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'एक देश एक चुनाव' के लिए तैयार हो सकता है चुनाव आयोग

Thu, 30 Aug 2018 10:56 PM IST
हरेन्द्र, अमर उजाला, नई दिल्ली
हरेन्द्र, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 30 Aug 2018 10:56 PM IST
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Election commission is ready to bear the cost of one nation one election process
भारत निर्वाचन आयोग
'वन नेशन, वन इलेक्शन' पर सरकार को सौंपी अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट में लॉ कमीशन ने आर्थिक वजहों को भी गिनाया है। लॉ कमीशन का कहना है कि 2014 में लोकसभा चुनावों का खर्च और उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों का खर्च लगभग समान रहा है। वहीं साथ-साथ चुनाव होने पर यह खर्च केंद्र सरकार और राज्य सरकार में 50:50 के अनुपात में बंट जाएगा।
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1967 के बाद नहीं हो पाए एक साथ चुनाव 

गुरुवार को सरकार को सौंपी अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट में लॉ कमीशन का कहना है कि साल 1967 के बाद एक साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया बाधित हो गई। इसकी वजह बताते हुए आयोग का कहना है कि तब तक देश में एक पार्टी का राज था और क्षेत्रीय दल कमजोर थे। संविधान की धारा 356 ने भी एक साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया को बाधित किया। लेकिन अब देश की राजनीति में बदलाव आ चुका है और क्षेत्रीय दल राज्यों में मजबूत स्थिति में हैं। 
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पड़ता है वित्तीय बोझ

कमीशन का कहना है कि लगातार चुनाव होने से सरकार और राज्यों पर आर्थिक बोझ पड़ता है। अलग-अलग चुनाव कराने से केंद्र और राज्य दोनों को वित्तीय बोझ सहना पड़ता है। आयोग का कहना है कि अगर चुनाव साथ-साथ कराए जाते हैं, तो चुनावों पर होने वाला खर्च केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बंट जाएगा। 
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लोकसभा-विधानसभा चुनावों का खर्च 'एकसमान' 

आयोग के मुताबिक 2014 लोकसभा चुनावों में 35 अरब 86 करोड़ 27 लाख रुपए खर्च हुए। 2014 के बाद हुए हरियाणा विधानसभा चुनावों पर 33 करोड़ 72 लाख खर्च आया जबकि लोकसभा चुनावों का खर्च 29 करोड़ ही रहा। झारखंड विधानसभा चुनावों में 86 करोड़ खर्च हुए, जबकि लोकसभा में 89 करोड़ 47 लाख रुपए खर्च हुए। मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनावों में 1 अरब 31 करोड़ और लोकसभा में 1 अरब 99 करोड़ का खर्च हुए। हालांकि दिल्ली में विधानसभा चुनावों में 98 करोड़ 76 लाख रुपए खर्च हुए, जबकि लोकसभा में 34 करोड़ 50 लाख का खर्च आया। 

बार-बार चुनावों से चुनाव आयोग की जेब ढीली

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12.3 लाख वीवीपैट मशीनों की कीमत 4 हजार 555 करोड़ रुपए 

लॉ कमीन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि 2019 में एक साथ चुनाव कराते हैं, तो तकरीबन 10 लाख पोलिंग बूथ बनाने होंगे और तकरीबन 13 लाख बैलेट यूनिट्स, 9.4 लाख कंट्रोल यूनिट्स और तकरीबन 12.3 लाख वीवीपैट मशीनों की जरूरत होगी। एक इलैक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन की कीमत 33 हजार 200 रुपए पड़ती है। चुनाव आयोग का कहना है कि साथ चुनाव होते हैं तो अकेले ईवीएम पर ही 4 हजार 555 करोड़ रुपए खर्च होंगे।

जबकि एक ईवीएम की अधिकतम उम्र 15 साल ही होती है। ईवीएम के आज की कीमत के हिसाब से 2024 में दोबारा एक साथ चुनाव कराने पर 1751 करोड़ रुपए का खर्च आएगा, जबकि 2019 में यह बढ़ कर 2018 करोड़ रुपए हो जाएगा। वहीं 2034 में साथ चुनाव कराने पर नई ईवीएम खरीदने में 14 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। 

बार-बार चुनावों से चुनाव आयोग की जेब ढीली

लॉ कमीशन का कहना है कि बार-बार चुनावों से चुनाव आयोग की भी जेब ढीली होती है। चुनाव आयोग का मुख्य खर्च पोलिंग स्टेशन, पोलिंग बूथ बनाने और मतगणना केंद्र बनाने में होता है। चुनावी ड्यूटी निभा रहे कर्मचारियों के टीए, डीए का भार भी चुनाव आयोग पर पड़ता है। इसके अलावा चुनावी सामग्री और कर्मचारियों को लाने ले जाने के लिए परिवहन व्यवस्था का भी इंतजाम करना पड़ता है। वहीं पोलिंग बूथों और मतगणना स्थलों पर टेंपेररी टेलीफोन फिटिंग और बिजली की व्यवस्था भी करानी होती है। चुनावी सामग्रियों जैसे इंक अमोनिया पेपर के अलावा शांति पूर्ण चुनाव कराने पर भी काफी खर्च होता है।

10 लाख कर्मियों ने कराए 16वीं लोकसभा के चुनाव

वहीं एकसाथ चुनाव कराने पर प्रत्येक पोलिंग स्टेशंस पर एक अतिरिक्त ईवीएम और अतिरिक्त चुनावी सामग्रियों का ही बोझ पड़ेगा। वहीं बड़े पोलिंग स्टेशनों पर अतिरिक्त ईवीएम के साथ अतिरिक्त कर्मचारियों की ही जरूरत होगी। कमीशन के मुताबिक फिलहाल उपलब्ध ईवीएम को कई राज्यों में इस्तेमाल किया जाता है। एक साथ चुनाव होने पर ज्यादा ईवीएम की जरूरत पड़ेगी, जिससे इनके रखरखाव का खर्च बढ़ेगा।

साथ ही इन्हें रखने के लिए कई राज्यों में अलग से सुरक्षित वेयर हाउसेज की जरूरत पड़ेगी। चुनाव आयोग का कहना है कि ज्यादा ईवीएम होने से अतिरिक्त वाहनों के साथ, अतिरिक्त स्टाफ और अतिरिक्त सामग्री की आवश्यकता होगी। चुनाव आयोग के मुताबिक 16वीं लोकसभा के लिए देश के 9 लाख 93 हजार पोलिंग बूथों के लिए 10 लाख पोलिंग अधिकारियों की जरूरत पड़ी थी। 

बार-बार चुनावी ड्यूटी से दिक्कत

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16वीं लोकसभा में 1349 सुरक्षा बलों की कंपनियां

चुनाव आयोग का कहना है कि इन मशीनों की सुरक्षा भी बड़ी चिंता का विषय है। आमतौर पर आयोग सुरक्षा के लिए केंद्रीय अर्ध सैनिक बलों की सेवा लेता है, लेकिन मांग के मुकाबले कम ही सैनिक बल मिलते हैं, जिसके चलते पुलिस और होम गार्ड्स की सेवा लेनी पड़ती है। आयोग का कहना है कि इनकी भूमिका चुनावों से बहुत पहले ही शुरू हो जाती है और वोटों की गिनती से लेकर नतीजे आने तक रहती है, जबकि पोलिंग अधिकारियों की जरूरत चुनावों से पहली और गणना तक ही होती है। 16वीं लोकसभा के लिए चुनाव आयोग ने केंद्रीय अर्ध सैनिक बलों की 1349 कंपनियां तैनात की थीं।

बार-बार चुनावी ड्यूटी से दिक्कत

चुनाव आयोग के मुताबिक अधिकांश पोलिंग बूथ स्कूलों के अंदर बने होते हैं। स्कूली स्टाफ को भी चुनावी ड्यूटी में लगाया जाता है। वहीं मतदान वाले दिन स्कूल को बंद भी करना पड़ता है। इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकार के कर्मियों को भी चुनावी ड्यूटी में लगाया जाता है, उन्हें ट्रेनिंग भी देनी होती है। अगर अलग-अलग चुनाव होंगे तो उन्हें बारबार ट्रेनिंग देनी पड़ेगी, जिससे उनके रोजमर्रा के कामों में भी व्यवधान पड़ेगा।
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