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काश! कारगिल से सबक ले पाते
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 25 Jul 2018 01:54 PM IST
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करीब 5000 पाकिस्तान के घुसपैठिए वहां की सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई की सह पर कारगिल क्षेत्र में आकर जम गए, हमारी सेना, खुफिया एजेंसियों को पता ही नहीं चला। पाकिस्तानी सेना के घुसपैठिए आए ही नहीं बल्कि टाइगर हिल जैसी चोटी तक स्थायी बंकर बना लिया, हथियारों का जखीरा और साजो-सामान इकट्ठा कर लिए और जब हमें स्थानीय से सूचना मिली तो उस समय हमारे सेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक भी पोलैंड की यात्रा पर थे। दरअसल, यह युद्ध हमारी खुफिया चूक का सबसे बड़ा नतीजा था।
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छिड़ गया संघर्ष
3 मई 1999 को भारतीय सेना को इसकी जानकारी मिलने के बाद 5 मई को सेना ने घुसपैठियों को खदेड़ने का निर्णय लिया। धीरे-धीरे जानकारी बढ़ने लगी और पता चला कि घुसपैठियों ने स्थाई बंकर बनाकर कारगिल के सीधे खड़े पहाड़ों पर स्थायी ठिकाना बना लिया है। 9 मई तक भारतीय सैनिकों के जवाब में पाकिस्तानी घुसपैठियों ने भारी हथियारों से जवाब देना शुरू कर दिया।
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10 मई को द्रास, काकसर, मश्कोह में घुसपैठियों के होने की सूचना मिली। इसका मुकाबला करने के लिए बाकायदा युद्ध जैसी तैयारी करनी पड़ेगी। ऑपरेशन विजय का खाका तैयार होने लगा, लेकिन उस समय सेना की इनफैंट्री, आर्टिलरी दोनों की दशा इतनी अच्छी नहीं थी। बोफोर्स तोप घोटाला सामने आने के बाद से आर्टिलरी को नई तोपें, गोला-बारूद भी मिलने की संभावना सिमट गई थी। जबकि घुसपैठियों का मुकाबला बिना तोप के कवर फायर के या वायुसेना के इस्तेमाल के संभव नहीं था।
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सुरक्षा मामलों के केंद्रीय मंत्रिमंडल के सामने एक-एक निर्णय लेना कठिन चुनौती जैसा था। क्योंकि वायुसेना के इस्तेमाल से जहां पाकिस्तान के साथ युद्ध छिड़ जाने की आशंका थी, वहीं एक भारी भरकम खर्च, गोला बारूद की आपूर्ति जैसे तमाम बड़े सवाल थे। लिहाजा निर्णय लिया गया कि वायुसेना का सीमित इस्तेमाल होगा। हमारी सेनाएं नियंत्रण रेखा को क्रॉस नहीं करेगी। 26 मई को वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर चलाया और मिग-21, मिग-27 को ऑपरेशन में लगाया। मिग-17 हेलीकाप्टर ने जौहर दिखाए।
इस सैन्य ऑपरेशन को पूरा करने के लिए इस्राइल से लेजर गाइडेड बम लेने की प्रक्रिया शुरू हुई। बोफोर्स तोपों को मोर्चे पर तैनात किया गया और करीब 30 हजार सैन्य बल इस ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए तैनात किए गए। युद्ध छिड़ने की संभावना को देखते हुए पोखरण से लेकर अन्य सीमावर्ती क्षेत्र में बारूदी सुरंग बिछाने के सेना ने आदेश दे दिए। इसके साथ-साथ भारत ने अमेरिका जैसे तमाम देशों की सहायता से पाकिस्तान के ऊपर कूटनीतिक दबाव बढ़ाया। ताकि पड़ोसी देश को युद्ध जैसी आशंका से सीमित किया जा सके।
समाप्त हुआ कारगिल संघर्ष
मई 1999 में आरंभ हुआ ऑपरेशन 26 जुलाई 1999 को समाप्त हो गया। भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी सेना की मदद से वहां जमे घुसपैठियों की पहले सप्लाई लाइन काटी और फिर लेजर गाइडेड बमों की वर्षा करके उनके बंकर ध्वस्त किए। बोफोर्स तोप की कवर फायर में इनफैंट्री सीधे खड़े पहाड़ पर चढ़ते हुए घुसपैठियों को निशाने बनाने लगी।
छह जून 1999 से भारतीय सेना कारगिल क्षेत्र में आक्रामक हो गई। पाकिस्तानी सैनिकों से बरामद गोला बारूद, साजो सामान इसे पूरी तरह से पाकिस्तान की सेना के शामिल होने सूचना दे रहे थे। नौ जून को सेना ने बटालिक की दो चोटियों पर पुन: कब्जा कर लिया। 11 जून को भारतीय एजेंसियों ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ और चीफ ऑफ जनरल स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल अजीज खान की बातचीत को रिकॉर्ड करके सबूत के तौर पर पेश कर दिया।
इससे पाकिस्तान की सेना के इसमें शामिल होने की आशंका पक्की हो गई और पड़ोसी देश पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जा सका। सबसे बड़ी सफलता 29 जून को मिली जब भारतीय सेना के जवानों ने टाइगर हिल के पास की 5090 और 5100 चोटी को फिर कब्जे में ले लिया। इसके बाद टाइगर हिल, जुबेर हाइट (बटालिक) तक धावा बोलने में आसानी हो गई।
इस तरह से भारतीय सैनिक ने अदम्य साहस, तालमेल और कुशलता का परिचय देते हुए पाकिस्तानी उग्रवादियों, सैनिकों को पीछे धकेलने में सफल रहे। इस सैन्य ऑपरेशन में भारत के दावे के अनुसार हमारे 527 सैनिक शहीद हुए, 1363 घायल हुए, एक सैनिक युद्धबंदी बनाया गया, पाकिस्तान ने हमारे एक लड़ाकू विमान को मार गिराया, एक लड़ाकू विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ, एक हेलीकाप्टर इसकी चपेट में आया।
लेकिन हम सीखे कम
कारगिल संघर्ष का वायुसेना के संक्षिप्त इस्तेमाल से चलाया गया भारतीय सेना का ऑपरेशन विजय सफल रहा। भारतीय सेना ने कारगिल की पहाड़ियों पर फिर से कब्जा जमा लिया, लेकिन हम सीखे कम। कारगिल युद्ध के बाद सेना को आधुनिक बनाने, युद्धक क्षमता से लैस करने के लिए के सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में कारगिल समीक्षा समिति बनी।
अजय विक्रम सिंह की समिति ने तमाम सुझाव दिए। लेकिन इन पर आज तक ठंग से अमल नहीं हो पाया है। इनफैंट्री अभी भी गुणवत्ता के साजो-सामान की कमी से जूझ रही है। इनफैंट्री के जवानों के पास गुणवत्ता की राइफल नहीं है। नेक एरिया और आस-पास के क्षेत्र को कवर करने के लिए गुणवत्ता की बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं है।
पाकिस्तान के आतंकी घुसपैठिए स्टील बुलेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और यह हमारे सैनिकों की बुलेट प्रूफ जैकेट को छलनी कर रही है। नाइट विजन डिवाइस के मामले में भी कोई प्रगति नहीं हो पाई। इस्राइल से कारगिल के बाद सीमा पर लगाए गए सेंसर वाले बाड़ अब आउटडेटेड हो गए हैं और उसका विकल्प खड़ा नहीं किया जा सका है। इतना ही नहीं आर्टिलरी के पास अभी तोप का अभाव है। जबकि भारत को पास चीन और पाकिस्तान से दोहरी चुनौती मिल रही है।
1998 से वायुसेना मांग रही है फाइटर जेट
भावी चुनौतियों को देखकर वायुसेना 1998 में अपनी फाइटरजेट क्षमता बढ़ाकर 40 स्वाड्रन (एक स्वाड्रन में 16 फाइटर जेट और दो प्रशिक्षण के लिए फाइटरजेट होते हैं) करना चाहती है। इसके लिए वायुसेना 126 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों की जरूरत पर बल दिया था। लेकिन अभी तक वायुसेना इसके लिए इंतजार कर रही है। यूपीए-1 सरकार के समय में 2007 में इसके लिए अंतरराष्ट्रीय लड़ाकू विमान निर्माता कंपनियों से निविदा मंगाई गई।
अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और यूरोपीय यूनियन के छह फाइटर जेटों ने इस प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लिया। अंत में भारत ने फ्रांस की दसाल्ट कंपनी के 126 लड़ाकू विमानों को लेने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए 2013 में आपसी सहमति पत्र पर दस्तखत किया।
- जनवरी 2015 में भारत सरकार ने पुरानी सरकार के निर्णय और 126 लड़ाकू विमानों की निविदा को रद्द करते हुए फ्रांस से 36 लड़ाकू विमानों को लेने के प्रस्ताव को आगे बढ़ा दिया।
- मेक इंन इंडिया प्रस्ताव के तहत भारत ने वायुसेना की चिंता को दरकिनार करते हुए 126 एकल इंजन के लड़ाकू विमानों को देश में तैयार करने का प्रस्ताव आगे बढ़ाया और पिछले साल एक बार फिर इसे भी रद्द कर दिया।
- पिछले साल रक्षा मंत्रालय से मिले दिशा-निर्देश के तहत वायुसेना ने फिर से 110 बहुउद्देश्यी लड़ाकू विमानों के लिए अंतरराष्ट्रीय निविदा जारी की है। अब देखना है वायुसेना के जटिल परीक्षण के बाद कब इन लड़ाकू विमान की खेप उसे मिल पाती है।