मेवानी समेत तमाम सियासतदानों से उठा उना कांड के पीड़ितों का विश्वास
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गुजरात में दलित राजनीति का चेहरा बनकर उभरे जिग्नेश मेवानी बेशक विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन जिस उना कांड से वह दलित सियासत का बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं उसके पीड़ितों का विश्वास अब मेवानी समेत तमाम सियासतदानों से उठता जा रहा है।
उना घटना के पीड़ित वसराम सरवैया के पिता वल्लू भाई सरवैया का मानना है कि जिग्नेश सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने उना आए थे। अमर उजाला से बातचीत में वल्लू भाई सरवैया ने कहा कि यहां दलितों की हालत बहुत खराब है, मगर उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
राजनीति चमकाने के लिए तो बड़े बड़े लोग आए थे और बड़े-बड़े वायदे भी करके गए, लेकिन न्याय मिलना तो दूर मामले की जांच तक अभी आगे नहीं बढ़ी। स्थिति जस की तस है। उनका कहना है तत्कालीन मुख्यमंत्री ने वायदा किया था कि वह तीन माह में पूरा मामला सुलटा देंगी, लेकिन घटना को एक साल से ज्यादा हो गया है। कोई प्रगति नहीं है।
राजनेताओं के प्रति दिख रही नाराजगी
बीते एक वर्ष से उना की घटना गुजरात की राजनीति में चर्चा के मुख्य मुद्दे के रूप में रही है, मगर नेताओं की बेरुखी से उना पीड़ितों के मन में राजनेताओं के प्रति नाराजगी दिख रही है। पीड़ितों का दर्द यह है कि मीडिया के दबाव के बाद दलितों का हमदर्द बनने के लिए नेता यहां हाल-चाल पूछने तो आए, मगर घटना के एक साल बाद अब कोई नेता इनकी सुध लेने तक नहीं पहुंचा है।
किसी नेता के जरिए मामले की सुध न लेने की वजह से पीड़ित और उनके परिवार में राजनेताओं के प्रति नाराजगी है। अपने दिल का दर्द बयां करते हुए एक माह से बीमार वल्लू भाई सरवैया कहते हैं कि माना की भाजपाराज में हमें न्याय नहीं मिला लेकिन जिग्नेश के अलावा राहुल गांधी ने भी यहां आकर न्याय दिलाने का वायदा किया था। इसके बावजूद मामले में अब तक कोई कारवाई नहीं हुई है। दलितों के साथ यह विडंबना है।
उन्हें न्याय नहीं मिल पाता है। वल्लू भाई कहते हैं कि अगस्त के बाद उनकी किसी ने भी सुध नहीं ली है। जिग्रेश भी 15 अगस्त के बाद उना पीड़ितों का हाल जानने नहीं आए हैं और न ही उन्होंने फोन कर परिवार की सुध ली है।
उपेक्षा की वजह से बढ़ रही नाराजगी
उना के लोगों से मिलकर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उपेक्षा की वजह से उना पीड़ितों और उनके परिवार की नाराजगी बढ़ रही है। उनकी नाराजगी किसी एक से नहीं बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही दलों के नेताओं से है।
भाजपा से नाराज होने की वजह यह है कि उसके शासन में घटना हुई और दूसरा यह कि तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदी बेन ने मामले को तीन माह में निपटाने का वचन देते हुए दोषियों को सजा दिलाने का आश्वासन दिया था, मगर मामला अभी जस का तस है। जिग्नेश ने भी सुध लेना मुनासिब नहीं समझा है, इसकी वजह से उना के पीड़ित और उनके परिवार के लोगों के मन में राजनीति के प्रति रुचि कम होती दिख रही है।
चुनावी माहौल पर पीड़ित के पिता वल्लू भाई का कहना है कि उनकी तबीयत खराब है, वे घर से बाहर नहीं निकल रहे। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने कहा कि 15 अगस्त की रैली के बाद मेवानी ने न तो उनकी फोन पर सुध ली है और न हीं मिलने आए। सरवैया ने बताया कि उन्हें अभी भी 16 जुलाई 2016 की घटना याद है। जब उनके दोनों बेटों और दो भतीजों के जीवन में एकदम काली रात आई थी।
अब भी है न्याय मिलने की उम्मीद
वल्लू भाई सरवैया को अब भी न्याय मिलने की उम्मीद है। सियासतगर्दों से बेशक उनका मोह भंग हो रहा है, मगर उम्मीद है कि उन्हें न्याय जरूर मिलेगा। सरवैया दोबारा से अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने को तैयार नजर आ रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनके साथ नाइंसाफी हुई, तमाम कवायदों के बावजूद सरकार के जरिए उनके आवाज की अनसुनी हुई है, लेकिन वे इस बार अपनी आवाज सरकार तक जरूर पहुंचाएंगे।
गौरक्षकों का शिकार हुए थे दलित
दरअसल उना के समडियाला गांव के वल्लू भाई सरवैया के दोनों बेटे और दो भतीजे गौरक्षकों की हिंसा का शिकार हुए थे। घटना के दिन वल्लू के बेटे वसराम सरवैया के पास सुबह सात बजे ही बगल के गांव से किसी आदमी का फोन आया कि उनकी गाय को शेर ने मार दिया है। पुश्तैनी काम होने की वजह से वसराम अपने छोटे भाई रमेश और दो चचेरे भाइयों को लेकर उस जगह पहुंच गए और मरी हुई गाय का चमड़ा निकालने के काम में व्यस्त हो गए।
तभी गौरक्षकों की एक टोली वहां पहुंची और उन्होंने बिना कुछ जाने समझे वसराम और उनके भाइयों की पिटाई शुरू कर दी। यही नहीं पिटाई के बाद गौरक्षक वसराम और उनके तीनों भाइयों को पकड़ कर 25 किमी. दूर उना ताल्लुका तक ले गए और वहां भी जमकर चारों की पिटाई की। गोरक्षकों की पिटाई के बाद इन चारों दलित युवकों की हालत बेहद खराब हो गई। घटना के राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में आने के बाद प्रशासन पर दबाव बना, तब जाकर गौरक्षकों को पकड़ा गया।
फिलहाल केस चल रहा है, जिसमें 9 लोग अभी जेल में हैं। मगर बाकी आरोपी जमानत पर बाहर हैं। सरवैया परिवार की माली हालत इतनी खराब है कि उन्हें जीवनयापन चलाना भारी पड़ रहा है। जीवन का गुजारा करने के लिए उन्हें खेती और मजदूरी पर निर्भर रहना पड़ता है। वल्लू भाई सरवैया के परिवार में उनकी पत्नी, पीड़ित बेटा वसराम सरवैया और उसकी पत्नी, घटना का शिकार दूसरा बेटा रमेश सरवैया और उसकी पत्नी रहते हैं।
उना कांड में पीड़ित उनके दोनों भतीजे अशोक सरवैया और बेछर सरवैया की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है। वे अपने पिता के साथ खेतों में मजदूरी का काम कर अपना गुजर-बसर कर रहे हैं।
भाजपा के समर्थक रहे हैं समडियाला के दलित
समडियाला गांव के दलित अरसे से भाजपा के समर्थक रहे हैं। उना कांड के बाद उनके मन में भाजपा के खिलाफ सोच जरूर पनपी, मगर चुनाव करीब आते ही हृदय परिवर्तन होता दिख रहा है। कुछ दलित दोबारा से भाजपा के साथ की बात कर रहे हैं तो कुछ नाराजगी जताते हुए भाजपा के विरोध की भी बात कर रहे हैं।
तो एक-दो ऐसे भी निकले, जिन्होंने कहा कि उन्होंने अभी अपना मन नहीं बनाया है। लेकिन चुनाव के समय गांव में मीडिया के जाने को लेकर लोग आशंकित जरूर दिखे। यहां मतदान पहले चरण के तहत 9 दिसंबर को होना है।