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इंसानी दखल: उजड़ते जंगलों से फैल रही हैं खतरनाक बीमारियां, महामारी का खतरा
Sun, 18 Oct 2026 03:56 PM IST
डॉ. संजय पांडेय
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: डॉ. संजय पांडेय
Updated Sun, 18 Oct 2026 03:56 PM IST
सार
वन क्षेत्रों के बिखरने, प्राकृतिक आवासों में मानवीय दखल और बारिश के बदलते मिजाज से बढ़ रहा संक्रमण का जोखिम। 169 देशों में 32 बीमारियों के 58,318 प्रकोपों का विश्लेषण, स्वास्थ्य केंद्रों से दूरी के कारण भी छिप सकते हैं संक्रमण के मामले।
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जंगलों की कटाई
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
जंगलों की कटाई, खेती और बस्तियों का विस्तार तथा प्राकृतिक पर्यावरण में बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप अब केवल प्रकृति के लिए ही खतरा नहीं है। इससे संक्रामक बीमारियों के फैलने का भूगोल भी बदल रहा है और भविष्य में बड़े स्वास्थ्य संकटों की आशंका बढ़ रही है। इंसानों, वन्यजीवों और बीमारी फैलाने वाले जीवों के बीच बदलते संबंध इस खतरे को और जटिल बना रहे हैं। दुनिया के 169 देशों में 32 संक्रामक बीमारियों के 58,318 प्रकोपों के विश्लेषण पर आधारित एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है।
नेचर में प्रकाशित इस शोध में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन सहित विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों ने पाया कि मानवीय गतिविधियां बीमारियों के फैलाव को प्रभावित कर रही हैं, लेकिन हर बीमारी के पीछे पर्यावरणीय कारण एक जैसे नहीं हैं। जंगल जब सड़कों, खेतों और बस्तियों के विस्तार के कारण छोटे-छोटे हिस्सों में बंट जाते हैं, तो वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास बदलने लगते हैं। इससे कुछ जीव इंसानी बस्तियों और खेती वाले इलाकों के करीब आ सकते हैं। ऐसे में इंसानों, मवेशियों और वन्यजीवों के बीच संपर्क बढ़ने से जानवरों में मौजूद रोगाणुओं के इंसानों तक पहुंचने की आशंका भी बढ़ सकती है।
जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों को जूनोटिक रोग कहा जाता है। कोविड-19, इबोला और एमपॉक्स ऐसी बीमारियों के प्रमुख उदाहरण हैं। हालांकि, जंगलों की कटाई या किसी एक पर्यावरणीय बदलाव को हर बीमारी के प्रकोप का सीधा कारण नहीं माना जा सकता। अध्ययन बताता है कि अलग-अलग बीमारियां पर्यावरण में होने वाले बदलावों से अलग-अलग तरह से प्रभावित होती हैं। इसलिए किसी एक उपाय से सभी संक्रामक बीमारियों के खतरे को कम करना संभव नहीं है।शोध में मच्छरों, किलनी और पिस्सू जैसे जीवों के जरिये फैलने वाली बीमारियों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण संकेत मिले हैं।
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वैज्ञानिकों ने पाया कि प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के अधिक खंडित होने और लंबे समय तक बारिश में गिरावट वाले क्षेत्रों में डेंगू तथा जीका जैसी बीमारियों के प्रकोप का जोखिम अधिक पाया गया।बारिश और तापमान में बदलाव बीमारी फैलाने वाले जीवों के रहने, पनपने और फैलने की परिस्थितियों को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं, प्राकृतिक आवासों में बदलाव इंसानों और इन जीवों के बीच संपर्क के अवसर बढ़ा सकता है। हालांकि, बारिश में कमी आने का मतलब हर क्षेत्र में बीमारी का खतरा बढ़ना नहीं है।इसका असर स्थानीय पर्यावरण, बीमारी फैलाने वाले जीवों और दूसरी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।इसलिए वैज्ञानिकों का जोर ऐसे आंकड़े जुटाने पर है, जिनसे अलग-अलग क्षेत्रों में बीमारियों के जोखिम और उनके पीछे काम कर रहे पर्यावरणीय कारणों को बेहतर ढंग से समझा जा सके। इससे बीमारी के संभावित प्रकोप वाले इलाकों की पहचान करने और समय रहते बचाव की तैयारी करने में मदद मिल सकती है।
अस्पताल से दूरी, तो प्रकोप का पता लगने में देरी
अध्ययन का एक अहम निष्कर्ष स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच से जुड़ा है। शोधकर्ताओं के अनुसार, निकटतम स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने में यात्रा का समय हर एक घंटा बढ़ने पर किसी उभरती संक्रामक बीमारी के प्रकोप की रिपोर्ट दर्ज होने की संभावना औसतन 32 फीसदी कम हो जाती है।इसका अर्थ यह है कि दूरदराज के इलाकों में संक्रमण फैलने के बावजूद उसके समय पर सामने आने की संभावना कम हो सकती है। अस्पतालों, जांच सुविधाओं और निगरानी व्यवस्था की कमी के कारण बीमारी के वास्तविक प्रसार का पता देर से चल सकता है। लिहाजा, किसी क्षेत्र में प्रकोप की कम रिपोर्ट दर्ज होने को वहां संक्रमण का कम खतरा होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि शुरुआती चरण में संक्रमण की पहचान न होने पर बीमारी के फैलाव को रोकना मुश्किल हो सकता है। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाना और स्थानीय स्तर पर निगरानी मजबूत करना महामारी की आशंका को कम करने के लिए जरूरी है।
इंसान, जानवर और पर्यावरण की सेहत एक-दूसरे से जुड़ी
अध्ययन से जुड़ी फ्लोरिडा विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सैडी रयान के मुताबिक, जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों के पीछे कई परस्पर जुड़े कारण काम करते हैं। इन्हें इंसानों, जानवरों और पर्यावरण के संबंधों से अलग करके नहीं समझा जा सकता। इसी वजह से वन हेल्थ यानी एकीकृत स्वास्थ्य दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। इसमें इंसानों, जानवरों और पर्यावरण की सेहत को एक-दूसरे से जुड़ा मानकर बीमारी की निगरानी और रोकथाम की योजना बनाई जाती है।यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के प्रमुख शोधकर्ता रॉरी गिब के अनुसार कोई एक पर्यावरणीय बदलाव यह नहीं बता सकता कि उभरती संक्रामक बीमारियों का प्रकोप कहां होगा। इसलिए बीमारी के प्रकार और क्षेत्र के हिसाब से जोखिम का आकलन करना जरूरी है।
महामारी का बचाव केवल टीकों तक सीमित नहीं
अध्ययन के अनुसार महामारी से बचाव की तैयारी केवल अस्पतालों, दवाओं और टीकों तक सीमित नहीं रह सकती। इसके लिए प्राकृतिक आवासों की रक्षा, पर्यावरणीय बदलावों की निगरानी, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और देशों के बीच बेहतर समन्वय भी जरूरी है। बीमारी के खतरे को समय रहते पहचानना ही किसी स्थानीय प्रकोप को बड़े स्वास्थ्य संकट में बदलने से रोकने की दिशा में अहम कदम हो सकता है।
सेहत का एक ही चक्र
जंगलों का विनाश → वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सिमटते हैं।
इंसानों से बढ़ता संपर्क → जानवरों और इंसानों के बीच रोगाणुओं के पहुंचने की आशंका बढ़ती है।
पर्यावरण में बदलाव → मच्छरों जैसे बीमारी फैलाने वाले जीवों के पनपने की परिस्थितियां बदलती हैं।
संक्रमण का बढ़ता जोखिम → नई संक्रामक बीमारियों के प्रकोप और महामारी का खतरा बढ़ता है।
बचाव का रास्ता → जंगलों की रक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और इंसानों, जानवरों व पर्यावरण की एक साथ निगरानी।
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नेचर में प्रकाशित इस शोध में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन सहित विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों ने पाया कि मानवीय गतिविधियां बीमारियों के फैलाव को प्रभावित कर रही हैं, लेकिन हर बीमारी के पीछे पर्यावरणीय कारण एक जैसे नहीं हैं। जंगल जब सड़कों, खेतों और बस्तियों के विस्तार के कारण छोटे-छोटे हिस्सों में बंट जाते हैं, तो वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास बदलने लगते हैं। इससे कुछ जीव इंसानी बस्तियों और खेती वाले इलाकों के करीब आ सकते हैं। ऐसे में इंसानों, मवेशियों और वन्यजीवों के बीच संपर्क बढ़ने से जानवरों में मौजूद रोगाणुओं के इंसानों तक पहुंचने की आशंका भी बढ़ सकती है।
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जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों को जूनोटिक रोग कहा जाता है। कोविड-19, इबोला और एमपॉक्स ऐसी बीमारियों के प्रमुख उदाहरण हैं। हालांकि, जंगलों की कटाई या किसी एक पर्यावरणीय बदलाव को हर बीमारी के प्रकोप का सीधा कारण नहीं माना जा सकता। अध्ययन बताता है कि अलग-अलग बीमारियां पर्यावरण में होने वाले बदलावों से अलग-अलग तरह से प्रभावित होती हैं। इसलिए किसी एक उपाय से सभी संक्रामक बीमारियों के खतरे को कम करना संभव नहीं है।शोध में मच्छरों, किलनी और पिस्सू जैसे जीवों के जरिये फैलने वाली बीमारियों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण संकेत मिले हैं।
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वैज्ञानिकों ने पाया कि प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के अधिक खंडित होने और लंबे समय तक बारिश में गिरावट वाले क्षेत्रों में डेंगू तथा जीका जैसी बीमारियों के प्रकोप का जोखिम अधिक पाया गया।बारिश और तापमान में बदलाव बीमारी फैलाने वाले जीवों के रहने, पनपने और फैलने की परिस्थितियों को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं, प्राकृतिक आवासों में बदलाव इंसानों और इन जीवों के बीच संपर्क के अवसर बढ़ा सकता है। हालांकि, बारिश में कमी आने का मतलब हर क्षेत्र में बीमारी का खतरा बढ़ना नहीं है।इसका असर स्थानीय पर्यावरण, बीमारी फैलाने वाले जीवों और दूसरी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।इसलिए वैज्ञानिकों का जोर ऐसे आंकड़े जुटाने पर है, जिनसे अलग-अलग क्षेत्रों में बीमारियों के जोखिम और उनके पीछे काम कर रहे पर्यावरणीय कारणों को बेहतर ढंग से समझा जा सके। इससे बीमारी के संभावित प्रकोप वाले इलाकों की पहचान करने और समय रहते बचाव की तैयारी करने में मदद मिल सकती है।
अस्पताल से दूरी, तो प्रकोप का पता लगने में देरी
अध्ययन का एक अहम निष्कर्ष स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच से जुड़ा है। शोधकर्ताओं के अनुसार, निकटतम स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने में यात्रा का समय हर एक घंटा बढ़ने पर किसी उभरती संक्रामक बीमारी के प्रकोप की रिपोर्ट दर्ज होने की संभावना औसतन 32 फीसदी कम हो जाती है।इसका अर्थ यह है कि दूरदराज के इलाकों में संक्रमण फैलने के बावजूद उसके समय पर सामने आने की संभावना कम हो सकती है। अस्पतालों, जांच सुविधाओं और निगरानी व्यवस्था की कमी के कारण बीमारी के वास्तविक प्रसार का पता देर से चल सकता है। लिहाजा, किसी क्षेत्र में प्रकोप की कम रिपोर्ट दर्ज होने को वहां संक्रमण का कम खतरा होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि शुरुआती चरण में संक्रमण की पहचान न होने पर बीमारी के फैलाव को रोकना मुश्किल हो सकता है। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाना और स्थानीय स्तर पर निगरानी मजबूत करना महामारी की आशंका को कम करने के लिए जरूरी है।
इंसान, जानवर और पर्यावरण की सेहत एक-दूसरे से जुड़ी
अध्ययन से जुड़ी फ्लोरिडा विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सैडी रयान के मुताबिक, जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों के पीछे कई परस्पर जुड़े कारण काम करते हैं। इन्हें इंसानों, जानवरों और पर्यावरण के संबंधों से अलग करके नहीं समझा जा सकता। इसी वजह से वन हेल्थ यानी एकीकृत स्वास्थ्य दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। इसमें इंसानों, जानवरों और पर्यावरण की सेहत को एक-दूसरे से जुड़ा मानकर बीमारी की निगरानी और रोकथाम की योजना बनाई जाती है।यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के प्रमुख शोधकर्ता रॉरी गिब के अनुसार कोई एक पर्यावरणीय बदलाव यह नहीं बता सकता कि उभरती संक्रामक बीमारियों का प्रकोप कहां होगा। इसलिए बीमारी के प्रकार और क्षेत्र के हिसाब से जोखिम का आकलन करना जरूरी है।
महामारी का बचाव केवल टीकों तक सीमित नहीं
अध्ययन के अनुसार महामारी से बचाव की तैयारी केवल अस्पतालों, दवाओं और टीकों तक सीमित नहीं रह सकती। इसके लिए प्राकृतिक आवासों की रक्षा, पर्यावरणीय बदलावों की निगरानी, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और देशों के बीच बेहतर समन्वय भी जरूरी है। बीमारी के खतरे को समय रहते पहचानना ही किसी स्थानीय प्रकोप को बड़े स्वास्थ्य संकट में बदलने से रोकने की दिशा में अहम कदम हो सकता है।
सेहत का एक ही चक्र
जंगलों का विनाश → वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सिमटते हैं।
इंसानों से बढ़ता संपर्क → जानवरों और इंसानों के बीच रोगाणुओं के पहुंचने की आशंका बढ़ती है।
पर्यावरण में बदलाव → मच्छरों जैसे बीमारी फैलाने वाले जीवों के पनपने की परिस्थितियां बदलती हैं।
संक्रमण का बढ़ता जोखिम → नई संक्रामक बीमारियों के प्रकोप और महामारी का खतरा बढ़ता है।
बचाव का रास्ता → जंगलों की रक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और इंसानों, जानवरों व पर्यावरण की एक साथ निगरानी।