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15 किमी चलकर आदिवासी बच्चों को पढ़ा रहे ईसरम संतोष, जंगलों के बीच बनाया स्कूल

Wed, 15 Jul 2020 11:10 AM IST
आसिम खान न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हैदराबाद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हैदराबाद Published by: आसिम खान Updated Wed, 15 Jul 2020 11:10 AM IST
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Esram Santhosh student of Osmania University is teaching tribal children in Telangana village hamlet
ईसरम संतोष ने आदिवासी बच्चों के लिए बनाया स्कूल - फोटो : Twitter

कोरोना वायरस महामारी की वजह से तेलंगाना में आदिवासियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। महामारी की वजह से हैदराबाद से लगभग 200 किमी दूर मुलुगु जिले के जंगलों के बीच रह रहे गुट्टी कोया आदिवासियों ने अपनी नौकरी खो दी। सीमित संसाधनों के साथ वो एक वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। 

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हैमलेट गांव के इन लोगों के लिए 26 वर्षीय उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्र ईसरम संतोष मसीहा बनकर आए। संतोष साइबर लॉ के छात्र हैं और छात्रावास बंद होने की वजह से मुलुगु जिले के नारलापुर में अपने घर लौटे हैं। संतोष इन लोगों के लिए आवश्यक आपूर्ति कर रहे हैं। 
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राहत कार्य के बीच संतोष ने महसूस किया कि 150 लोगों के समुदाय में शिक्षा की कमी है। यहां के बच्चों ने अपने जीवन में कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा। उन्होंने इन बच्चों को पढ़ाने की योजना बनाई। उन्होंने एक एक झोपड़ी में स्कूल के रूप में भीम चिल्ड्रेन हैप्पीनेस सेंटर की स्थापना की जिसमें आज 35 से 40 छात्र अंग्रेजी, गणित और तेलुगु सीख रहे हैं। 
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एक बच्चे के पिता परमेश एम जोकि राजमिस्री हैं ने कहा कि अब तक, बच्चे अपना अधिकांश समय जंगल में खेलने में बिताते थे। अब हमें उम्मीद है कि हमारे बच्चे वैसा जीवन नहीं जिएंगे जैसा हम जीते हैं। लॉकडाउन से पहले बस्ती के अधिकांश सदस्य चिनाई का काम करते थे। अब, वे लोग जंगल से फल और जामुन इकट्ठा करते हैं और 300 रुपये से 400 रुपये प्रतिदिन कमाने के लिए काम करते हैं।

हैमलेट के एक व्यक्ति ने कहा कि मुझे खुशी है कि मेरे बच्चे शिक्षित हो रहे हैं और अपना समय बेकार नहीं कर रहे हैं। उनका भविष्य अब खराब नहीं लगता। बता दें कि आदिवासियों के सपने को साकार करना संतोष के लिए आसान काम नहीं है। संतोष पिछले 30 दिनों से रोजाना 15 किमी की यात्रा कर रहे हैं। वह 10 किमी बाइक पर पांच किमी पैदल चलकर हैमलेट पहुंचते हैं। जिले से गांव को जोड़ने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है।


बता दें कि संतोष ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर किताबें और स्टेशनरी का इंतजाम किया और बच्चों को चॉकलेट, बिस्किट और अंडे बांटे। वह अब हैमलेट में एक पक्के स्कूल का निर्माण करना चाहते हैं और उन्हें सरकार के आवासीय आदिवासी कल्याण स्कूलों में भेजना चाहते हैं, ताकि वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें।

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