिचक रही है। उनकी हिचक तोड़ना जरूरी है। इसी तरह खबरें आ रही हैं कि लोग दूसरा डोज नहीं लगवा रहे, इस पर फोकस करने की आवश्यकता है। लोगों को समझाना होगा कि पूरी तरह प्रोटेक्शन तभी मिलेगा जब दोनों डोज लगे होंगे। 

वेल्लोर में क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज की प्रोफेसर और देश की जानी-मानी वैक्सीन एक्सपर्ट डॉ. गगनदीप कंग कहती हैं कि भारत के वैक्सीनेशन प्रोग्राम के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है। सिर्फ एक-तिहाई वयस्क ही पूरी तरह वैक्सीनेट हुए हैं। यह ध्यान में रखना बेहद जरूरी है। 

क्या कोविड-19 महामारी खत्म हो गई है?

डॉ. कंग के मुताबिक महामारी अब मंद पड़ रही है। यह अब एंडेमिक (स्थानीय महामारी) की शक्ल ले रही है। इसके बाद भी मामले बढ़ने के छोटे-छोटे दौर देखने को मिल सकते हैं। वायरस भी लगातार अपना स्वरूप बदल रहा है। उस पर काबू रखने के लिए हमें वैक्सीनेशन का दायरा बढ़ाना होगा। साथ ही मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और वेंटिलेशन जैसे उपायों को बढ़ाना होगा। 

डॉ. लहारिया कहते हैं कि दूसरी लहर के बाद सीरो सर्वे में हमने देखा था कि 67.6% लोगों को कोरोना संक्रमण हो चुका है। जिन्हें संक्रमण हो चुका है, उन्हें एक खुराक भी काफी हद तक सुरक्षा देती है। हम उस दिशा में जा रहे हैं, जहां ज्यादातर को संक्रमण या एक खुराक से सुरक्षा मिली हुआ है। इसके बाद भी लंबे समय तक बचाव के लिए तीन-चौथाई आबादी को कम से कम एक खुराक मिलनी चाहिए। दोनों खुराक के बाद ही पूरा प्रोटेक्शन मिलता है।  

100% कवरेज के लिए क्या करना होगा?

डॉ. कंग के मुताबिक, भारत ने आज तक 100% वैक्सीनेशन कवरेज हासिल नहीं किया है। इससे पहले हम अन्य वैक्सीन के मामले में 90% कवरेज हासिल करने में कामयाब रहे हैं। इस आंकड़े तक पहुंचने के लिए अभी लंबा सफर तय करना है। लोकल कवरेज बढ़ाने के लिए उस नेटवर्क का फायदा उठाकर गांव-गांव तक वैक्सीन पहुंचानी बेहद जरूरी है।  

आगे क्या करना होगा?

दोनों ही विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में 100 करोड़ डोज एक बड़ी उपलब्धि जरूर है, पर यह काफी नहीं है। भारत में अगले एक-दो महीने त्योहारों के हैं। लोग एक जगह जुटेंगे तो केस बढ़ सकते हैं। दुनियाभर में हम देख चुके हैं कि जब लोग एक साथ आते हैं तो केस बढ़ने लगते हैं। ऐसे में फेस्टिव सीजन के दौरान सावधानी और सतर्कता बेहद जरूरी है। वैक्सीनेशन के साथ-साथ मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे उपायों को आजमाना होगा।
 

भारत में वैक्सीन बनने और लगने की कहानी

भारत के कोविड-19 वैक्सीनेशन अभियान में मुख्य तौर पर दो वैक्सीन इस्तेमाल की गई है- कोवाक्सिन और कोविशील्ड। कोवैक्सिन को हैदराबाद की कंपनी भारत बायोटेक ने इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरलॉजी (NIV) के साथ मिलकर बनाया है। वहीं, कोवीशील्ड को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने ब्रिटिश दवा कंपनी एस्ट्राजेनेका के साथ मिलकर बनाया है। पुणे की कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII)  ने इसका लाइसेंस हासिल किया और भारत में इसका प्रोडक्शन किया। 

कोवाक्सिन बनाने के लिए कोरोना वायरस का इस्तेमाल

कोवाक्सिन बनाने के लिए कोरोना वायरस का इस्तेमाल किया गया है। यह इनएक्टिवेटेड वैक्सीन है। यह एक पारंपरिक प्लेटफॉर्म है, जिसमें वायरस को कमजोर कर शरीर में प्रवेश कराया जाता है। वायरस हासिल करने में NIV ने भारत बायोटेक की मदद की थी। कमजोर किया हुआ वायरस शरीर में जाकर मल्टीप्लाई नहीं हो पाता और शरीर को उससे लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनाने का मौका मिल जाता है। 

कोवाक्सिन को तीन चरणों पर जांचा-परखा गया है। पहले और दूसरे चरण में 1125 लोगों को शामिल किया गया था। इन्हें वैक्सीन के दोनों डोज 28 दिन के अंतर से दिए गए। पहले चरण में वैक्सीन के इम्युनोजेनेसिटी इफेक्ट की पड़ताल हुई। यह देखा गया कि वैक्सीन शरीर में जाकर किस तरह का प्रभाव दिखाती है। दूसरे चरण में इसकी सेफ्टी की पड़ताल की गई। यह देखा गया कि वैक्सीन सेफ है या नहीं। तीसरे और आखिरी फेज में 25,800 लोगों को शामिल किया गया था। इसके लिए रजिस्ट्रेशन चल रहा था, तब ही वैक्सीन को जनवरी में इमरजेंसी अप्रूवल दे दिया गया। इसे लेकर विवाद भी हुआ था।
  
वहीं, कोविशील्ड बनाने के लिए चिम्पांजी में पाए जाने वाले एडेनोवायरस का इस्तेमाल किया गया है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने इस वैक्सीन को बनाने के लिए एडेनोवायरस में जरूरी बदलाव किए हैं, ताकि यह शरीर में जाकर कोरोनावायरस जैसा व्यवहार करें और शरीर इससे लड़ने के लिए एंटीबॉडी विकसित कर लें। चूंकि, कोविशील्ड के शुरुआती ट्रायल्स विदेश में हुए थे, इस वजह से इसके सिर्फ ब्रिजिंग ट्रायल्स (फेज-2/3) ही भारत में कराए गए थे।

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