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5 राज्यों के चुनाव तय करेंगे, कौन होगा मोदी का मुख्य प्रतिद्वंद्वी?
सुदीप ठाकुर / अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 24 Jan 2017 02:53 PM IST
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उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर के विधानसभा चुनावों से सिर्फ इन राज्यों को ही नई सरकारें नहीं मिलने वाली हैं, बल्कि यह भी अंदाजा लग सकता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष का संभावित चेहरा कौन हो सकता है।
2019 के लोकसभा चुनावों पर अभी से बात करना जल्दबाजी लग सकती है, लेकिन सवा दो साल का समय कोई अधिक भी नहीं होता। मगर इन पांच राज्यों के चुनाव नोटबंदी के फैसले की पृष्ठभूमि में हो रहे हैं, लिहाजा इन्हें मोदी के इस कदम पर जनमत संग्रह की तरह भी देखा जा रहा है।
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2019 के लोकसभा चुनावों पर अभी से बात करना जल्दबाजी लग सकती है, लेकिन सवा दो साल का समय कोई अधिक भी नहीं होता। मगर इन पांच राज्यों के चुनाव नोटबंदी के फैसले की पृष्ठभूमि में हो रहे हैं, लिहाजा इन्हें मोदी के इस कदम पर जनमत संग्रह की तरह भी देखा जा रहा है।
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एकमात्र स्वीकार्य चेहरा नरेंद्र मोदी
नरेंद्र मोदी
- फोटो : SELF
चुनावों का इतिहास बताता है कि चुनाव सिर्फ पार्टियां ही नहीं लड़तीं, पार्टी के प्रमुख चेहरे भी लड़ते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव से भाजपा के पास सबसे बड़ा और सच कहें तो एकमात्र स्वीकार्य चेहरा नरेंद्र मोदी ही हैं। मोदी पार्टी के भीतर उस ऊंचाई पर और जिस सर्वशक्ति के साथ बैठे हैं, उसकी तुलना अब अटल बिहारी वाजपेयी से भी करना बेमानी लगता है।
लालकृष्ण आडवाणी भले ही प्रधानमंत्री न बन सके, मगर वाजपेयी के बाद दूसरे नंबर पर उनकी गिनती होती थी और उनकी इसी हैसियत की वजह से सत्ता और संगठन में संतुलन बनाने के लिए आडवाणी को उप प्रधानमंत्री तक बनाया गया।मोदी की भाजपा में फिलहाल न तो किसी दूसरे विकल्प की जगह है और न ही कोई दूसरा नेता नजर आता है।
नोटबंदी के फैसले के बाद जिस तरह से विपक्ष बिखरा नजर आया उसमें यह वाकई बहुत कठिन है कि विपक्ष के किस नेता को उनके मुकाबले रखा जाए। फिर भी ये चुनाव चार संभावित दावेदारों के लिए बड़ा मौका बनकर आए हैं। इनमें से तीन दावेदार युवा हैं और पचास वर्ष से कम के हैं। ये तीन दावेदार हैं- अखिलेश यादव, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल। चौथी दावेदार हैं बसपा सुप्रीमो मायावती, जो उम्र और अनुभव दोनों में ही इन तीनों से बड़ी हैं।
लालकृष्ण आडवाणी भले ही प्रधानमंत्री न बन सके, मगर वाजपेयी के बाद दूसरे नंबर पर उनकी गिनती होती थी और उनकी इसी हैसियत की वजह से सत्ता और संगठन में संतुलन बनाने के लिए आडवाणी को उप प्रधानमंत्री तक बनाया गया।मोदी की भाजपा में फिलहाल न तो किसी दूसरे विकल्प की जगह है और न ही कोई दूसरा नेता नजर आता है।
नोटबंदी के फैसले के बाद जिस तरह से विपक्ष बिखरा नजर आया उसमें यह वाकई बहुत कठिन है कि विपक्ष के किस नेता को उनके मुकाबले रखा जाए। फिर भी ये चुनाव चार संभावित दावेदारों के लिए बड़ा मौका बनकर आए हैं। इनमें से तीन दावेदार युवा हैं और पचास वर्ष से कम के हैं। ये तीन दावेदार हैं- अखिलेश यादव, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल। चौथी दावेदार हैं बसपा सुप्रीमो मायावती, जो उम्र और अनुभव दोनों में ही इन तीनों से बड़ी हैं।
सबसे पहले अखिलेश यादव
अखिलेश यादव
- फोटो : amar ujala
सबसे पहले अखिलेश यादव। पांच साल पहले 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की जीत में अखिलेश की युवा छवि और उत्तर प्रदेश के कोने कोने तक की गई साइकिल यात्रा का खासा योगदान था। मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश को अपने पिता मुलायम और अपने चाचाओं शिवपाल, रामगोपाल और आजम खां जैसे दिग्गजों की छाया से बाहर निकलना था। उनकी सबसे बड़ी कामयाबी यही है
कि तमाम उतार चढ़ाव और मुलायम की जब तब मिलती झिड़कियों और हिदायतों के बावजूद एक संतुलन के साथ सरकार चलाते रहे। मगर पिछले दो महीने के दौरान जब समाजवादी पार्टी और यादव कुनबे का झगड़ा सड़क पर आ गया, वह अपने पिता और चाचाओं की छाया से बाहर निकलकर आ गए हैं। चुनावों की घोषणा के बावजूद वह जिस तरह से पार्टी पर कब्जे के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं,
उससे उनकी एक लड़ाकू नेता की छवि बनी है। यह वोट में कितना बदल पाएगी अभी कहना मुश्किल है। मगर उन्होंने मुख्तार अंसारी से लेकर सपा के दागियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। यदि अखिलेश पार्टी और परिवार के झगड़े में विजेता बनकर उभरते हैं तब उत्तर प्रदेश का चुनावी संघर्ष मोदी बनाम अखिलेश में बदल जाएगा। और यदि वह दोबारा सरकार बनाने में सफल होते हैं, तब भविष्य में विपक्ष की राजनीति के वह बड़े किरदार बनकर उभरेंगे,
इससे कौन इंकार कर सकता है। मगर यदि पार्टी टूट जाती है, अखिलेश दांव हार जाते हैं तो उन्हें उबरने में कितना वक्त लगेगा कहा नहीं जा सकता।
कि तमाम उतार चढ़ाव और मुलायम की जब तब मिलती झिड़कियों और हिदायतों के बावजूद एक संतुलन के साथ सरकार चलाते रहे। मगर पिछले दो महीने के दौरान जब समाजवादी पार्टी और यादव कुनबे का झगड़ा सड़क पर आ गया, वह अपने पिता और चाचाओं की छाया से बाहर निकलकर आ गए हैं। चुनावों की घोषणा के बावजूद वह जिस तरह से पार्टी पर कब्जे के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं,
उससे उनकी एक लड़ाकू नेता की छवि बनी है। यह वोट में कितना बदल पाएगी अभी कहना मुश्किल है। मगर उन्होंने मुख्तार अंसारी से लेकर सपा के दागियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। यदि अखिलेश पार्टी और परिवार के झगड़े में विजेता बनकर उभरते हैं तब उत्तर प्रदेश का चुनावी संघर्ष मोदी बनाम अखिलेश में बदल जाएगा। और यदि वह दोबारा सरकार बनाने में सफल होते हैं, तब भविष्य में विपक्ष की राजनीति के वह बड़े किरदार बनकर उभरेंगे,
इससे कौन इंकार कर सकता है। मगर यदि पार्टी टूट जाती है, अखिलेश दांव हार जाते हैं तो उन्हें उबरने में कितना वक्त लगेगा कहा नहीं जा सकता।
दूसरे दावेदार हैं राहुल गांधी
दूसरे दावेदार हैं राहुल गांधी। करीब बारह वर्षों से सक्रिय राजनीति में आने के बावजूद उनके हिस्से में एक भी बड़ी राजनीतिक सफलता नहीं है। इसके बावजूद चूंकि कांग्रेस अब भी दूसरा बड़ा दल है
और उसकी पहुंच राष्ट्रीय स्तर पर है वह एक स्वाभाविक दावेदार हैं। राहुल के लिए ये चुनाव इसलिए अहम हैं, क्योंकि उत्तराखंड और मणिपुर में कांग्रेस की सरकारें हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का वैसे भी कोई बड़ा दावा नहीं है, मगर यदि राहुल, अखिलेश के साथ कांग्रेस की साझेदारी करवाने में सफल होते हैं
और यदि यह गठबंधन मोदी की अगुआई वाले एनडीए को पराजित करने में सफल होता है, तो इसका कुछ श्रेय अखिलेश के साथ राहुल को भी जाएगा। मगर इतने से बात बनेगी नहीं। राहुल की अगुआई में यदि कांग्रेस बाकी के चार राज्यों गोवा, पंजाब, उत्तराखंड और मणिपुर में कम से कम तीन राज्यों में जीत दर्ज करने में सफल होती है, तो उनके बारे में प्रचलित लतीफे स्वतः ही खारिज हो जाएंगे। मगर यदि उत्तर प्रदेश के साथ कांग्रेस इन राज्यों में कुछ खास न कर पाए,
तो उनके बारे में जो राय है, वह बनी रहेगी, बल्कि इसके बाद कांग्रेस के भीतर उनके खिलाफ आवाज उठने लगे तो हैरत नहीं होनी चाहिए।
और उसकी पहुंच राष्ट्रीय स्तर पर है वह एक स्वाभाविक दावेदार हैं। राहुल के लिए ये चुनाव इसलिए अहम हैं, क्योंकि उत्तराखंड और मणिपुर में कांग्रेस की सरकारें हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का वैसे भी कोई बड़ा दावा नहीं है, मगर यदि राहुल, अखिलेश के साथ कांग्रेस की साझेदारी करवाने में सफल होते हैं
और यदि यह गठबंधन मोदी की अगुआई वाले एनडीए को पराजित करने में सफल होता है, तो इसका कुछ श्रेय अखिलेश के साथ राहुल को भी जाएगा। मगर इतने से बात बनेगी नहीं। राहुल की अगुआई में यदि कांग्रेस बाकी के चार राज्यों गोवा, पंजाब, उत्तराखंड और मणिपुर में कम से कम तीन राज्यों में जीत दर्ज करने में सफल होती है, तो उनके बारे में प्रचलित लतीफे स्वतः ही खारिज हो जाएंगे। मगर यदि उत्तर प्रदेश के साथ कांग्रेस इन राज्यों में कुछ खास न कर पाए,
तो उनके बारे में जो राय है, वह बनी रहेगी, बल्कि इसके बाद कांग्रेस के भीतर उनके खिलाफ आवाज उठने लगे तो हैरत नहीं होनी चाहिए।
तीसरे दावेदार हैं अरविंद केजरीवाल
केजरीवाल
- फोटो : self
देश की खांटी राजनीति में अब भी उन्हें 'बाहरी' समझा जाता है। दिल्ली में दूसरी बार सरकार चला रहे केजरीवाल ने राजनीति की बनी बनाई लीक तोड़कर विपक्षी पर सीधे वार करने की रणनीति अपनाई है। अन्ना आंदोलन से लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचे केजरीवाल विवादों और दुस्साहसों से जुड़े रहे हैं।
दिल्ली की पहली सरकार गंवाने के बाद मोदी के खिलाफ लोकसभा का चुनाव लड़ने बनारस तक पहुंच गए थे! और यह देश की राजनीति में लंबे समय तक दर्ज रहेगा कि मई, 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी की 'सुनामी' के बावजूद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव में भाजपा को पांच का आकड़ा तक पार करने नहीं दिया! आम आदमी पार्टी यदि गोवा और पंजाब में उनकी अगुआई में जीत दर्ज करती है,
तो मोदी के मुकाबले केजरीवाल विपक्ष के एक मजबूत दावेदार के रूप में उभर सकते हैं। मगर यदि आप इन चुनावों में कुछ खास नहीं कर पाती है, तो आप की दिल्ली में मुसीबत बढ़ जाएगी और संभव है कि लोग उसे भारतीय राजनीति का एक अपवाद मानकर उसकी मर्शिया तक पढ़ने लग जाएं।
दिल्ली की पहली सरकार गंवाने के बाद मोदी के खिलाफ लोकसभा का चुनाव लड़ने बनारस तक पहुंच गए थे! और यह देश की राजनीति में लंबे समय तक दर्ज रहेगा कि मई, 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी की 'सुनामी' के बावजूद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव में भाजपा को पांच का आकड़ा तक पार करने नहीं दिया! आम आदमी पार्टी यदि गोवा और पंजाब में उनकी अगुआई में जीत दर्ज करती है,
तो मोदी के मुकाबले केजरीवाल विपक्ष के एक मजबूत दावेदार के रूप में उभर सकते हैं। मगर यदि आप इन चुनावों में कुछ खास नहीं कर पाती है, तो आप की दिल्ली में मुसीबत बढ़ जाएगी और संभव है कि लोग उसे भारतीय राजनीति का एक अपवाद मानकर उसकी मर्शिया तक पढ़ने लग जाएं।
चौथी दावेदार हैं मायावती
मायावती
- फोटो : self
चौथी दावेदार हैं मायावती। मायावती अखिलेश, राहुल और अरविंद की तुलना में कहीं अधिक वरिष्ठ और अनुभवी हैं। उनकी राजनीतिक शैली भी इनसे अलग है।
पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। चूंकि बसपा उप चुनाव नहीं लड़ती है तो पता ही नहीं चलता कि इस दौरान हुए उपचुनावों में पार्टी के प्रदर्शन में कोई सुधार हुआ क्या। इसके बावजूद वह ऐसी नेताओं में से हैं, जिन्हें खारिज नहीं किया जा सकता। एक समय वामदलों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर भी आगे किया था।
वास्तव में उत्तर प्रदेश के ये चुनाव मायावती के लिए करो या मरो जैसे हैं। यदि वह तमाम अटकलों और राजनीतिक पंडितों को धता बताकर बसपा को उत्तर प्रदेश में बहुमत दिलाने में सफल हो जाती हैं तो फिर 2019 के चुनाव के समय मोदी और भाजपा के खिलाफ बनने वाले किसी भी विपक्षी गठबंधन में उनकी दावेदारी को खारिज करना मुश्किल हो जाएगा। और यदि हार जाती हैं तो बसपा को अपनी सोशल इंजीनयरिंग को बचाना मुश्किल हो जाएगा।
पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। चूंकि बसपा उप चुनाव नहीं लड़ती है तो पता ही नहीं चलता कि इस दौरान हुए उपचुनावों में पार्टी के प्रदर्शन में कोई सुधार हुआ क्या। इसके बावजूद वह ऐसी नेताओं में से हैं, जिन्हें खारिज नहीं किया जा सकता। एक समय वामदलों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर भी आगे किया था।
वास्तव में उत्तर प्रदेश के ये चुनाव मायावती के लिए करो या मरो जैसे हैं। यदि वह तमाम अटकलों और राजनीतिक पंडितों को धता बताकर बसपा को उत्तर प्रदेश में बहुमत दिलाने में सफल हो जाती हैं तो फिर 2019 के चुनाव के समय मोदी और भाजपा के खिलाफ बनने वाले किसी भी विपक्षी गठबंधन में उनकी दावेदारी को खारिज करना मुश्किल हो जाएगा। और यदि हार जाती हैं तो बसपा को अपनी सोशल इंजीनयरिंग को बचाना मुश्किल हो जाएगा।