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सस्ते गैजेट और फास्ट टेक बने संकट!: मार्च 2026 तक देश में 14.14 लाख मीट्रिक टन ई-कचरा, पुनर्चक्रण में यूपी आगे
Tue, 20 Oct 2026 03:29 PM IST
डॉ. संजय पांडेय
अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क
Published by: डॉ. संजय पांडेय
Updated Tue, 20 Oct 2026 03:29 PM IST
सार
भारत में ई-कचरे की मात्रा लगातार बढ़ रही है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में मार्च तक देश में 14,14,645 मीट्रिक टन ई-कचरा दर्ज किया गया। इस दौरान उत्तर प्रदेश 3,76,896 मीट्रिक टन ई-कचरे के पुनर्चक्रण के साथ राज्यों में पहले स्थान पर रहा। सस्ते इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को जल्दी बदलने की प्रवृत्ति, सुरक्षित संग्रह केंद्रों की कमी और असुरक्षित निपटान पर्यावरण के लिए चुनौती बन रहे हैं।
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ई-कचरा
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
नई तकनीक और सस्ते इलेक्ट्रॉनिक सामान ने जिंदगी आसान बनाई है, लेकिन उपकरणों को जल्दी बदलने की आदत पर्यावरण के लिए नई चुनौती बन रही है। पुराने मोबाइल, लैपटॉप, बैटरी और घरेलू इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकलने वाला कचरा लगातार बढ़ रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान मार्च तक 14,14,645 मीट्रिक टन ई-कचरा दर्ज किया गया। इसे सुरक्षित तरीके से इकट्ठा करना और पुनर्चक्रित करना अब बड़ी जरूरत बन गया है।
इलेक्ट्रॉनिक कचरे की बढ़ती समस्या के बीच वेस्ट इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट (डब्ल्यूईईई) फोरम की ओर से सामने लाई गई फास्ट टेक की अवधारणा भी ध्यान खींचती है। इसका आशय ऐसे इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों से है, जिन्हें कम कीमत पर खरीदा जाता है और तकनीक या पसंद बदलने के कारण जल्द ही बदल दिया जाता है। सस्ते गैजेट और तेजी से बदलते मॉडल इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं।
सीपीसीबी के अनुसार देश में 2023-24 के दौरान 12,54,286 मीट्रिक टन ई-कचरा पैदा हुआ। 2024- 25 में यह बढ़कर 13,97,955 मीट्रिक टन हो गया। वहीं, 2025-26 के लिए मार्च 2026 तक उपलब्ध आंकड़ा 14,14,645 मीट्रिक टन है। यह अंतिम वार्षिक आंकड़ा नहीं, बल्कि मार्च तक दर्ज मात्रा है।मोबाइल फोन, लैपटॉप, टीवी, मिक्सर, एलईडी बल्ब, चार्जर और बैटरी जैसे उपकरण इस्तेमाल के लायक नहीं रहने पर ई-कचरा बन जाते हैं। इनमें तांबा, सोना और दूसरी उपयोगी धातुएं होती हैं, जिन्हें दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन कुछ उपकरणों में सीसा, पारा और अन्य हानिकारक पदार्थ भी मौजूद हो सकते हैं। इन्हें खुले में फेंकने, जलाने या असुरक्षित तरीके से तोड़ने पर मिट्टी, पानी और हवा प्रदूषित हो सकते हैं। इससे कचरे को संभालने वाले लोगों की सेहत पर भी खतरा पैदा होता है।
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पुनर्चक्रण में उत्तर प्रदेश सबसे आगे
उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में मार्च तक उत्तर प्रदेश में 3,76,896 मीट्रिक टन ई-कचरे का पुनर्चक्रण दर्ज किया गया। इस मामले में राज्य पहले स्थान पर रहा। तेलंगाना में 1,61,988 मीट्रिक टन और हरियाणा में 1,35,951 मीट्रिक टन ई-कचरे का पुनर्चक्रण दर्ज किया गया।वर्ष 2024-25 में देश में करीब 11.59 लाख मीट्रिक टन ई-कचरे का पुनर्चक्रण हुआ था, जबकि 2025-26 के लिए मार्च तक उपलब्ध आंकड़ा 9,79,080 मीट्रिक टन है। दोनों अवधियों की तुलना करते समय ध्यान रखना जरूरी है कि 2025-26 का आंकड़ा पूरे वित्त वर्ष का नहीं है। इसलिए इसे पुनर्चक्रण में सालाना गिरावट का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।ई-कचरे के बेहतर प्रबंधन के लिए अधिकृत संग्रह केंद्रों तक उपकरणों को पहुंचाना, प्रसंस्करण का सही रिकॉर्ड रखना और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को सुरक्षित व्यवस्था से जोड़ना जरूरी है। पुनर्चक्रण संयंत्रों की क्षमता और वास्तव में संसाधित कचरे की मात्रा भी अलग-अलग होती है।पुराने उपकरणों की मरम्मत कराकर दोबारा इस्तेमाल करना और खराब मोबाइल, बैटरी व दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामान अधिकृत संग्रह केंद्रों को सौंपना इस समस्या को कम करने में मदद कर सकता है। तकनीक का लाभ तभी टिकाऊ होगा, जब उसके कचरे का निपटान भी जिम्मेदारी से किया जाए।
ग्रामीण इलाकों में भी बढ़ रही चुनौती
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि गांवों में मोबाइल फोन, चार्जर, बैटरी, एलईडी बल्ब और दूसरे छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ने के साथ इनके खराब होने पर सुरक्षित निपटान का सवाल भी अहम हो गया है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकृत संग्रह केंद्रों तक पहुंच आसान नहीं होती। ऐसे में पुराने उपकरण घरों में पड़े रह सकते हैं या कबाड़ के अनौपचारिक कारोबार में पहुंच सकते हैं।ग्रामीण ई-कचरे की अलग से प्रमाणित मात्रा उपलब्ध न होने के कारण समस्या का सटीक आकार बताना मुश्किल है। पंचायतों और स्थानीय निकायों के सहयोग से संग्रह अभियान चलाने, लोगों को जागरूक करने और पुराने उपकरण अधिकृत केंद्रों तक पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है।
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इलेक्ट्रॉनिक कचरे की बढ़ती समस्या के बीच वेस्ट इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट (डब्ल्यूईईई) फोरम की ओर से सामने लाई गई फास्ट टेक की अवधारणा भी ध्यान खींचती है। इसका आशय ऐसे इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों से है, जिन्हें कम कीमत पर खरीदा जाता है और तकनीक या पसंद बदलने के कारण जल्द ही बदल दिया जाता है। सस्ते गैजेट और तेजी से बदलते मॉडल इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं।
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सीपीसीबी के अनुसार देश में 2023-24 के दौरान 12,54,286 मीट्रिक टन ई-कचरा पैदा हुआ। 2024- 25 में यह बढ़कर 13,97,955 मीट्रिक टन हो गया। वहीं, 2025-26 के लिए मार्च 2026 तक उपलब्ध आंकड़ा 14,14,645 मीट्रिक टन है। यह अंतिम वार्षिक आंकड़ा नहीं, बल्कि मार्च तक दर्ज मात्रा है।मोबाइल फोन, लैपटॉप, टीवी, मिक्सर, एलईडी बल्ब, चार्जर और बैटरी जैसे उपकरण इस्तेमाल के लायक नहीं रहने पर ई-कचरा बन जाते हैं। इनमें तांबा, सोना और दूसरी उपयोगी धातुएं होती हैं, जिन्हें दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन कुछ उपकरणों में सीसा, पारा और अन्य हानिकारक पदार्थ भी मौजूद हो सकते हैं। इन्हें खुले में फेंकने, जलाने या असुरक्षित तरीके से तोड़ने पर मिट्टी, पानी और हवा प्रदूषित हो सकते हैं। इससे कचरे को संभालने वाले लोगों की सेहत पर भी खतरा पैदा होता है।
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पुनर्चक्रण में उत्तर प्रदेश सबसे आगे
उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में मार्च तक उत्तर प्रदेश में 3,76,896 मीट्रिक टन ई-कचरे का पुनर्चक्रण दर्ज किया गया। इस मामले में राज्य पहले स्थान पर रहा। तेलंगाना में 1,61,988 मीट्रिक टन और हरियाणा में 1,35,951 मीट्रिक टन ई-कचरे का पुनर्चक्रण दर्ज किया गया।वर्ष 2024-25 में देश में करीब 11.59 लाख मीट्रिक टन ई-कचरे का पुनर्चक्रण हुआ था, जबकि 2025-26 के लिए मार्च तक उपलब्ध आंकड़ा 9,79,080 मीट्रिक टन है। दोनों अवधियों की तुलना करते समय ध्यान रखना जरूरी है कि 2025-26 का आंकड़ा पूरे वित्त वर्ष का नहीं है। इसलिए इसे पुनर्चक्रण में सालाना गिरावट का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।ई-कचरे के बेहतर प्रबंधन के लिए अधिकृत संग्रह केंद्रों तक उपकरणों को पहुंचाना, प्रसंस्करण का सही रिकॉर्ड रखना और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को सुरक्षित व्यवस्था से जोड़ना जरूरी है। पुनर्चक्रण संयंत्रों की क्षमता और वास्तव में संसाधित कचरे की मात्रा भी अलग-अलग होती है।पुराने उपकरणों की मरम्मत कराकर दोबारा इस्तेमाल करना और खराब मोबाइल, बैटरी व दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामान अधिकृत संग्रह केंद्रों को सौंपना इस समस्या को कम करने में मदद कर सकता है। तकनीक का लाभ तभी टिकाऊ होगा, जब उसके कचरे का निपटान भी जिम्मेदारी से किया जाए।
ग्रामीण इलाकों में भी बढ़ रही चुनौती
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि गांवों में मोबाइल फोन, चार्जर, बैटरी, एलईडी बल्ब और दूसरे छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ने के साथ इनके खराब होने पर सुरक्षित निपटान का सवाल भी अहम हो गया है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकृत संग्रह केंद्रों तक पहुंच आसान नहीं होती। ऐसे में पुराने उपकरण घरों में पड़े रह सकते हैं या कबाड़ के अनौपचारिक कारोबार में पहुंच सकते हैं।ग्रामीण ई-कचरे की अलग से प्रमाणित मात्रा उपलब्ध न होने के कारण समस्या का सटीक आकार बताना मुश्किल है। पंचायतों और स्थानीय निकायों के सहयोग से संग्रह अभियान चलाने, लोगों को जागरूक करने और पुराने उपकरण अधिकृत केंद्रों तक पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है।