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स्मार्टफोन निर्माण में दुनिया में क्यों पिछड़ गया देश? तकनीकी हस्तांतरण के बिना बेकार साबित होगी केंद्र की यह योजना
Sun, 02 Aug 2020 12:21 PM IST
देव कश्यप
अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली
Published by: देव कश्यप
Updated Sun, 02 Aug 2020 12:21 PM IST
सार
- इस समय देश में 60 से ज्यादा कंपनियां कर रहीं मोबाइल निर्माण, लेकिन ज्यादातर विदेशी।
- एप्पल जैसी बड़ी कंपनियों ने भारत में मोबाइल निर्माण की योजना बनाई, लेकिन तकनीकी हस्तांतरित न होने पर बड़ा लाभ नहीं मिलने की आशंका जता रहे विशेषज्ञ।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : pixabay
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विस्तार
स्मार्टफोन उपयोग के मामले में भारत चीन के बाद विश्व में दूसरे नंबर पर पहुंच गया है। अनुमान है कि 2022 तक भारत में स्मार्टफोन के 44 करोड़ से अधिक उपभोक्ता होंगे। लेकिन इस बड़े अवसर के बाद भी स्मार्ट फोन के लिए भारत अभी भी ज्यादातर चीनी कंपनियों पर ही निर्भर करता है। इस समय देश में 60 से ज्यादा कंपनियां स्मार्ट फोन निर्माण के क्षेत्र में लगी हुई हैं, लेकिन इनमें ज्यादातर विदेशी कंपनियां शामिल हैं जो अपनी सहयोगी कंपनियों के साथ मिलकर देश में निर्माण कर रही हैं।
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एप्पल जैसी कुछ अन्य बड़ी कम्पनियों ने भी भारत में स्मार्टफोन निर्माण में रूचि दिखाई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इनके द्वारा तकनीकी हस्तांतरण की कोई ठोस तोजना नहीं बनाई गई तो इसका देश को कोई बड़ा लाभ नहीं होगा। ये कंपनियां जब भी भारत से अपना कामकाज समेटेंगी, देश स्मार्टफोन निर्माण में पिछड़ जाएगा।
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इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों के निर्माण को बढ़ोतरी देने के लिए विशेष योजनाओं की घोषणा
टेलिकॉम इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन (टीईएमए) के शीर्ष पदाधिकारी एनके गोयल ने अमर उजाला को बताया कि केंद्र सरकार ने देश में इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों के निर्माण को बढ़ोतरी देने के लिए विशेष योजनाओं की घोषणा की है। इनसे स्मार्टफोन निर्माण में लगी कंपनियों को 50 हजार करोड़ तक की भारी राहत मिलने का अनुमान है, लेकिन अगर इन विदेशी कंपनियों को किसी भारतीय कंपनी के साथ ज्वाइंट वेंचर के तरीके से नहीं जोड़ा गया तो इससे मोबाइल फोन निर्माण की उन्नत तकनीकी का सही हस्तांतरण नहीं हो पाएगा। इससे देश में स्मार्टफोन बनने के बाद भी बहुत लाभ नहीं होगा।
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चीनी कंपनियों से पिछड़ीं भारतीय कंपनियां
भारतीय मोबाइल फोन निर्माता कंपनियों ने विदेशी पुर्जे लाकर यहां असेंबल करने को ही मैन्युफैक्चरिंग का नाम दे दिया। केंद्र की तरफ से इन कंपनियों को भी वही लाभ दिए गए जो असली मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को दिए जाते हैं। लिहाजा देश में स्मार्टफोन की आधारभूत चीजों के निर्माण का देश में कोई डिजाइन नहीं बन पाया। 2014 के आसपास देश की कुछ कंपनियां ठीक-ठाक उत्पादन कर रही थीं, लेकिन चीनी कंपनियों ने अपनी भारी पूंजी और सघन प्रचार रणनीति के जरिए उन्हें बाजार से बाहर कर दिया।
एप्पल, सैमसंग, लावा और डिक्सन जैसी कंपनियों ने अगले पांच सालों के अंदर 11 लाख करोड़ रुपये मूल्य के मोबाइल और उनके पार्ट्स भारत में बनाने में रूचि दिखाई है। इससे बाजार के अकेले इस सेक्टर में तीन लाख प्रत्यक्ष और नौ लाख अप्रत्यक्ष नौकरियों के सृजन का अनुमान लगाया जा रहा है।
केंद्र सरकार ने देश में मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण को मजबूती देने के लिए विशेष योजनाओं (Production Linked Incentive, PLI) की घोषणा की है। इसके तहत अगले पांच सालों में कर रियायत सहित अनेक कदमों के जरिए कंपनियों को 50 हजार करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता/छूट दी जाएगी। यह छूट उन्हीं कंपनियों को मिलेगी जो भारतीय बाजार में इलेक्ट्रोनिक कंपोनेंट्स और सेमीकंडक्टर बनाने का काम करेंगी।
सरकार का अनुमान है कि इस छूट से अगले पांच सालों के अंदर देश में आठ लाख करोड़ रुपये के मोबाइल फोन का उत्पादन हो सकेगा। इससे मोबाइल के एक्सपोर्ट को भी बढ़ावा मिलेगा जिसके अगले पांच सालों में 5.8 लाख करोड़ रुपये के लाभ होने का अनुमान है। इस नीति से देश में मोबाइल निर्माण उद्योग को 2015 तक दस लाख करोड़ रुपये का बाजार बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
भारतीय कंपनियां
वर्ष 2014 में माइक्रोमैक्स, लावा और इंटेक्स जैसी गिनी-चुनी देशी कंपनियां भारत में मोबाइल उत्पादन कर रही थीं। इसी बीच चीनी कंपनियों ने भारतीय बाजार में प्रवेश किया। भारी पूंजी और सघन प्रचार रणनीति के बल पर वे जल्दी ही भारतीय बाजार पर काबिज हो गईं और भारतीय कंपनियों को अपना कामकाज समेटना पड़ा।
बाजार हिस्सेदारी बेहद कम हो जाने के बाद भी माइक्रोमैक्स अभी भी अच्छी भारतीय मोबाइल निर्माता कंपनी के रूप में जानी जाती है। राहुल शर्मा नाम के व्यक्ति द्वारा 2000 में शुरू की गई इस कंपनी का मुख्यालय गुरुग्राम में है। कंपनी मोबाइल के आलावा एसी, टीवी, लैपटॉप जैसी चीजों का निर्माण करती है। आज भी कंपनी लगभग दो हजार लोगों को रोजगार देती है। इसका वार्षिक कारोबार 2,368 करोड़ के आसपास है।
नई दिल्ली के नरेंद्र बंसल की कंपनी इंटेक्स भारतीय बाजार की दूसरी बड़ी कंपनी है। यह भी माइक्रोमैक्स की तरह मोबाइल के साथ-साथ टीवी, टेबलेट, फीचर फोन, एसी और कूलर बनाने के कामकाज में लगी है। कंपनी की अनुमानित रेवेन्यू 6200 करोड़ रुपये है और यह दस हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार देती है।
हरिओम राय की कंपनी लावा नोएडा से कामकाज करती है और मोबाइल निर्माण क्षेत्र में भारत की तीसरी प्रमुख कंपनी मानी जाती है। 2009 से शुरू हुई इस कंपनी में भी स्मार्ट फोन, टेबलेट और लैपटॉप बनाए जाते हैं। 542 करोड़ के वार्षिक रेवेन्यू वाली इस कंपनी में भी दस हजार लोगों को रोजगार मिलता है।
2009 में ही शुरू हुई नई दिल्ली की एक कंपनी कार्बन मोबाइल भी 650 करोड़ रुपये की रेवेन्यू के साथ दस हजार लोगों को रोजगार उपलब्ध कराती है। इसके आलावा आईबॉल, स्पाइस, स्वाइप, सेल्कोन, स्मारट्रोन और जोलो भी कामकाज कर रही हैं।
भारतीय स्मार्टफोन बाजार में इस समय चीनी कंपनियों का कब्जा है। काउंटरप्वाइंट रिसर्च के मुताबिक 2020 की पहली तिमाही में भारतीय स्मार्ट फोन बाजार में शियोमी 30 प्रतिशत, विवो 17 प्रतिशत, रियलमी 14 प्रतिशत और ओप्पो 12 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है। दक्षिण कोरिया की कंपनी सैमसंग का इस समय 16 प्रतिशत बाजार पर कब्जा है। मोबाइल फोन बाजार के मामले में भारत, चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। वर्ष 2019 में भारत में 15.8 करोड़ मोबाइल फोन बेचे गए।