रूसी राष्ट्रपति पुतिन का अल्पसंख्यकों को रूसी कानून मानने या देश छोड़ने का भाषण वायरल, ये है सच्चाई
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देश के अल्पसंख्यक समुदाय में सीएए और एनआरसी कानूनों को लेकर नाराजगी बरकरार है। इसके विरोध में शाहीन बाग और जामिया मिल्लिया इस्लामिया सहित अनेक जगहों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इस मुद्दे पर देश के तनावपूर्ण माहौल के बीच सोशल मीडिया पर कथित रूप से रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का एक भाषण वायरल हो रहा है, जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय को रूस के कानूनों को मानने, रूसी भाषा सीखने या किसी दूसरे देश में चले जाने के लिए कहा गया है।
पुतिन के रूस की संसद में दिए कथित भाषण में देश को बचाए रखने के लिए फ्रांस और हॉलैंड जैसे देशों में हुई आतंकी घटनाओं से सबक लेते हुए अल्पसंख्यकों के लिए कोई रियायत न देने की बात कही गई है।
लेकिन फैक्ट चेक में यह बात सामने आई है कि पुतिन ने इस तरह की अल्पसंख्यक विरोधी बात कभी भी नहीं कही हैं। उलटे सीरिया से भागे शरणार्थियों की समस्या से जूझने में उन्होंने यूरोपीय यूनियन से अपनी सहमती जताई है और इस काम के उनका साथ देने की बात कही है।
माना जा रहा है कि देश के मौजूदा तनावपूर्ण माहौल को खराब करने के लिए इस तरह के फर्जी संदेश जानबूझकर एक वर्ग की तरफ से फैलाए जा रहे हैं। इस समय दिल्ली का विधानसभा चुनाव भी चल रहा है। ऐसे में मतदाताओं को धार्मिक आधार पर बांटने की साजिश भी इसके पीछे हो सकती है।
वायरल हो रहे संदेश में क्या लिखा है?
फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पुतिन के भाषण के रूप में जो फेक मेसेज वायरल हो रहा है, वह इस प्रकार है-
व्लादिमीर पुतिन का अब तक का सबसे संक्षिप्त भाषण, आपको इसे अवश्य पढ़ना चाहिए और इस पर विचार अवश्य करना चाहिए। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूसी संसद के संबोधन में रूस के अल्पसंख्यक तनाव पर कहा
रूस में रूसियों की तरह रहें। कोई भी अल्पसंख्यक समुदाय जो कहीं से हो, यदि उसे रूस में रहना है, यहां पर काम करना है, आहार लेना है तो उसे रूसी भाषा में बोलना होगा। रूस के कानूनों का सम्मान करना होगा। यदि वे शरीयत नियमों को वरीयता देना पसंद करते हैं एवं मुस्लिम जीवन शैली में जीना चाहते हैं तो उन्हें हमारा सुझाव है कि वे उन स्थानों पर चले जाएं जहां यह राजकीय कानून है। रूस को अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय की आवश्यकता नहीं है, अल्पसंख्यकों को रूस की आवश्यकता है। हम किसी तरह का विशेषाधिकार उन्हें नहीं देते और न ही हम अपने कानूनों में ऐसे बदलाव लायेंगे जो उनकी अपेक्षाओं पर खरे उतरते हों। चाहे वो ऊंची से ऊंची आवाज में इसे ‘भेदभाव’ कहें।
रूसी संसद के राजनेताओं ने पुतिन का खड़े होकर 5 मिनटों तक अभिवादन किया।रूसी संस्कृति की अवमानना हमें किसी भी रूप में स्वीकार नहीं है। यदि एक राष्ट्र के रूप में जीवित रहना है, तो हमें अमेरिका, इंग्लैंड, हॉलैंड और फ्रांस में हुए आतंकी हमलों से सीख लेने की आवश्यकता है। मुसलमान उन देशों का अधिग्रहण कर रहे हैं। लेकिन वे रूस के साथ ऐसा नहीं कर पाएंगे। रूसी रिवाजों और परंपराओं का मुकाबला असंस्कारी और आदिम मुस्लिम शरीयत नियमों के साथ नहीं किया जा सकता। जब भी यह सम्माननीय वैधानिक निकाय नए नियमों के सृजन का विचार करे, तो उसे रूस के राष्ट्रीय हितों को प्रथम वरीयता में रखना है, यह ध्यान में रखते हुए कि मुस्लिम अल्पसंख्यक रूसी नहीं हैं।
क्या है सच्चाई
दरअसल, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन अपने सख्त रुख के लिए जाने जाते हैं। वे रूस की सैनिक सेवा के साथ-साथ देश के प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं। लेकिन उन्होंने रूस की संसद को ऐसा कोई भाषण कभी दिया ही नहीं है, जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यक समाज के प्रति किसी प्रकार की नफरत दिखाई हो। उलटे ईराक, सीरिया और अन्य मुस्लिम देशों में संकट के समय उनका साथ दिया है।फैक्ट चेक संस्था Snopes.com के मुताबिक सीरिया में जब ISIS लड़ाकों के खिलाफ अमेरिका का युद्ध अपने चरम पर था और सीरिया के लोग अपने घरों को छोड़कर भागकर यूरोपीय देशों में शरण ले रहे थे, तब उन्होंने अन्य देशों के साथ इस समस्या पर सहानुभूति प्रकट करते हुए कहा था कि वे विश्व समुदाय की चिंताओं के साथ खड़े हैं और विस्थापितों के पुनर्वास में सक्रिय भूमिका निभायेंगे।
व्लादिमीर पुतिन के नाम से यह संदेश वर्ष 2012 से ही कई बार सोशल मीडिया की सुर्खियां बन चुका है। ऐसे संदेश लोगों के धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने के लिहाज से जारी किये जाते हैं। इसके फर्जी होने की बात भी सामने आ चुकी है, लेकिन जब-जब कहीं चुनाव होते हैं तब कुछ निहित स्वार्थी तत्त्वों के द्वारा इसे वायरल करा दिया जाता है। इस मेसेज को देश में CAA, NRC और एनपीआर पर फैले भ्रम के आलावा दिल्ली विधानसभा चुनाव से जोड़कर भी देखा जा सकता है।