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परीक्षा परिणाम ही सब कुछ नहीं होता, तो क्या हम सब एक-दूसरे के जाल में फंसे हैं !
शंकर सिंह भण्डारी, हल्द्वानी
Updated Sun, 03 Jun 2018 01:45 PM IST
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क्या हम कभी यह सोचते हैं कि अक्सर पानी का सच, जाल का सच, नाव का सच और मछलियों का सच एक-दूसरे के खिलाफ क्यों चला जाता है? और ऐसा सिर्फ इस समय ही नहीं हुआ है बल्कि सदियों से हम सब एक-दूसरे के फंदे में उलझते जा रहे हैं।
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हर व्यक्ति की अपनी सोच होती है, अपने विचार होते हैं। फिर भी न जाने क्यों लोग अपने बच्चों की दूसरों के बच्चों से तुलना करते हैं। परीक्षा परिणाम आने के बाद लोगों ने कम नंबर लाने वालों और अधिक नंबर लाने वालों की समीक्षा शुरू कर दी है, जो कि हमारे समाज के लिए घातक है। जब एक घर के दो जुड़वां बच्चों के फिंगरप्रिंट या आई रेटिना एक जैसे नहीं हो सकते, दोनों की सोच एक जैसी नहीं हो सकती, विचार एक जैसे नहीं हो सकते, तो यह उम्मीद करना कि दो बच्चों के नंबर एक जैसे आ जाएं, ऐसा कैसे संभव है?
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नंबर कम या ज्यादा आना बच्चों की परिस्थितियों, मानसिक क्षमता, सोच और सुविधाओं पर निर्भर करता है। हाल ही में दसवीं और बारहवीं के परीक्षा परिणाम आए हैं। इसके साथ ही टीवी मीडिया, सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया व आम लोगों ने एक-दूसरे के बच्चों के नंबरों की तुलना करना प्रारंभ कर दिया है लेकिन ऐसा करना बच्चों के मस्तिष्क के लिए घातक है। इससे मानसिक तनाव, अनिद्रा, आत्महत्या और नशा जैसी भयंकर बीमारियों को बढ़ावा मिलता है।
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इन सबके लिए खुद परिजन, पड़ोसी और रिश्तेदार भी जिम्मेदार होते हैं। यदि आप अपने बच्चे की किसी से तुलना कर रहे हैं कि आपने अपने बच्चे के चार ट्यूशन लगवाए, कुछ भी काम नहीं करवाया, फिर भी परीक्षा परिणाम में कम नंबर आए। इस तरह एक तरफा सोच रखकर हम अपने बच्चों को क्यों तनाव का शिकार बना रहे हैं? इन सबके बीच हम यह भूल जाते हैं कि स्कूल की परीक्षा के परिणाम से अधिक जिंदगी की परीक्षा के परिणाम हैं।
बच्चों को अच्छा इंसान बनाने हेतु हम तैयारियां क्यों नहीं करवाते? नंबर कैसे आएं, इसके पीछे दौड़ते हैं और बच्चों को भी दौड़ाते हैं। परिस्तिथियां भिन्न होने पर बच्चों का मानसिक स्तर भिन्न हो सकता है, इसलिए सभी की भावनाओं की कद्र करते हुए शिक्षा में प्रथम आने की दौड़ को छोड़कर अच्छा इंसान बनाने की ओर कदम बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करें। कुछ लोग बच्चों को हमेशा ज्ञान देते हैं कि हमारे समय में ऐसा होता था, वैसा होता था, अरे आप खुद समझो कि वह वक्त बीत चुका है। आज का समय आपके बच्चों का है।