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इच्छामृत्यु पर आया ऐतिहासिक फैसला, जानिए कब क्या हुआ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 09 Mar 2018 03:51 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि गरिमा के साथ मौत एक मौलिक अधिकार है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु और लिविंग विल को कानूनन वैध ठहराया है। जानिए इस मामले में कब क्या हुआ।
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- 11 मई, 2005: सुप्रीम कोर्ट ने गरिमा के साथ मृत्यु को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार घोषित करने के लिए कॉमन कॉज नामक एनजीओ की याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया।
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- 16 जनवरी, 2006: शीर्ष अदालत ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को इस मामले में हस्तक्षेप की अनुमति देते हुए निष्क्रिय इच्छामृत्यु से संबंधित दस्तावेज दायर करने को कहा।
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- 28 अप्रैल, 2006: विधि आयोग ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर एक विधेयक लाने का सुझाव दिया और कहा कि ऐसे मामले हाईकोर्ट में दायर किए जाने चाहिए, जो विशेषज्ञों की राय के बाद इस बारे में फैसला करे।
- 31 जनवरी, 2007: शीर्ष अदालत ने सभी पक्षों कोदस्तावेज दायर करने का आदेश दिया।
- 7 मार्च, 2011: मुंबई के एक अस्पताल में 42 साल तक कोमा में रही अरुणा शानबाग की ओर से दायर एक अन्य याचिका पर विचार करते हुए सुुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी।
- 23 जनवरी, 2014: तत्कालीन चीफ जस्टिस पी सथसिवम की अध्यक्षता में तीन जजों की खंडपीठ ने इस मामले में अंतिम सुनवाई शुरू की।
- 25 फरवरी, 2014: कोर्ट ने शानबाग सहित कई मामलों में इच्छामृत्यु को लेकर दिए गए फैसलों में असंगति का हवाला देते हुए इसे संविधान पीठ को सौंप दिया।
- 15 जुलाई, 2014: पांच जजों की संविधान पीठ ने सुनवाई शुरू करते हुए सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस भेजा और टीआर अंध्यारूजिना को अदालत मित्र नियुक्त किया। सुनवाई के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
- 15 फरवरी, 2016: केंद्र ने कहा कि वह इस मामले में विचार कर रहा है।
- 11 अक्तूबर, 2017: चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।
- 9 मार्च, 2018: सुप्रीम कोर्ट ने ठीक न होने की कगार पर पहुंचे मरीज की लिविंग विल को मान्यता देते हुए निष्क्रिय इच्छामृत्यु को लेकर दिशानिर्देश तय किए।