सरकारों पर मीडिया घरानों का 1800 करोड़ रुपए बकाया: आईएनएस
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समाचार पत्रों के संगठन इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (आईएनएस) ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि केंद्र और राज्य सरकारों पर विज्ञापन के मद का विभिन्न मीडिया घरानों का 1,800 करोड़ रुपए का बकाया है। आईएनएस का कहना कि निकट भविष्य में यह रकम मिलने की संभावना बहुत कम है। आईएनएस ने हलफनामा दाखिल कर कोर्ट को मीडिया उद्योग की माली हालत से अवगत कराया। न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) ने भी अलग हलफनामे में इस तथ्य की ओर शीर्ष अदालत का ध्यान आकर्षित किया है।
दोनों संगठनों ने अपना जवाब पत्रकारों के संगठनों- नेशनल अलायंस आफ जर्नलिस्ट्स, दिल्ली यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स और बृहन्नमुंबई यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स की जनहित याचिका पर दिया है। एनबीए द्वारा दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि लॉकडाउन से समाचार उद्योग का कारोबार गंभीर आर्थिक संकट में है। समाचार उद्योग को आर्थिक संकट से उबारने के लिए सरकार ने अभी तक पैकेज या उपायों की घोषणा नहीं की, जबकि यह चरमराने के कगार पर पहुंच गया है।
पत्रकारों के संगठनों ने याचिका में आरोप लगाया था कि लॉकडाउन का हवाला देकर समाचार पत्रों के प्रबंधक पत्रकारों सहित अन्य कर्मचारियों को नौकरी से निकाल रहे हैं। मनमानी वेतन कटौती हो रही है। कर्मचारियों को अनिश्चितकाल के लिए बिना वेतन छुट्टी पर भेजा जा रहा है।
- विज्ञापनों में आई 90 फीसदी की कमी
आईएनएस ने अपने हलफनामे में कहा, विभिन्न उद्योगों के अनुमान के अनुसार, डीएवीपी पर विज्ञापनों का 1500 से 1800 करोड़ रुपए बकाया है। इसमें से 800 से 900 करोड़ प्रिंट मीडिया का है। इतनी बड़ी राशि कई महीनों से बकाया है और निकट भविष्य में भुगतान की संभावना बहुत कम है। सरकारी विज्ञापनों में करीब 80 से 85 प्रतिशत की कमी हुई है। लॉकडाउन से अन्य विज्ञापनों में करीब 90 प्रतिशत की गिरावट आई है।
आईएनएस ने कहा, मीडिया और मनोरंजन उद्योग एफएमसीजी, ई-कामर्स, वित्तीय कंपनियों और आटोमोबाइल उद्योग जैसे दूसरे उद्योगों के विज्ञापनों पर खर्च होने वाली राशि पर चलता है। लॉकडाउन से यह बुरी तरह प्रभावित हुआ है। आईएनएस के अनुसार, विज्ञापनों में कमी से कई समाचार पत्र, पत्रिकाओं को प्रकाशन पन्नों की संख्या कम करनी पड़ी।
कुछ अखबारों को संस्करण बंद करने पड़े। इन संगठनों ने जनहित याचिका खारिज करने की गुहार करते हुए कहा, अनेक समाचार ब्रॉडकास्टर उसके सदस्य हैं और सभी निजी प्रतिष्ठान हैं। इसलिए इनके खिलाफ कोई रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती।