समय के साथ कैसे बदले कांग्रेस-भाजपा के चुनाव चिह्न, रोमांचक कहानी
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चुनाव चिह्न का हमेशा से महत्व रहा है, फिर वह चाहे पार्टी का चिह्न हो या फिर मैदान में निर्दलीय किस्मत आजमा रहे प्रत्याशी का। चुनाव चिह्न से ही उन्हें पहचान मिलती है। इन निशानों के बल पर कई बार हार-जीत तय होती है। आजादी के बाद कई पार्टियां बनीं। उन्हें चुनाव चिह्न भी मिला। समय बीतने के साथ पार्टियों में विभाजन हुआ तो चुनाव चिह्न भी बदलते चले गए।
आजादी के बाद 1952 में हुए पहले चुनाव में कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिह्न ‘दो बैलों की जोड़ी’ था तो भारतीय जनसंघ का ‘दीपक’ और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का ‘झोपड़ी’। हालांकि समय बीतते के साथ कांग्रेस का चुनाव चिह्न ‘पंजा’ हो गया तो जनसंघ से भाजपा बनने के बाद चुनाव चिह्न ‘कमल’ हो गया। कांग्रेस ने पहला चुनाव इसी चिह्न पर पंडित जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई में लड़ा और सरकार बनाई। 1970-71 में कांग्रेस में विभाजन हुआ। पार्टी से अलग हुए मोरारजी देसाई, चंद्रभानू गुप्ता ने संगठन कांग्रेस बनाई। विभाजन होते ही चुनाव चिह्न ‘दो बैलों की जोड़ी’ विवादित हो गया सो चुनाव आयोग ने उसे सीज कर दिया।
बाद में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस को चुनाव चिह्न मिला ‘गाय और बछड़ा’, जबकि संगठन कांग्रेस को ‘चरखा’ चुनाव चिह्न मिला। जून 1975 में देश में आपातकाल लगा। आपातकाल में जेल गए वरिष्ठ नेता केके श्रीवास्तव बताते हैं कि उस दौरान इंदिरा के पुत्र संजय गांधी भी राजनीति में सक्रिय हो चुके थे। आपातकाल समाप्त होने के बाद वर्ष 1977 में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के चुनाव चिह्न को विपक्षी पार्टियों ने मुद्दा बना लिया और भाषणों में इंदिरा को गाय तथा संजय को बछड़ा तक संबोधित करने लगे।
वर्ष 1977 के चुनाव में ही ‘दीपक’ चिह्न वाले जनसंघ, ‘झोपड़ी’ चुनाव निशान वाली प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाले भारतीय क्रांति दल का विलय हुआ और जनता पार्टी बनी, जिसे चुनाव चिह्न मिला ‘कंधे पर हल लिए हुए किसान’। वर्ष 1979 में कांग्रेस में एक और विभाजन हुआ और उसे चुनाव चिह्न मिला ‘हाथ का पंजा’। श्री श्रीवास्तव बताते हैं कि विपक्षी दलों ने कांग्रेस के चुनाव चिह्न को खूनी पंजा कहना शुरू कर दिया। इसी बीच जनता पार्टी भी बिखर गई और पूर्ववर्ती जनसंघ के नेताओं ने 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन किया, जिसे चुनाव चिह्न मिला ‘कमल का फूल’। चौधरी चरण सिंह की अगुवाई वाली लोकदल को ‘खेत जोतता हुआ किसान’ चुनाव चिह्न मिला।
वीपी ने ‘अनाज ओसाता हुआ किसान’ चिह्न पर मारा था मैदान
वर्ष 1987-88 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर बोफोर्स तोप खरीद में दलाली का आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ दी और लोकसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया। जून 1988 में इलाहाबाद के तत्कालीन सांसद एवं अभिनेता अमिताभ बच्चन के इस्तीफा देने से खाली हुई सीट पर उप चुनाव हुआ। इसमें विश्वनाथ प्रताप सिंह निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे। उन्हें गैर कांग्रेसी सभी दलों का समर्थन मिला।
इस चुनाव में उन्हें ‘अनाज ओसाता हुआ किसान’ चिह्न मिला। वीपी को मिला चुनाव चिह्न हर मतदाता को पता चले, इसके लिए एकजुट हुए नेताओं ने सौ व्यक्तियों की टीम बनाई और प्रमुख चौराहों, बाजार, कस्बों में जगह-जगह सूप लेकर अनाज ओसाया। इसका असर हुआ और मतदाताओं ने वीपी को जीत दिलाई।
‘चक्र’ पर बनी जनता दल की सरकार
विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इलाहाबाद से चुनाव जीतने के बाद जनता दल के नाम से पार्टी बनाई। इस पार्टी को चुनाव चिह्न मिला ‘चक्र’। वर्ष 1988 के बाद हुआ लोकसभा चुनाव जनता दल ने इसी चिह्न पर लड़ा और जीत कर सरकार बनाई लेकिन एक वर्ष बाद ही जनता दल का विभाजन हो गया।
फिर चंद्रशेखर के नेतृत्व मे समाजवादी जनता पार्टी का गठन हुआ, जिसे ‘कंधे पर हल लिए किसान’ चुनाव चिह्न मिला। वर्ष 1992 में मुलायम सिंह यादव समाजवादी जनता पार्टी से अलग हो गए और उसी वर्ष अक्तूबर में उन्होंने समाजवादी पार्टी बनाई, जिसे ‘साइकिल’ चुनाव चिह्न मिला। इसके पहले 1985 में बहुजन समाज पार्टी का गठन हुआ तो जिसे ‘हाथी’ मिला।