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किसान आंदोलन: पकड़ मजबूत करने के लिए 'सोशल इंजीनियरिंग' का सहारा, 'दो धारी' तलवार पर टिक पाएगा ये गठजोड़!

Wed, 24 Feb 2021 04:46 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 24 Feb 2021 04:46 PM IST
सार

भाकियू प्रधान गुरनाम सिंह चढूनी ने तो साफतौर पर कह दिया है कि दलित अपने घर में चौ. छोटूराम की तस्वीर लगाएं और किसान यानी जाट अपने घरों में डॉ. बीआर अंबेडकर का फोटो लगा लें। इससे चारों राज्यों में किसान आंदोलन को मजबूती मिलेगी....
 

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Farmers leaders are stressing for social engineering between Jaat, dalits and other castes
पतंग उड़ाते किसान - फोटो : PTI

विस्तार

केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ 'किसान संगठन' अपने आंदोलन को देशव्यापी बनाने में लगे हैं। कई राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए किसान नेता अब 'सोशल इंजीनियरिंग' का सहारा ले रहे हैं। 'दो धारी' तलवार का वह गठजोड़ कितना टिक पाएगा, इसका अंदाजा खुद किसान संगठनों के नेताओं को भी नहीं है। अतीत में राजनीतिक प्लेटफार्म पर ऐसे कई प्रयास हो चुके हैं, मगर किसी को बहुत ज्यादा लक्षित परिणाम नहीं मिल सका।

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किसान आंदोलन से जुड़े प्रमुख राज्य उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में किसान संगठनों के नेता, जाट व दलित समाज के लोगों को एक साथ लाने का प्रयास कर रहे हैं। भाकियू प्रधान गुरनाम सिंह चढूनी ने तो साफतौर पर कह दिया है कि दलित अपने घर में चौ. छोटूराम की तस्वीर लगाएं और किसान यानी जाट अपने घरों में डॉ. बीआर अंबेडकर का फोटो लगा लें। इससे चारों राज्यों में किसान आंदोलन को मजबूती मिलेगी।
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किसान आंदोलन को लेकर इन चारों राज्यों में आम लोगों के बीच यह धारणा बन गई है कि ये आंदोलन तो जाट समुदाय का है। पंजाब में इसे सिख ही आगे बढ़ा रहे हैं। हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी यही सोच देखी जा रही है। इन बात ने किसान संगठनों के नेताओं को खासा परेशान कर दिया है। वजह, भाजपा नेताओं की तरफ से कथित तौर पर ऐसे बयान दिए गए कि इस आंदोलन से आम लोगों का कोई लेना देना नहीं है। खुद राकेश टिकैत, योगेंद्र यादव, दर्शनपाल और गुरनाम सिंह चढूनी को आगे आकर इस बाबत स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी। इन नेताओं ने कहा था कि किसान आंदोलन में सभी धर्म और जातियां शामिल हैं। किसान, किसी एक जाति या समुदाय का नहीं होता। उसके खेत में पैदा हुआ अनाज सभी धर्मों के लोग खाते हैं।
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इन नेताओं की अपील का ज्यादा असर नहीं हुआ। उक्त चारों राज्यों में किसान आंदोलन को लेकर यह बात कही जाने लगी कि इसमें तो केवल जाट समुदाय के लोग हैं। इन प्रदेशों की राजनीति के जानकार, रविंद्र कुमार कहते हैं, भले ही गुरनाम सिंह चढूनी ने 'सोशल इंजीनियरिंग' का फार्मूला तैयार कर लिया है, लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह संदिग्ध है। उत्तर प्रदेश में भले ही कुछ समय तक दलित समाज और ब्राह्मण समुदाय का गठजोड़ कामयाब रहा था, लेकिन बाकी राज्यों में यह नहीं चल सका। दरअसल, जाट और दलित समुदाय के बीच एक सामाजिक दूरी बनी हुई है। इसे भिन्नता भी कहा जा सकता है। मीडिया में ऐसी खबरें आती रहती हैं कि कई जगहों पर दलितों को अभी तक वह दर्जा नहीं दिया जा सका है। इन चारों प्रदेशों में बहुत से किसान जमींदारों के यहां दलित समुदाय के लोग बतौर मजदूर काम करते हैं। कई स्थानों पर कथित तौर से हीन भावना जैसा कुछ सुनने को मिलता है।

हरियाणा में राजनीतिक दल इनेलो, जिसमें किसानों या जाट समुदाय के लोगों की संख्या अधिक रहती है, उसने कई बार बसपा के साथ चुनावी गठजोड़ किया है। जब चुनाव का नतीजा आया तो पता चला कि ये 'सोशल इंजीनियरिंग' तो दो धारी तलवार निकली। जाट समुदाय के वोट बसपा के पक्ष में नहीं जा सके। दूसरी ओर, बसपा के वोटरों ने भी इनेलो प्रत्याशियों को वोट नहीं दिया। कमोबेश यही स्थिति राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी देखने को मिलती है।

किसान नेता 'सोशल इंजीनियरिंग' के जरिए अनुसूचित जातियों की बड़ी आबादी को साधने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन इसमें सफलता की गुंजाइश बेहद कम नजर आती है। आंदोलन के मंच से किसान नेता ने यह कहते रहे कि मजदूरों को यह समझना चाहिए कि तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ लड़ाई सिर्फ किसानों की नहीं है। किसान अपना काम करेंगे, लेकिन मजदूर वर्ग को इसका सबसे ज्यादा नुकसान होगा। इस कारण, मजदूर वर्ग को किसानों के साथ आ जाना चाहिए।


बतौर, रविंद्र कुमार, किसान नेताओं को 'सोशल इंजीनियरिंग' का सहारा लेने की बजाए हर वर्ग के लोगों से संपर्क कर उन्हें आंदोलन से जोड़ना चाहिए। मौजूदा परिस्थितियों में केवल कुछ समुदायों को साथ लेकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाना किसान संगठनों के लिए फायदे का सौदा नजर नहीं आता।

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