एससी-एसटी एक्ट मामले में मजबूत संदेश देने की तैयारी, नहीं माना सुप्रीम कोर्ट तो अध्यादेश लाएगी सरकार
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
एससी-एसटी एक्ट मामले में मोदी सरकार अब रत्ती भर भी सियासी खतरा नहीं उठाना चाहती। बीते बुधवार को गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडलीय समूह (जीओएम) की बैठक में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपना आदेश न लेने की स्थिति में अध्यादेश जारी करने का फैसला हुआ। इसी बैठक में नाराज दलितों को साधने के लिए अब तक कार्यकारी आदेश से चल रही आरक्षण व्यवस्था को कानूनी जामा पहना कर इसे संविधान की नवीं अनुसूची में डालने संबंधी संभावनाओं पर भी चर्चा हुई। यह भी फैसला हुआ कि सरकार दलितों को प्रमोशन में आरक्षण मामले में नए सिरे से आगे बढ़ेगी।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को जवाब देने के लिए आयोजित जीओएम की बैठक में उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान ने इस पूरे मामले में अटार्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मामले की सुनवाई के दौरान जब सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट में अंतरिम जमानत देने का पक्ष लिया तो सरकारी पक्ष ने इसे सही तरीके से नहीं रखा।
सूत्रों ने बताया कि इसके बाद राजनाथ सिंह ने कहा कि जब इस मामले में सरकार का रुख स्पष्ट है तब अटार्नी जनरल-सॉलिसिटर जनरल के रुख में भ्रम की स्थिति नहीं दिखनी चाहिए। इसके बाद ही सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को अपने जवाब में फैसले पर न सिर्फ पुनर्विचार का उपयोग किया, बल्कि यह भी कहा कि इस फैसले के कारण देश को व्यापक नुकसान उठाना पड़ा। बैठक में जीओएम के अन्य सदस्यों कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, सामाजिक न्याय मंत्री थावर चंद गहलोत और नरेंद्र सिंह तोमर ने भी सुझाव दिए।
जीओएम के वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि बैठक में अगले तीन महीने में दलितों के खिलाफ बनी धारणा को बदलने की रणनीति बनी। इसी रणनीति के तहत एक्ट में रत्ती भर बदलाव न होने देने, जरूरी पडने पर अध्यादेश लाने पर सहमति बनी। एक सदस्य ने सुझाव दिया कि अब तक कार्यकारी आदेश से चल रही एससी-एसटी आरक्षण की व्यवस्था को एक्ट बना कर इसे संविधान की 9वीं अनुसूची में डाला जाए। जिससे भविष्य में कोई भी पक्ष इससे छेड़छाड़ न कर पाए। एससी-एसटी को प्रमोशन में आरक्षण मामले में भी मानसून सत्र में आगे कदम बढ़ाने पर सहमति बनी।
पासवान बोले- माया को बोलने का हक नहीं
एक्ट के प्रावधानों में बदलाव पर केंद्र पर निशाना साधने वाली बसपा प्रमुख मायावती को पासवान ने आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि सत्ता में रहने मायावती ने कार्यकारी आदेश के जरिए बलात्कार जैसे मामले में एफआईआर दर्ज करने से पहले पीड़िता का मेडिकल टेस्ट अनिवार्य कर दिया था। इतना ही नहीं इस आदेश में उन्होंने इस एक्ट के व्यापक दुरुपयोग की बात करते हुए प्रशासन से कहा था कि एफआईआर तभी दर्ज हो जब वह जांच में सही पाया जाए।
इस दौरान पासवान ने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में वंचितों की भावनाओं को समझते हुए अपने फैसले पर पुनर्विचार करेगा। उन्होंने कहा कि एससी-एसटी एक्ट विशेष एक्ट है। शोषितों-वंचितों को प्रताडना, शोषण, उत्पीडन से बचाने के लिए संविधान निर्माताओं ने संविधान में विशेष प्रावधान किए थे। मगर इस फैसले से इस एक्ट की मूल भावना पर आंच पहुंची है।