नोटबंदी और जीएसटी के दोहरे आघात से आई बड़ी विपत्ति: मनमोहन सिंह
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नोटबंदी और जीएसटी के दोहरे आघात देश की अर्थव्यवस्था के लिए पूरी तरह विपत्ति साबित हुए हैं। इस भारी भूल से मोदी सरकार ने कोई सबक नहीं सीखा है। मैंने नोटबंदी की आलोचना में राज्यसभा में अपने भाषण में जो कुछ कहा था, आज उसे फिर दोहरा रहा हूं कि बेहद असावधानी के साथ उठाया गया यह कदम दरअसल एक संगठित लूट और वैधानिक डकैती है। सरकार का यह कदम अपने किसी भी उद्देश्य को हासिल नहीं कर पाया है। यह बेहद खराब तरीके से जल्दबाजी में उठाया गया कदम था।
दृढ़ विश्वास के साथ दिखाए गए साहस और करीने से अमल करने की क्षमता की तुलना अक्खड़पन और नाटकबाजी से नहीं की जा सकती है। यही वजह है कि नोटबंदी और उसके बाद लागू किए गए जीएसटी से व्यापारी वर्ग के अंदर टैक्स आतंकवाद काभय काफी गहरे तक समा गया है।
नोटबंदी से कर चोरी और काले धन की बुराइयों को दूर नहीं किया जा सकता है। कुल मिलाकर नोटबंदी राजनीतिक फसल काटने का एक उपाय बनकर रह गया है, जबकि काले धन के असली अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं। इसलिए मैं फिर से दोहराता हूं कि नोटबंदी संगठित लूट और कानूनी डकैती के अलावा और कुछ नहीं है।
अगर मोदी को प्रेरणा ही लेनी थी तो उन्हें दुनिया भर में मशहूर गुजरात के दो महान सपूतों महात्मा गांधी और सरदार बल्लभ भाई पटेल से लेनी चाहिए थी। क्या प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के फैसले पर रिजर्व बैंक को अमल करने का आदेश देने से पहले महात्मा गांधी को याद किया था? अगर उन्हें महात्मा गांधी याद आए होते तो देश के गरीबों को वो दुख नहीं झेलने पड़ते, तो उसे नोटबंदी के कारण सहने पड़े।
जनता को अच्छा शासन देने के लिए दिल के साथ दिमाग की भी जरूरत होती है लेकिन मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि केंद्र सरकार न तो दिल से काम कर रही है और न ही दिमाग से। एक बार ठहरकर सोचिए कि नोटबंदी और जीएसटी के कारण अर्थव्यवस्था को जो नुकसान हुआ उसकी कीमत किसे चुकानी पड़ी है।
जाहिर है कि जिनकी नौकरियां गई, जिनकी फैक्ट्रियों में ताले पड़े, जिन उद्यमियों की परियोजना शुरू होने से पहले ही बंद हो गईं, वही इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। इसी तरह जीएसटी को लागू करने से पहले प्रधानमंत्री को सरदार पटेल को याद करना चाहिए था।
आजादी के बाद देश के एकीकरण की योजना पर अमल करने से पहले पटेल ने छोटी से छोटी बात का ख्याल रखा था, लेकिन मोदी ने तो इसे इतनी जल्दबाजी में लागू किया कि इसके सिर्फ बुरे परिणाम सामने आ रहे हैं।
सबसे ज्यादा दुखद तो यह है कि इस सरकार ने कोई सबक नहीं सीखा। नोटबंदी के कारण बेहाल हुए गरीबों, किसानों, व्यापारियों और छोटे एवं मझोले उद्यमियों को राहत देने के बजाय जीएसटी को लागू कर दिया गया।
नोटबंदी के बाद मैंने राज्यसभा में सरकार से अनुरोध किया था कि इसकी वजह से प्रभावित लोगों को राहत देने के उपाय किए जाएं, लेकिन सरकार ने एक नहीं सुनी और राहत देने के बजाय जीएसटी के रूप में उन्हें एक नई आफत दे दी।
मोदी सरकार की बुलेट ट्रेन परियोजना व्यर्थ की कसरत साबित होगी। इससे न तो साढ़े छह करोड़ गुजरातियों को फायदा होगा और न ही इस देश को। गुजराती उद्यमी बखूबी जानते हैं कि अगर कोई सौदा इतना अच्छा है कि उस पर यकीन न हो, तो समझ जाइए कि उससे कोई फायदा नहीं होने वाला है।
बुलेट ट्रेन की परियोजना में हाथ डालने के बजाय सरकार को मौजूदा रेल नेटवर्क को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए था। बुलेट ट्रेन के लिए जापान से रियायती दर पर मिलने वाले 88 हजार करोड़ रुपये अभी भले ही बहुत सस्ता लग रहा हो लेकिन इसे चुकाना भी पड़ेगा।
किसानों की आमदनी को 2022 तक दोगुना करने का मोदी सरकार का वादा महज जुमला साबित होने जा रहा है। अगले पांच साल में इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कृषि क्षेत्र को सालाना 10 फीसदी की वृद्धि दर हासिल करनी होगी। मोदी सरकार के पहले तीन साल में इस क्षेत्र की औसत वृद्धि दर 1.8 फीसदी रही है, जबकि यूपीए के 10 साल के शासनकाल में यह दर 3.7 फीसदी रही थी।
यही नहीं, मोदी ने दावा किया है कि अगले पांच साल में भारत विकसित देश बन जाएगा। अगर वे ऐसा कर पाते हैं तो इस संसार में मुझसे ज्यादा खुश कोई नहीं होगा। लेकिन क्या यह हकीकत बन सकता है? मुझे नहीं लगता है कि यह संभव है क्योंकि विकसित देशों में सबसे गरीब ग्रीस की प्रति व्यक्ति आय 25 हजार डॉलर है जबकि भारत की प्रति व्यक्ति आय 5000 डॉलर है।
अगले पांच साल में इसमें पांच गुनी वृद्धि के लिए 35 फीसदी की आर्थिक विकास दर हासिल करनी होगी। अब तक कोई देश ऐसा नहीं कर पाया है। क्या मोदी ऐसा कर पाएंगे?