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'कोई मां इतनी निर्दयी कैसे हो सकती है'

Sun, 28 Aug 2016 12:58 PM IST
बीबीसी
बीबीसी Updated Sun, 28 Aug 2016 12:58 PM IST
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 " How can a mother be so cruel '
मां - फोटो : BBC

24 साल की पिंकी विधवा हो चुकी हैं। उनकी सास देवकी देवी के पति कुछ साल पहले गुजर गए। इस बाढ में बीते रविवार को उनका बेटा भी डूब गया। बिहार में भागलपुर जिले के सबौर ब्लॉक के राजेंदीपुर गांव में बाढ के कारण तीन मौत हुई हैं।

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इनमें एक थे दिलीप। दूसरे देवकी के बेटे और तीसरे पिंकी के पति। देवकी के घर में अब कोई कमाउ मर्द नहीं बचा। एक छह साल का बेटा है। अपनी मां पर आश्रित। पिंकी की गोद में भी डेढ साल की बेटी है शिवानी। इन लोगों ने सबौर उच्चविद्यालय के बाढ राहत शिविर में पनाह लिया है।
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स्कूल के मैदान में प्लास्टिक के छज्जे वाले अस्थायी तंबू के नीचे। साथ में कुछ बकरियां भी हैं। इस राहत शिविर में जिंदगी की कडवी सच्चाई को बयां करते ऐसे कई लोग हैं। पिंकी कहती हैं कि उनके पति के मर जाने के बाद अब उनकी जिंदगी कैसे चलेगी। उन्हें कौन कमा कर देगा। बच्चों की परवरिश कौन करेगा।
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झारखंड के गोड्डा जिले के खट्टी समनपुर गांव में पिंकी की शादी 12 साल पहले राजेंदीपुर के दिलीप रजक से हुई थी। तब वे बहुत छोटी थीं। अब जब बडी हुईं तो गंगा ने उनसे उनका पति छीन लिया।

पिंकी की सास देवकी देवी भी रो रही हैं। उन्होंने बीबीसी से कहा कि अब वे घर कैसे चलाएंगी। फिक्र इसी की है। एक तो छोटा बेटा, दूधमुंही पोती और विधवा बहू। इन सबके लिए कमाने वाला तो भंवर में फंसकर डूब गया।

"कोई मां इतनी निर्दयी कैसे हो सकती है

 " How can a mother be so cruel '

वे कहती हैं, "कोई मां इतनी निर्दयी कैसे हो सकती है। गंगा अगर मां हैं, तो उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।" बगल में बैठे उनके छह साल के बेटे ने भाई को मुखाग्नि दी है। सफेद कपडों में बैठा छोटू रजक कभी अपनी मां को देखता है, कभी भाभी को।

इस तंबू के बगल में एक और तंबू है। इसमें फूलन देवी बैठी हैं। उनके 18 साल के बेटे सूरज कुमार की 24 अगस्त की शाम बाढ के पानी में डूबकर मौत हुई है। वे भी राजेंदीपुर की हैं। फूलन देवी ने बताया कि उनके पति बनवारी मंडल विकलांग हैं। काम नहीं कर सकते।

16 साल की बेटी गीता शादी के योग्य है तो 8 साल का बेटा संजीत अबोध। घर गंगा के गर्भ में समा चुका है। वे कहती हैं, "अभी राहत शिविर में खाना मिल जा रहा है। जब यह शिविर हटेगा तो बच्चों को कहां से खिलाएंगे। घर कैसे बनाएंगे।

आप लोग प्रशासन से कहिए। हमें मुआवजा मिल जाए।" राजेंदीपुर पंचायत में करीब 4000 घर हैं। आबादी 20 हजार से भी अधिक। यहां के विनोद मंडल ने बताया कि बाढ आने पर कुछ लोग अपने संबंधियों के यहां चले गए।

कुछ राहत शिविर आ गए। बाकी के लोग घर का मोह नहीं छोड पा रहे तो बाढ के बीच अपनी छतों पर वजूद बचाने का संघर्ष कर रहे हैं। इस बीच गंगा के जलस्तर में कोई कमी नहीं आयी है। इन महिलाओं को कोई मुआवजा नहीं मिला है।

जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा की थी कि बाढ के कारण मरने वाने लोगों के परिजनों को सरकार चार लाख रुपये का मुआवजा देगी। आज इस शिविर में दाल-भात और आलू-सोयाबीन की सब्जी बनी है। लोग अपनी-अपनी थाली लेकर लाइन में लगने लगे हैं। इसी का नाम जिंदगी है शायद।  
 

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