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'नवजात को दो साल तक बाहर का खाना खिलाना कानूनन अपराध है'

Tue, 26 Jun 2018 11:00 PM IST
हर्षिता, अमर उजाला, नई दिल्ली
हर्षिता, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 26 Jun 2018 11:00 PM IST
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Experts Talk on IMS Act 2003 health reporting skills at Critical Appraisal Skill Programme Workshop
वरिष्ठ पत्रकार आरती धर
मां के दूध का कोई विकल्प नहीं है। जन्म के शुरुआती 6 महीने तक शिशु को सिर्फ स्तनपान कराना अनिवार्य है। वहीं, छह महीने से दो साल तक के बच्चे को स्तनपान के साथ-साथ पूरक आहार देना भी जरूरी है। मगर बाजार में मिलने वाले डब्बा बंद शिशु आहार को मां के दूध जितना पोषक होने का दावा करना, उसका प्रचार प्रसार करना और दो साल से कम उम्र वाले बच्चों को ऐसा आहार देना कानूनन जुर्म है।
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यह जानकारी वरिष्ठ पत्रकार आरती धर ने 'क्रिटिकल अप्रेजल स्किल प्रोग्राम' (कैस) की कार्यशाला में दी। उन्होंने कहा, 'शिशु दुग्ध विकल्प अधिनियम 1992 और संशोधित अधिनियम 2003 के तहत कोई भी मां के दूध के विकल्प के तौर पर किसी भी डब्बा बंद दूध, शिशु आहार या दूध की बोतलों का उत्पादन, आपूर्ति, वितरण या प्रचार नहीं कर सकता। अगर इसे बढ़ावा देते या दो साल के छोटे बच्चे को ऐसा आहार देते हुए कोई स्वास्थ्य कर्मी पाया गया, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।' 
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स्तनपान छोड़कर, उसके विकल्प के तौर पर अगर बच्चे को बेबी फूड दिया जाए, तो उसके शारीरिक और मानसिक विकास पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। कानून के बावजूद यह काम धड़ल्ले से बाजार में हो रहा है। माएं भी अपने बच्चों को यह खिला रही हैं। इसकी मुख्य वजह जागरुकता की कमी है। आरती धर ने कहा, 'यहां पत्रकारों की भूमिका अहम हो जाती है। यह उऩकी जिम्मेदारी है कि लोगों की जिंदगी से जुड़े मुद्दे पर वह संवेदनशीलता और विश्वसनीयता से रिपोर्टिंग करें और लोगों के बीच मौजूद मिथ्याओं को दूर करें।'
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'राजनीति से ज्यादा विज्ञान की खबरों को तवज्जो मिलना जरूरी'

Experts Talk on IMS Act 2003 health reporting skills at Critical Appraisal Skill Programme Workshop
भारतीय जनसंचार की प्रोफेसर गीता बामजई
अमर उजाला और यूनिसेफ की साझेदारी में आयोजित कार्यशाला में भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रोफेसर डॉ. गीता बामजई ने भी प्रतिभागियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि आम जनता की जिंदगी को राजनीति नहीं बल्कि विज्ञान प्रभावित करती है। लिहाजा, स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को लोगों के बीच प्रमाणिकता के साथ पहुंचाना जरूरी है। उन्होंने कहा, 'किसी भी शोध को छापने से पहले उसकी विश्वसनीयता परखनी चाहिए। इसके लिए सही आंकड़ों को पेश करना जरूरी है।' उन्होंने कहा कि किसी भी अध्ययन को आधा-अधूरा छापने से अर्थ का अनर्थ होने का खतरा बना रहा है। लिहाजा, रिसर्च रिपोर्ट के हर अहम बिंदु को लोगों के सामने रखना चाहिए।  

कार्यशाला का संचालन कर रहे अमर उजाला के वरिष्ठ संपादक संजय अभिज्ञान ने कहा कि 'कैस' की विधा अनुसंधान और शोध प्रस्तावों को आंकने की कला है। उन्होंने कहा, 'सप्रमाण लेखन ही कुंजी है। शोध या अनुसंधान से किसी कंपनी या समूह यी लॉबी को फायदा होता हो तो उसका उल्लेख संबंधित रिपोर्ट में जरूर करना चाहिए।' उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि खबर के शीर्षक को आकर्षक रूप देते वक्त बात का बतंगड़ बनाने से बचना चाहिए। 
 

क्या है कैस?

Experts Talk on IMS Act 2003 health reporting skills at Critical Appraisal Skill Programme Workshop
वरिष्ठ पत्रकार एमएच गज़ाली
वर्कशॉप के दूसरे और आखिरी दिन वरिष्ठ पत्रकार एमएच गजली और प्रमोद जोशी ने भी प्रतिभागियों को हेल्थ रिपोर्टिंग के गुर सिखाए। यूनिसेफ की न्यूट्रिशन एक्सपर्ट गायत्री सिंह ने भी स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपने अनुभव साझा किए।

क्रिटिकल अप्रेजल स्किल प्रोग्राम ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन, यूनिसेफ, आईआईएमसी और अमर उजाला के साथ मिलकर तैयार किया है। इस प्रोग्राम का मकसद पत्रकारों को स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारियों की विश्वसनीयता और प्रासंगिकता सुनिश्चित करने के लिए शोध और विश्लेषण के गुर सिखाना है। अमर उजाला ने अपने पत्रकारों के लिए नई दिल्ली में दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया।
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