हवाई चप्पल और मर्सिडीज गाड़ी पर समान टैक्स नहीं लगा सकते -अरुण जेटली
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एक जुलाई 2017 से जीएसटी अधिनियम लागू हो गया है। यानी एक देश, एक कर। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अमर उजाला के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री और विशेष संवाददाता शशिधर पाठक से इसके विभिन्न आयामों पर विशेष बातचीत की है। प्रस्तुत है बातचीत के अंश-
1- जीएसटी लागू होने से पहले ही विपक्ष ने इसे लागू करने तथा संसद के केंद्रीय कक्ष मेंं इसके आयोजन को लेकर सवाल उठाते हुए समारोह के बहिष्कार तक का ऐलान कर दिया?
इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता। मेरा मानना है कि हर राजनीतिक दल को जीएसटी को लेकर एक स्थिति पर कायम रहना चाहिए। वह चाहे जीएसटी के समर्थन में हों या विरोध में। इस बारे में केवल इतना कह सकते हैं कि जीएसटी को लेकर कोई ऐसा निर्णय नहीं है, जिसमें आम सहमति बनाने का प्रयास न हुआ हो। यहां तक की टैक्स की दर तय करने में भी सर्वसम्मति को प्रमुखता दी गई। फिर भी यदि किसी राजनीतिक दल को ऐतराज हो तो उनकी राज्य सरकारों को चाहिए कि वह स्टेट जीएसटी(एसजीएसटी) का अपना हिस्सा वापस कर दें।
2- विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने जीएसटी को लेकर हड़बड़ी और जल्दबाजी की है?
विपक्ष के आरोप पर कोई टिप्पणी नहीं करुंगा। इस बारे में केवल इतना जानता हूं कि पूरे देश में एक साझा व्यवस्था लागू होने जा रही है। इसके लिए हर स्तर पर राय ली गई है। संविधान संशोधन के समय भी विपक्षी दलों से राय ली गई थी। कांग्रेस पार्टी के सुझाव को इसमें शामिल किया गया था। जीएसटी का बिल सर्वसम्मति से पारित हुआ और सभी राजनीतिक दलों की राज्य सरकारों ने इस पर सहमति दी है।
3- लेकिन कहा जा रहा है कि अभी जीएसटी को लेकर सबसे जरूरी ई वे बिल को लेकर तैयारी पूरी नहीं हुई है , ऐसे में क्या इसे लागू करने में कठिनाईयां नहीं खड़ी होंगी?
इस तरह की कोई बात नहीं है। जीएसटी लागू करने के लिए केन्द्र सरकार पूरी तरह से तैयार है। ई वे बिल की भी तैयारी पूरी है ।आज लोग धड़ाधड़ जीएसटी के लिए पंजीकरण करा रहे हैं। 65-70 लाख लोगों ने पंजीकरण करा लिया है। पहले 80 लाख लोग पंजीकृत थे। इसलिए इस तरह की बातें कहना ठीक नहीं है। ऐसा कहा जाना आपत्तिजनक है।
4- जीएसटी को लेकर सरकार की तकनीकी तैयारी कितनी पूरी है जबकि जीएसटी के लिए आई टी सॉल्यूशन्स देने वाली कंपनियों (जीएसटी सुविधा प्रोवाइडर्स) का कहना है कि उन्हें सॉफ्टवेयर विकसित करने के लिए कम समय दिया गया है। उन्हें कुछ और समय चाहिए। तब ऐसी जल्दबाजी क्यों, जबकि यह इस प्रणाली की सबसे अहम कड़ी है।
इस मामले में मुझे कंपनियों के रुख से कुछ निराशा हुई कि आमतौर पर किसी भी आर्थिक सुधार को लेकर निजी क्षेत्र सरकार से भी आगे रहता है और जल्दी के पक्ष में होता है। लेकिन इस मामले में सरकार निजी क्षेत्र से आगे है।
5- कपड़ा व्यापारी जीएसटी का विरोध कर रहे हैं। फुटकर विक्रेताओंं और छोटे कारोबारियों, व्यापारियों में भी इसको लेकर निराशा का माहौल है?
जबकि देश के व्यापार में 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी फुटकर और छोटे विक्रेताओं की है। यह कहना कि अब तक हमने टैक्स नहीं दिया है तो आगे भी नहीं देंगे, उचित नहीं है। टैक्स न देना किसी का संविधान प्रदत्त मूलभूत अधिकार नहीं है। रहा सवाल छोटे कारोबारियों, व्यवसायियों का तो उन्हें डरने की जरूरत नहीं है। जीएसटी की प्रणाली में सभी का ध्यान रखा गया है। गली-मोहल्ले के छोटे कारोबारियों, व्यवसायियों के प्रति सरकार संवेदनशील है। जिनका सालाना टर्न ओवर 20 लाख रुपये तक का है, उन्हें किसी तरह का टैक्स नहीं देना है। उनके लिए पंजीकरण कराना भी जरूरी रही है। जिनका टर्न 20 लाख रूपये से ज्यादा और 75 लाख रुपये तक है उनके लिए दो व्यवस्था है। पहली तो यह कि यदि ट्रेडिंग से जुड़ा कारोबार है तो उन्हें एक प्रतिशत का कर चुकाना होगा और यदि उत्पादन क्षेत्र से हैं तो दो प्रतिशत। रहा सवा 75 लाख से ऊपर और डेढ़ करोड़ रुपये के टर्न ओवर वाले या इससे बड़े कारोबारियों का तो वे रिटर्न फाइल करते ही हैं।
6- लेकिन जिस तरह से व्यापारी और कारोबारी विरोध कर रहे हैं, क्या सरकार को उसके राजनीतिक नुकसान की फिक्र नहीं है?
देखिए शुरु में हर बदलाव और नई व्यवस्था का विरोध होता है। हमें इसकी बहुत ज्यादा परवाह नहीं है। फिर जीएसटी परिषद निर्वाचित प्रतिनिधियों की संस्था है। जिसको भी कोई एतराज या समस्या है वह उसमें अपनी आपत्ति दर्ज करा सकता है। जीएसटी परिषद उसे देखेगी और मेरिट केआधार पर उसका निवारण करेगी। लेकिन अगर किसी को लगता है कि उसने अभी तक टैक्स नहीं दिया है तो अब यह चलने वाला नहीं है। कर चोरी देश के प्रति अपराध है और अब सरकार इसे सहन नहीं करेगी।
7- कुछ अर्थशास्त्रियों और राजनीतिक दलों का मानना है कि जीएसटी की 0, 5, 12, 18 या 28 प्रतिशत की दरों की बजाय एक दर होनी चाहिए थी?
यदि यह न करते तो देश के उपभोक्ताओं के साथ बड़ा अन्याय हो जाता। कॉलम लिखने वाले अर्थशास्त्रियों का क्या, उन्हें कोई देश थोड़े चलाना है। इस देश में गरीब से गरीब भी रहता है। हम मर्सिडीज गाड़ी और हवाई चप्पल पर एक समान टैक्स नहीं लगा सकते। जबकि हवाई चप्पल गरीब भी पहनता है और अमीर भी। आप बताइए, क्या खाद्यान्न पर 15 प्रतिशत का टैक्स लगाएं? इसे गरीब भी खाता है। इसलिए आपको देखना पड़ेगा कि किसका उपयोग कौन करता है। एक बड़े राजनीतिक दल ने भी कहा था कि 18 प्रतिशत कम पर एक टैक्स की दर तय कर दीजिए, लेकिन यह सही नहीं है। इसलिए हमने दो सिद्धांतों पर काम किया। पहला यह कि आज आप जिसपर जितना टैक्स दे रहे हैं उसके आस-पास के स्लैब में वस्तुओं को रखा जाए। इससे मंहगाई नियंत्रण में रहेगी। दूसरा देश के राजस्व और खजाने पर पर भी असर न पडऩे पाए। घाटा न हो।
8- लेकिन पेट्रोल डीजल, रसोई गैस और शराब को इस क्रांतिकारी कर सुधार जीएसटी के दायरे से क्यों बाहर रखा गया है ?
जबकि इन पर करों की दरें 50 फीसदी से भी ज्यादा हैं। अगर इन्हें भी जीएसटी में लाया जाता कर 28 फीसदी होने का लाभ सीधे सीधे उपभोक्ताओं को मिलता। देर सबेर पेट्रोलियम उत्पादों और एक्साईज को भी जीएसटी के दायरे में लाना ही पड़ेगा। अभी राज्यों के रुख को देखते हुए जीएसटी परिषद ने इन्हें बाहर रखने की सिफारिश की है। यह जीएसटी काऊंसिल और लागू होने वाली प्रणाली की सफलता पर निर्भर करेगा। हम तो चाहते हैं कि एक दिन पेट्रोलियम उत्पाद और शराब को भी जीएसटी के दायरे में लाया जाए। जैसे-जैसे जीएसटी कारगर होता जाएगा, इसकी संभावना बढ़ेगी।
9- हालाकि करों में कमी होने पर मुनाफाखोरी रोकने के उपाय और शिकायत होने पर कड़ी सजा का प्रावधान जीएसटी में किया गया है। लेकिन मुनाफाखोरों की पहचान कैसे होगी और नियमों व प्रणाली की जानकारी न होने पर कहा यह जा रहा है कि जीएसटी से इंस्पेक्टर राज बढ़ेगा जिससे आने वाले समय में भ्रष्टाचार भी बढ़ेगा और कारोबारी तंग होगे?
यह तो बिल्कुल उल्टी बात हो गई। जब तकनीक पर आधारित समान कर प्रणाली लागू होने जा रही है तो इसमें इंस्पेक्टर राज तो कम होगा। क्योंकि सॉफ्टवेयर टैक्स प्रणाली से जुड़े लोगों का स्थान ले लेगी। नई व्यवस्था तो सरल और आसान है। देश के कारोबारियों, व्यापारियों को चाहिए वह जीएसटी पंजीकरण कराकर सॉफ्टवेयर से जीएसटीएन नंबर ले लें। इसके बाद उन्हें हर महीने की दस तारीख को उन्हें बस एक बार अपनी बिक्री या खरीद का ब्यौरा देना है। यदि बिजनेस-बिजनेस हाऊस काम करते हैं तो किसे बेचा, किससे खरीदा उसका जीएसटीएन नंबर देना है। बाकी मिलान आदि का काम जीएसटी सॉफ्टवेयर खुद करता जाएगा। यदि आडिट में कोई गंभीर आपत्ति नहीं हुई तो कोई दिक्कत नहीं आएगी। यह कंप्यूटर गणना आधारित प्रणाली पर काम करेगा। जैसे देश के नागरिक आयकर रिटर्न फाइल करते हैं और रिटर्न भी उनके पास स्वत: आ जाता है। इसलिए जीएसटी को लेकर कारोबारियों, व्यापारियों को डरने की जरूरत नहीं है।
10- पूरी दुनिया की निगाह भारत के जीएसटी की प्रणाली पर है। आप किस तरह से मानते हैं कि भारत आर्थिक सुधार की सही दिशा में आगे बढ़ रहा है?
देखिए पूरी दुनिया में आर्थिक सुधार को लेकर बदलाव आया है। इसे लेकर एक तरफ अर्थव्यवस्था में वृद्धि का स्तर है तो वहीं बड़े-बड़ेे देश खुद को बचाने के लिए सुरक्षात्मक हो रहे हैं। ऐसे में अर्थव्यवस्था में सुधार की क्षमता घट रही है। अमेरिका, यूरोप में यही पैटर्न दिखाई दे रहा है। वहीं विश्व के देश मान रहे हैं कि भारत ने संरचनात्मक सुधार की क्षमता दिखाई है। आर्थिक मंदी के दौर में 7-8 प्रतिशत की वृद्धि दर को बनाए रखा है। एफडीआई में सुधार करने के बाद सबसे अधिक पूंजी निवेश भारत में हुआ है। सरकार ने बड़े उद्योगों के दिवालिया होने के चलन पर लगाम कसने के लिए इंसाल्वेंसी आध्यादेश को लागू किया है। विमुद्रीकरण के कदम उठाए और अर्थिक मामलों में कड़ा निर्णय लेने हम से नहीं हिचके हैं।
11- जीएसटी लागू होने के बाद कहा जा रहा है कि इसकी देश की आर्थिक वृद्धि दर पर भी असर पडेगा? जीडीपी प्रभावित होगी?
मैं अर्थशास्त्रियों की कयासबाजी या उनकी भविष्यवाणी पर यकीन नहीं करता। मुझे किसी अर्थशास्त्री ने यह नहीं बताया था कि कच्चे तेल के दाम 40 डॉलर तक आ जाएंगे। लोग विमुद्रीकरण को लेकर भी अर्थ व्यवस्था पर नकारात्मक असर की बात कर रहे थे। कोई यह नहीं कह रहा था वृद्धिदर सात प्रतिशत को पार कर पाएगी। इसलिए इस तरह के नंबर गेम पर यकीन नहीं करता। हम चाहते हैं कि देश में एक प्रभावी अर्थ व्यवस्था लागू हो, भ्रष्टाचार, कालाधन पर लगे, राजनीतिक भ्रष्टाचार कम हो। मुझे विश्वास है जीएसटी लांग टर्म में इसमें सहायक होगी। कर दाताओं का दायरा बढ़ेगा, अधिक लोग टैक्स देंगे और जब राजस्व का संग्रह बढ़ेगा तो कर दाताओं के ऊपर आने बोझ भी आगे चल कर कम होगा। टैक्स(कर) की दर में कमी आएगी। कुल मिलाकर साफ है कि पुरानी व्यवस्था की तरह कच्चे में इतना और पक्के में इतना अब नहीं चलने वाला है। जब पक्के में लेन-देन होगा तो कच्चा अपने आप खत्म होने लगेगा। इसका असर आयकर जैसे प्रत्यक्ष कर पर भी पड़ेगा। लोगों को राहत मिलेगी।
12- आम तौर पर टैक्स की दरें कम होने पर भी व्यापारी वस्तु का दाम कम नहीं करते जबकि टैक्स बढ़ते ही दाम बढ़ जाते हैं। क्या जीएसटी लागू होने से जिन वस्तुओं पर टैक्स बढ़ेगा उनकी महंगाई नहीं बढ़ेगी?
जीएसटी में पूरा संतुलन बनाने का प्रयास किया गया है। अगर कुछ वस्तुओंं पर कर की दरें बढ़ेंगी तो कई वस्तुओं पर घटेंगी भी। इसलिए बाजार में पूरा संतुलन रहेगा और औसतन उपभोक्ता पर महंगाई का असर नहींं पडेगा।
13- यह आशंका कहां तक सही है कि जीएसटी के बाद बिजली पानी और दूरसंचार सेवाएं महंगी हो जाएंगी?
यह आशंका गलत है कि जीएसटी लागू होने से महंगाई बढ़ेगी। दूरसंचार, बिजली और पानी सेवाओं पर कोई बहुत ज्यादा असर नहीं पडेगा।
14- आम आदमी की भाषा में पूछे तो जीएसटी लागू होने के बाद गांव, गरीब और किसान को क्या फायदा होगा?
देखिए जीएसटी लागू करने का कदम देश की समग्र अर्थ व्यवस्था से जुड़ा है। मौजूदा समय में देश में 23 उपकर, 17 अप्रत्यक्ष कर लगते हैं। अप्रत्यक्ष करों में एक्साइज, सेवा और वैट तीन प्रमुख कर हैं। ये सभी कर समाप्त हो जाएंगे और इन 40 करों की जगह सिर्फ जीएसटी लगेगा। उपभोक्ता को कर के ऊपर कर नहीं देना पड़ेगा। इससे कर की प्रणाली सरल हो जाएगी। अभी तक हर राज्य का कर को लेकर अपना-अपना कानून था। एक राज्य से दूसरे में सामान जाने पर पथकर समेत अन्य से गुजरना पड़ता था। हर नाके पर रोक टोक होती थी। बड़ी जटिल व्यवस्था थी। इसके चलते 1 प्रतिशत से भी कम लोग टैक्स देते थे। देश के 78 लाख लोग ही ऐसे थे जिन्होंने अपनी आमदनी पांच लाख से ऊपर दिखाई थी। आने वाले समय में यह नहीं होगी। इससे भ्रष्टाचार आदि की गुंजाइश कम होगी। इससे कर दाताओं का दायरा बढ़ेगा। नई प्रणाली से कर का दायरा बढ़ेगा, कर की चोरी रुकेगी। सरकार की आयक बढ़ेगी। यदि सरकार के पास साधन बढ़ेंगे तो इस पर पहला हक गरीब का होगा। सरकार आसानी से बिजली, पानी, शौचालय, गरीबों के घर निर्माण, स्कूल, सड़क और अन्य संसाधनों के विकास को बढ़ावा दे सकेगी। राज्य सरकारों की भी क्षमता बढ़ेगी।
15- जीएसटी को देश के संघीय ढांचे पर प्रहार माना जा रहा था। इसको लेकर राज्यों में भी भय था। यह एक बड़ी चुनौती थी।?
हमने जीएसटी को लागू कराने में मतदान नहीं आम सहमति को वरीयता दी है। आगे बी चाहेंगे कि इस तरह परंपरा सुचारु रूप से जारी रहे। पहले हर राज्य तैयार नहीं हो रहे थे लेकिन अब उन्हें महसूस हो रहा है कि यह सरकार और उपभोक्ता दोनों को इसका लाभ मिलेगा। व्यवसाय में तेजी आएगी और रोजगार के अवसर पैदा होंगे। मुझे लगता है कि इस क्रम में राज्यों को जीएसटी लागू होने के बाद पांच साल उन्हें होने वाले घाटे की भरपाई केन्द्र सरकार द्वारा किए जाने का भरोसा रहा। राजस्व के साथ-साथ केन्द्र ने 14 प्रतिशत के निश्चित ग्रोथ की गारंटी भी दी। जबकि 2011 के संविधान संशोधन में ऐसा प्रावधान नहीं था। इसी तरह से केन्द्र सरकार ने राज्यों की स्थिति को समझते हुए राजनीतिक दलों के साथ भी संवाद बनाया। जीएसटी को सर्वसम्मति से संसद की मंजूरी मिली। इसलिए जीएसटी को लेकर जीएसटी काऊंसिल के भीतर कोई राजनीति नहीं हुई। इसको लेकर जो भी राजनीति हुई है, वह जीएसटी काऊंसिल के बाहर हुई है। वहां किसी भी राजनीतिक दल ने कोई विरोध नहीं किया और तर्क के आधार पर निर्णय लिए गए।
16- व्यापारियों का कहना है कि उन्हें कंप्यूटर चलाने का ज्ञान नहीं है जबकि जीएसटी में उन्हें हर महीने अपने रिटर्न कंप्यूटर से ही भरने होंगे और रिकार्ड भी उसमें ही रखना होगा?
जीएसटी रिटर्न के लिए कम्प्यूटर का मामूली ज्ञान ही पर्याप्त है। जिस तरह मोबाइल फोन चलाया जाता है उतनी ही जानकारी से जीएसटी का काम हो जाएगा। इसमें कोई कम्पूयटर विशेज्ञता की जरूरत नहींं है।
17- जीएसटी लागू होने से जो अफरा तफरी मचेगी, उससे निबटने केलिए सरकार की क्या तैयारी है?
कोई बड़ी अफरा तफरी नहीं मचने वाली। आशंका और प्रचार ज्यादा है। नई प्रणाली है इसलिए समझने में थोड़ा वक्त लग सकता है इसलिए शुरुआत में रिटर्न फाइल करने में दो से तीन महीने की छूट दी गई है। धीरे धीरे व्यापारी खुद इसके साथ तालमेल बिठा लेंगे और सब कुछ सामान्य हो जाएगा।
18- वैसे आपके हिसाब से जीएसटी के नतीजे कब तक सामने आने की उम्मीद है?
एक जुलाई से जीएसटी प्रणाली प्रभावी हो जाएगी। अभी पंजीकरण होंगे। फिर सितंबर 2017 तक रिटर्न फाइल होंगे। तब जाकर इस प्रणाली केप्रभाव और परिणामों का अंदाज लगेगा। फिलहाल तो सरकार का पूरा ध्यान इस नई कर प्रणाली को सुचारु रूप से लागू करवाने पर है और जो समस्याएं आएं उनका निदान करने की पूरी कोशिश की जाएगी।