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सैनिकों पर सरकार-सुप्रीम कोर्ट आमने-सामने, केंद्र ने कहा, सुनवाई से पहले जवानों को हत्यारा कहना गलत
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Updated Sat, 29 Sep 2018 12:25 AM IST
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केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट का मणिपुर फर्जी मुठभेड़ मामले में आरोपी सैन्य अधिकारियों को ‘हत्यारा’ कहना नागवार गुजरा है। केंद्र ने कहा कि सुनवाई से पहले आरोपी जवानों को ‘हत्यारा’ कहने से गलत संदेश गया है। ऐसी टिप्पणियों से सेना का मनोबल गिरता है। शीर्ष अदालत की टिप्पणी से सेना में पक्षपात का अंदेशा पैदा हो गया है। ऐसे में न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और यूयू ललित की पीठ को मामले से अलग हो जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर फैसला सुरक्षित रख लिया है।
दरअसल, सीबीआई जस्टिस लोकुर की पीठ की निगरानी में मणिपुर फर्जी मुठभेड़ मामले की जांच कर रही है। 30 जुलाई, 2018 को पीठ ने धीमी जांच को लेकर सीबीआई निदेशक से सवाल-जवाब के दौरान टिप्पणी की थी कि ‘हत्यारे इंफाल की सड़कों पर घूम रहे हैं।’ केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा, ऐसी टिप्पणी से धारणा बन जाती है कि कोर्ट पक्षपात करेगा। लिहाजा, पीठ को मामला किसी दूसरी बेंच को भेज देना चाहिए।
वेणुगोपाल ने कहा कि सशस्त्र बल विपरीत परिस्थितियों में काम करते हैं। विद्रोहियों से अधिक जवान मारे जाते हैं। कोर्ट की टिप्पणी के कारण आरोपी सैन्य अधिकारियों को फांसी का फंदा सामने दिख रहा है। यहां जीवन-मरण का सवाल है। शीर्ष अदालत की टिप्पणी के बाद क्या कोई निचली अदालत मामले को अलग तरीके से देख सकती है।
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याची चाहे तो हम दे सकते हैं स्पष्टीकरण : पीठ
पीठ ने कहा कि टिप्पणी खास संदर्भ में की गई थी। अगर याची चाहें तो हम स्पष्टीकरण दे सकते हैं। इस पर वेणुगोपाल ने कहा, आरोपी सैन्य अधिकारियों में पीठ की ओर से पक्षपात की आशंका का डर पैदा हो गया है। लिहाजा, पीठ को मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए।
स्पष्टीकरण से दूर नहीं होगी आशंका : रोहतगी
कर्नल अमित कुमार समेत अन्य सैन्य अफसरों के वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि स्पष्टीकरण से पक्षपात की आशंका दूर नहीं होगी। अगर किसी टिप्पणी से निष्पक्ष सुनवाई नहीं होने की आशंका पैदा हो गई है तो पीठ को मामले से खुद को अलग कर लेना चाहिए।
मामले से अलग होने का नहीं बनता कारण
वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजालविस और न्यायमित्र मेनका गुरुमूर्ति ने कहा कि पीठ का मामले से अलग होने का कोई कारण नहीं बनता।
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दरअसल, सीबीआई जस्टिस लोकुर की पीठ की निगरानी में मणिपुर फर्जी मुठभेड़ मामले की जांच कर रही है। 30 जुलाई, 2018 को पीठ ने धीमी जांच को लेकर सीबीआई निदेशक से सवाल-जवाब के दौरान टिप्पणी की थी कि ‘हत्यारे इंफाल की सड़कों पर घूम रहे हैं।’ केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा, ऐसी टिप्पणी से धारणा बन जाती है कि कोर्ट पक्षपात करेगा। लिहाजा, पीठ को मामला किसी दूसरी बेंच को भेज देना चाहिए।
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वेणुगोपाल ने कहा कि सशस्त्र बल विपरीत परिस्थितियों में काम करते हैं। विद्रोहियों से अधिक जवान मारे जाते हैं। कोर्ट की टिप्पणी के कारण आरोपी सैन्य अधिकारियों को फांसी का फंदा सामने दिख रहा है। यहां जीवन-मरण का सवाल है। शीर्ष अदालत की टिप्पणी के बाद क्या कोई निचली अदालत मामले को अलग तरीके से देख सकती है।
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याची चाहे तो हम दे सकते हैं स्पष्टीकरण : पीठ
पीठ ने कहा कि टिप्पणी खास संदर्भ में की गई थी। अगर याची चाहें तो हम स्पष्टीकरण दे सकते हैं। इस पर वेणुगोपाल ने कहा, आरोपी सैन्य अधिकारियों में पीठ की ओर से पक्षपात की आशंका का डर पैदा हो गया है। लिहाजा, पीठ को मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए।
स्पष्टीकरण से दूर नहीं होगी आशंका : रोहतगी
कर्नल अमित कुमार समेत अन्य सैन्य अफसरों के वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि स्पष्टीकरण से पक्षपात की आशंका दूर नहीं होगी। अगर किसी टिप्पणी से निष्पक्ष सुनवाई नहीं होने की आशंका पैदा हो गई है तो पीठ को मामले से खुद को अलग कर लेना चाहिए।
मामले से अलग होने का नहीं बनता कारण
वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजालविस और न्यायमित्र मेनका गुरुमूर्ति ने कहा कि पीठ का मामले से अलग होने का कोई कारण नहीं बनता।