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'आकाश' से होगी पाक-चीन सीमा की रखवाली, 3300 करोड़ रुपये की रक्षा खरीद को मंजूरी

Mon, 21 Oct 2019 02:35 PM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Sneha Baluni Updated Mon, 21 Oct 2019 02:35 PM IST
सार

  • 15,000 फीट की ऊंचाई पर तैनात होंगी उन्नत किस्म की मिसाइलें, सेना ने दिया प्रस्ताव
  • 10,000 करोड़ रुपये की मिसाइलों की दो रेजिमेंट की खरीद पर विचार करेगा रक्षा मंत्रालय
  • मेक इन इंडिया के तहत निर्मित होंगी आकाश की नई रेजिमेंट

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Defence Ministry set to discuss proposal acquiring Akash missiles for deployment at pak china border
आकाश मिसाइल (फाइल फोटो) - फोटो : ANI

विस्तार

चीन और पाकिस्तान से लगती पहाड़ी सीमाओं से दुश्मन के विमानों की भारत में घुसपैठ से रोकने के लिए सरकार ने कमर कस ली है। रक्षा मंत्रालय ने देश के आकाश प्राइम मिसाइलों की दो रेजीमेंटों को हासिल करने के प्रस्ताव पर चर्चा के लिए तैयारी कर ली है। इन आकाश मिसाइलों की 15,000 फीट की ऊंचाई पर तैनाती की जाएगी। इनका प्रदर्शन अपने पूर्ववर्ती मिसाइलों की तुलना में बेहतर होगा। इन्हें लद्दाख जैसे संवेदनशील ऊंचे स्थानों पर तैनात किया जाएगा, जहां इसकी सीमा पाकिस्तान और चीन दोनों से लगती है।

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सरकार के सूत्रों ने बताया कि रक्षा मंत्रालय तकरीबन 10,000 करोड़ रुपये की उन्नत आकाश हवाई रक्षा मिसाइलों की दो रेजिमेंटों की खरीद के सेना के प्रस्ताव पर विचार करेगा। ये मिसाइलें सेना में पहले से मौजूद मिसाइलें का अत्याधुनिक संस्करण होंगी। इस प्रस्ताव पर रक्षा अधिग्रहण परिषद की बैठक में चर्चा होनी है। लद्दाख से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह एवं सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के लौटने के बाद परिषद की बैठक में चर्चा होने के आसार हैं।

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सेना के लिए सफल और उपयुक्त है आकाश

देश के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने आकाश मिसाइलों का निर्माण किया था और रक्षा बलों ने इसे काफी सफल और उपयुक्त माना है। सेना के पास पहले से ही आकाश मिसाइल की दो रेजीमेंट हैं। सेना चाहती है कि आकाश की दो नई रेजिमेंटों को पाकिस्तान और चीन की सीमा पर तैनाती हो। सेना को मिसाइल सिस्टम की सर्विस को लेकर कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि इसका उत्पादन दो कंपनियां भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और भारत डायनामिक्स लिमिटेड करती हैं। इसके बावजूद सेना मिसाइलों के प्रदर्शन को लेकर बेहद संतुष्ट है।

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मेक इन इंडिया के तहत निर्मित होंगी आकाश की नई रेजिमेंट

आकाश मिसाइलों की नई रेजिमेंट के प्रस्ताव कोे रक्षा के क्षेत्र में मेक इन इंडिया को मजबूती देने के लिए भी बड़ी पहल माना जा रहा है। पहले इन मिसाइलों के उत्पादन का ऑर्डर विदेशी कंपनियों को दिया जाना था, मगर नरेंद्र मोदी सरकार ने स्वदेश में इन मिसाइलों का उत्पादन किए जाने के पक्ष में फैसला किया। हाल ही में पीएम मोदी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय मंत्रिमंडल की सुरक्षा संबंधी समिति ने वायुसेना के लिए सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों के सात स्क्वॉड्रन खरीदने की परियोजना को मंजूरी दी।

एकसाथ दुश्मन के 40 ठिकानों को नेस्तनाबूद कर सकती हैं ये मिसाइलें

आकाश मध्यम रेंज की जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल है। यह हवा में उड़ रहे लक्ष्यों को मार गिराने में सक्षम है। यह मिसाइल युद्धक विमान, क्रूज मिसाइल, हवा से जमीन में मार करने वाली मिसाइल और बैलेस्टिक मिसाइलों को निशाना बना सकती है। आकाश मिसाइलें ध्वनि की गति से ढाई गुना तेजी के साथ लक्ष्य तबाह कर सकती हैं। विशेष रडार सिस्टम और युद्धक सामग्रियों से लैस ये मिसाइलें एक साथ दुश्मनों के 40 लक्ष्यों को ट्रैक कर सकती है और सतह से हवा में 30 किमी की दूरी पर दुश्मन के ठिकानों को नेस्तनाबूद कर सकती हैं। 
 

टैंक भेदी मिसाइलों समेत 3,300 करोड़ रुपये की रक्षा खरीद को मंजूरी

रक्षा मंत्रालय ने सोमवार को 3,300 करोड़ रुपये से अधिक की रक्षा खरीद को मंजूरी दे दी है। इसमें भारत में बनी टैंक भेदी गाइडेड मिसाइलें शामिल है, जो दुश्मन के टैंकों को नेस्तनाबूद करने में सक्षम हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद की बैठक में यह मंजूरी दी गई। इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया के अनुरूप भारत में स्वदेशी निजी कंपनियों द्वारा रक्षा उपकरणों के डिजाइन, विकास और निर्माण के लिए तीन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई।



इन परियोजनाओं के तहत तीसरी पीढ़ी के एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल टी-72 और टी-90 टैंकों के लिए सहायक विद्युत इकाइयों का निर्माण शामिल है। तीसरी परियोजना के तहत पहाड़ और ऊंचाई वाले इलाकों के लिए इलेक्ट्रॉनिक युद्धक प्रणालियों को लगाया जाना है। इन एंटी टैंक मिसाइलों से भारतीय टैंकों की मारक क्षमता में इजाफा होगा। इससे टैंक के फायर कंट्रोल सिस्टम और रात को लड़ने की क्षमता में बढ़ोतरी होगी। इलेक्ट्रॉनिक युद्धक प्रणालियों का विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) करेगा।
 

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