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नेताओं को दंगों की फसल काटने से रोकेंगे किसान 

Thu, 30 Jun 2016 08:44 PM IST
ज़ुबैर अहमद/ बीबीसी संवाददाता
ज़ुबैर अहमद/ बीबीसी संवाददाता Updated Thu, 30 Jun 2016 08:44 PM IST
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Farmers to stop leaders from taking advantage in Kairana
बच्चों के साथ किसान

पश्चिमी उतर प्रदेश के कृषि प्रधान समाज में हिन्दू-मुस्लिम तनाव बढ़ रहा है लेकिन कुछ लोग उसे घटाने की भी पुरजोर कोशिशें कर रहे हैं। ये इलाका तीन साल पहले हुए दंगों से अभी पूरी तरह से उभर नहीं सका है। अब कैराना से हिन्दुओं के कथित पलायन की खबरों ने यहां एक बार फिर से तनाव पैदा कर दिया है।

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इस तनाव को खत्म करने में कई बुज़ुर्ग किसान और खाप एकजुट हो गए हैं।  खास तौर से भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) इसमें आगे है। बीकेयू के संस्थापक महिंदर सिंह टिकैत के बेटे राकेश टिकैत कहते हैं कि दोनों तरफ के किसानों को एक प्लेटफॉर्म पर लाने की उनकी कोशिशें रोज हो रही हैं। 
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वो कहते हैं, "हिन्दू पलायन हुआ है लेकिन नौकरियों के लिए।  मैं भी सिसौली से पलायन करके मुजफ्फरनगर आकर बस गया हूँ।  इसे चुनाव का मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है।  हमारी कोशिश है कि हम ऐसा न होने दें।  चुनाव असल मुद्दों के आधार पर होना चाहिए"।

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बीकेयू एक प्लेटफॉर्म हिन्दू और मुस्लिम किसानों के उठाती है मुद्दे

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क‌िसान

बीकेयू हिन्दू और मुस्लिम किसानों को एक प्लेटफॉर्म पर लाकर किसानों के मुद्दों को उठाने का दावा करती है। राकेश टिकैत के अनुसार चीनी मिलों के मालिकों ने जनवरी से गन्ना सप्लाई करने वाले किसानों को पैसे नहीं दिए हैं।  बीकेयू इस मुद्दे को लेकर धरने दे रही है एक समय था जब बीकेयू हिन्दू और मुसलमान किसानों का एक मजबूत संगठन था।  

लेकिन 2013 में हुए दंगों के बाद उसकी छवि तो खराब हुई, साथ ही हिंदू-मुस्लिम एकता पर भी असर पड़ा।  मुसलमानों ने महसूस किया कि बीकेयू उन्हें सुरक्षा देने में नाकाम रहा। शामली के किसान रफी हसन कहते हैं वो दंगों के बाद बीकेयू से निकल गए थे।  रफी हसन बीकेयू पर आरोप लगाते हैं, "उन्होंने दंगों में मुसलमानों की मदद नहीं की।  

कुछ बवाल करने वालों के साथ भी दिखे। " मुसलमानों ने किसानों की अपनी एक अलग पार्टी बनाई और कहा कि इसमें सभी समुदाय के लोग शामिल हो सकते हैं। समय के साथ बीकेयू के प्रति मुसलमानों का गुस्सा कम हुआ है।  राकेश टिकैत कहते हैं, "बीकेयू ने पिछले तीन साल में 81 एकड़ जमीन किसानों को दिलाई। इनमें 80 फीसद मुसलमान थे। " लेकिन ऐसा लगता है कि पिछले तीन सालों में बीकेयू ने मुसलमान किसानों का विश्वास दोबारा हासिल कर लिया है।  

रफी हसन भी इससे दोबारा जुड़ गए हैं बीकेयू का पिछले तीन साल का ये सफर कठिन था।  लेकिन राकेश टिकैत कहते हैं कि मुसलमानो की गलतफहमियां दंगों के बाद से ही दूर होना शुरू हो गई थीं। इसका एक उदाहरण मुजफ्फरनगर जिले के शोरम गांव में देखने को मिला।  इस गांव में जाट और मुस्लिम मोहल्ले अलग-अलग हैं।  लेकिन यहां दोनों समुदायों के किसानों के दिल मिले हुए हैं। इस गांव की करीब 16 हजार की आबादी में एक तिहाई संख्या मुसलमानों की है। दोनों समुदायों में किसानों की संख्या अधिक है। 

2013 के दंगों में बाहर के लोगों ने किया हमला

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‌क‌िसान

यहां के लोगों ने कहा कि 2013 के दंगों में बाहर के लोग गांव पर भी हमला करने आए।  लेकिन यहां की हिन्दू-मुस्लिम एकता ने दंगाइयों को भगा दिया। इस एकता को बनाए रखने में बीकेयू के कई किसान शामिल थे।  कैराना से हिन्दुओं के पलायन की खबर का यहां कोई असर नहीं हुआ।

मैं गांव के मुस्लिम मोहल्ले में पहले गया।  वहां लोगों से बातें कर रहा था।  मुझे लगा यहां मौजूद सभी लोग मुस्लिम हैं।  लेकिन अचानक मुझे एक बुज़ुर्ग से मिलाया गया जो मुस्लिम नहीं थे, जैसा कि मैं समझ रहा था, बल्कि वो एक जाट किसान थे। मैं उन्हें मुसलमानों के बीच आराम से बातें करते देखकर हैरान था।  

रतन सिंह मेरी हैरानी पर हैरान थे।  बड़े प्यार से मुस्कुराते हुए वो बोले, "ऐसे क्या देख रहे हो? यहां हम पुश्तों से ऐसे ही आपस में मिलजुल कर रहते आए हैं। "मैं उनसे पूछने जा रहा था कि अगर ऐसा है तो अलग-अलग मोहल्लों में क्यों रहते हो? वो मेरे सवाल को ताड़ गए।  वो बोले, "मोहल्ले अलग हैं, घर अलग हैं लेकिन दिल तो एक है। '' उन्होंने गांव की सड़क की तरफ इशारा करते हुए कहा, "वो देखो, ये जो सड़क आप देख रहे हो दोनों मोहल्लों को इसी सड़क से जाना पड़ता है। "

तो फिर 2013 में मुजफ्फरनगर के गावों में हिन्दू-मुस्लिम दंगे क्यों हुए? मेरे इस सवाल पर रतन सिंह के मित्र अली हसन ने कहा, "दंगे हुए लेकिन इस गांव में नहीं।  तनाव जरूर पैदा हो गया था।  गांव पर हमला करने वाले बाहर से आए थे लेकिन दोनों समुदायों की एक बैठक हुई जिसमें इस बात पर सहमति बनी कि दूसरे गांव की परवाह न करो, अपने गांव में दंगे न होने दो। " ये बैठक बीकेयू से जुड़े किसानों ने ही कराई थी। 

'झगड़ा नहीं होता अगर 2013 में भाजपा के लोग सक्रिय न होते'

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मुस्लिम-हिंदू मित्र

रतन सिंह और उनके मुस्लिम मित्र अली हसन बीकेयू से जुड़े हुए हैं इसके बाद मैं जाटों के मोहल्ले में गया।  एक घर के बाहर दोपहर की कड़ी धूप के बावजूद चारपाइयों पर कई किसान बैठे थे।  दिल्ली में बैठ कर लगता है कि एक मुस्लिम के लिए जाटों या हिन्दुओं के मोहल्ले में जाना खतरे से खाली नहीं है। लेकिन मेरा इस इलाके में सभी ने स्वागत किया। बुज़ुर्ग किसान फेरू सिंह भारतीय जनता पार्टी पर 2013 के दंगों का इल्जाम लगाते हैं।  

वो कहते हैं, "ये झगड़ा नहीं होता अगर 2013 में भाजपा के लोग सक्रिय न होते। " उनके मुताबिक नौजवान पीढ़ी बहकावे में आ गई। वहां मौजूद सभी किसान बीकेयू से जुड़े थे।  उनका कहना था कि उनकी संस्था (बीकेयू) साम्प्रदायिक तत्वों के खिलाफ पूरे जोश के साथ लड़ रही है।

शोरम की तरह मुजफ्फरनगर के कई गांवों में सांप्रदायिक सदभावना महसूस की जा सकती है। काफी हद तक इसका श्रेय रतन सिंह और फेरू सिंह जैसे बुज़ुर्ग किसानों और भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) को जाता है। राकेश टिकैत कहते हैं कि दंगों के बाद उनकी संस्था ने कई सभाएं कराईं, जहां किसान की पहचान और एकता पर जोर दिया गया। वो कहते हैं, "जातिवाद और राजनीति से हम दूर रहना चाहते हैं। " बीकेयू ने अब तक हिंदू और मुस्लिम किसानों के सैकड़ों झगड़ों को रफा-दफा कराया है।

टिकैत कहते हैं कि बीकेयू दोनों समुदायों को जोड़ने में काफी हद तक कामयाब रही है। राकेश टिकैत पूरे आत्मविश्वास के साथ कहते हैं कि अब अगले 50 सालों में भी दंगें नहीं होंगे।  हम नहीं होने देंगें। टिकैत के मुताबिक दोनों समुदायों में जो लोग गिरफ्तार हुए उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि उन्हें दंगों के बाद कोई पूछने नहीं आया। उन्होंने बताया, "हम दोनों समुदायों के अभियुक्तों से जेल में मिले।  वो वहां भी एक साथ ही थे।  झगड़ों के बावजूद जेल में भी वो अलग नहीं हो सके। "

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