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Climate Change: रातें अधिक गर्म हुईं और तपिश वाले दिन भी बढ़े, गर्मी के चलते घट सकती है काम करने की क्षमता
Fri, 28 Jun 2024 05:30 PM IST
शिवेंद्र तिवारी
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Fri, 28 Jun 2024 05:30 PM IST
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सार
Climate Change: क्लाइमेट ट्रेंड्स के एक नए अध्ययन में आशंका जाहिर की गई है कि भारत निरंतर जलवायु परिवर्तन से गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है। रिपोर्ट का दावा है कि 21वीं सदी के अंत तक भारत में औसत तापमान लगभग 4.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ सकता है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि रात के समय गर्मियों का तापमान बढ़ा है और गर्म दिन भी बढ़े हैं।
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जलवायु परिवर्तन
- फोटो :
AMAR UJALA
विस्तार
दिल्ली-एनसीआर समेत देश के अनेक हिस्स्सों में शुक्रवार को मौसम ने करवट ली। कई इलाकों में तेज हवा के साथ बारिश हुई, जिससे लोगों को प्रचंड गर्मी से काफी राहत मिली है। लेकिन बारिश राहत के संग आफत भी लेकर आई है। कुछ जगहों पर जलभराव और जाम से लोग परेशान दिखे।जिन जगहों पर बारिश नहीं हो रही है या कम हुई वहां लोग गर्मी से काफी परेशान हैं। इसी गर्मी ने राजधानी दिल्ली को जल संकट में डाल दिया। इस गर्मी के दौरान कई जगहों पर पारा 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। इस बीच, क्लाइमेट सेंट्रल और क्लाइमेट ट्रेंड्स की नई रिपोर्ट्स बताती हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में रातें लगातार गर्म होती जा रही हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हर साल लगभग 50 से 80 रातें ऐसी हो गई हैं, जब रात का तापमान अधिक बना हुआ है। रिपोर्ट से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन ने रात के तापमान को काफी हद तक प्रभावित किया है, जिससे यह 25 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला गया है।
आइये जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के बारे में रिपोर्ट क्या आई हैं? तापमान कौन बढ़ रहा है? रातें क्यों गर्म हो रही हैं? भारत में जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित शहर कौन से हैं? जलवायु परिवर्तन का असर कहां-कहां हो रहा है?
जलवायु परिवर्तन से बढ़ीं आपदाएं
- फोटो :
पीटीआई
जलवायु परिवर्तन के बारे में रिपोर्ट क्या है?
बढ़ती आबादी के साथ भारत निरंतर जलवायु परिवर्तन से गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है। यह आशंका क्लाइमेट ट्रेंड्स के एक नए अध्ययन में जाहिर की गई है। वैश्विक जलवायु से जुड़े अनुमान भारत की भविष्य की जलवायु स्थितियों के लिए कई अनिश्चितताओं का संकेत देते हैं।
मौसम संबंधी परिस्थितियां बताती हैं कि आने वाले समय में भारतीय उपमहाद्वीप में औसत वार्षिक तापमान बढ़ सकता है। रिपोर्ट का दावा है कि 1901-2018 के दौरान भारत का औसत तापमान लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। वहीं 21वीं सदी के अंत तक भारत में औसत तापमान लगभग 4.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ सकता है। एक आकलन के अनुसार, हाल के 30 वर्षों में (1986-2015) में वर्ष के सबसे गर्म दिन के तापमान में लगभग 0.63 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। 21वीं सदी के अंत तक इन तापमानों में लगभग 4.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने की आशंका है।
वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन अध्ययन (2024) में पाया गया है कि मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के चलते 21वीं सदी के अंत तक गर्म दिनों और गर्म रातों की आवृत्तियों में क्रमशः 55% और 70% की वृद्धि हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उष्णकटिबंधीय चक्रवातों को छोड़कर, भारत में अन्य प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में हीट वेव ने अधिक लोगों की जान ली है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2000-2019 के बीच हीट वेव के कारण मृत्यु दर में 62.2% की वृद्धि हुई है।
बढ़ती आबादी के साथ भारत निरंतर जलवायु परिवर्तन से गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है। यह आशंका क्लाइमेट ट्रेंड्स के एक नए अध्ययन में जाहिर की गई है। वैश्विक जलवायु से जुड़े अनुमान भारत की भविष्य की जलवायु स्थितियों के लिए कई अनिश्चितताओं का संकेत देते हैं।
मौसम संबंधी परिस्थितियां बताती हैं कि आने वाले समय में भारतीय उपमहाद्वीप में औसत वार्षिक तापमान बढ़ सकता है। रिपोर्ट का दावा है कि 1901-2018 के दौरान भारत का औसत तापमान लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। वहीं 21वीं सदी के अंत तक भारत में औसत तापमान लगभग 4.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ सकता है। एक आकलन के अनुसार, हाल के 30 वर्षों में (1986-2015) में वर्ष के सबसे गर्म दिन के तापमान में लगभग 0.63 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। 21वीं सदी के अंत तक इन तापमानों में लगभग 4.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने की आशंका है।
वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन अध्ययन (2024) में पाया गया है कि मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के चलते 21वीं सदी के अंत तक गर्म दिनों और गर्म रातों की आवृत्तियों में क्रमशः 55% और 70% की वृद्धि हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उष्णकटिबंधीय चक्रवातों को छोड़कर, भारत में अन्य प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में हीट वेव ने अधिक लोगों की जान ली है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2000-2019 के बीच हीट वेव के कारण मृत्यु दर में 62.2% की वृद्धि हुई है।
मानसून अलर्ट प्रतीकात्मक
- फोटो :
अमर उजाला
मानसून के पैटर्न में काफी बदलाव
जून से सितंबर तक रहने वाला दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत में वार्षिक वर्षा का 80% हिस्सा होता है। मानव-जनित जलवायु परिवर्तन ने पिछले कुछ वर्षों में मौसम के पैटर्न को बदल दिया है, जिसके कारण अनियमित मौसम की स्थिति पैदा हुई है। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में ग्रीष्मकालीन मानसून वर्षा में 1951 से 2015 तक लगभग 6% की गिरावट आई है। खास तौर पर सिंधु-गंगा के मैदानों और पश्चिमी घाटों पर ग्रीष्मकालीन मानसून वर्षा में काफी कमी देखी गई है।
जून से सितंबर तक रहने वाला दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत में वार्षिक वर्षा का 80% हिस्सा होता है। मानव-जनित जलवायु परिवर्तन ने पिछले कुछ वर्षों में मौसम के पैटर्न को बदल दिया है, जिसके कारण अनियमित मौसम की स्थिति पैदा हुई है। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में ग्रीष्मकालीन मानसून वर्षा में 1951 से 2015 तक लगभग 6% की गिरावट आई है। खास तौर पर सिंधु-गंगा के मैदानों और पश्चिमी घाटों पर ग्रीष्मकालीन मानसून वर्षा में काफी कमी देखी गई है।
तापमान
- फोटो :
अमर उजाला
रात के समय गर्मियों का तापमान बढ़ रहा और गर्म दिन भी बढ़ रहे
क्लाइमेट सेंट्रल की 'स्लीपलेस नाइट्स' में दावा किया गया है कि देश के कई हिस्सों में रात के समय गर्मियों का तापमान अक्सर पूरी गर्मी में 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता है। गंगटोक, दार्जिलिंग, शिमला और मैसूर ऐसे शहर हैं जिनमें सबसे अधिक दिन न्यूनतम तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा। जलवायु परिवर्तन के कारण इन शहरों में क्रमशः औसतन 54, 31, 30 और 26 दिन तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक दर्ज किया गया। तुमकुर, हासन, बंगलूरु और पठानकोट में 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाले 15 से 22 दिन बढ़े, जबकि सोपुर, श्रीनगर, मंड्या, देहरादून, शिमोगा, जम्मू और हिंदूपुर में 2 से 7 दिन ऐसी स्थिति देखी गई।
सबसे अधिक प्रभावित शहर पश्चिम बंगाल और असम के जलपाईगुड़ी, गुवाहाटी, सिलचर, डिब्रूगढ़, सिलीगुड़ी हैं, जहां जलवायु परिवर्तन के कारण औसतन 80 से 86 दिन अधिक तापमान बढ़ा है। केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पंजाब, जम्मू-कश्मीर और आंध्र प्रदेश के शहरों में जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग 50 से 80 दिन अधिक तापमान बढ़ा है। मुंबई जैसे महानगर में अतिरिक्त 65 दिन तापमान में बढ़ोतरी हुई है। देश भर के कई शहरों में 15 से 50 ऐसे अतिरिक्त दिन देखे गए, जहां न्यूनतम तापमान 25 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा। राजस्थान की राजधनी जयपुर में जलवायु परिवर्तन के कारण अतिरिक्त 19 दिन तापमान बढ़ा है। इसके अलावा लखनऊ, कोलकाता और अहमदाबाद जैसे अन्य बड़े शहरों में न्यूनतम ग्रीष्मकालीन तापमान लगभग 25 डिग्री सेल्सियस से अधिक है।
क्लाइमेट सेंट्रल की 'स्लीपलेस नाइट्स' में दावा किया गया है कि देश के कई हिस्सों में रात के समय गर्मियों का तापमान अक्सर पूरी गर्मी में 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता है। गंगटोक, दार्जिलिंग, शिमला और मैसूर ऐसे शहर हैं जिनमें सबसे अधिक दिन न्यूनतम तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा। जलवायु परिवर्तन के कारण इन शहरों में क्रमशः औसतन 54, 31, 30 और 26 दिन तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक दर्ज किया गया। तुमकुर, हासन, बंगलूरु और पठानकोट में 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाले 15 से 22 दिन बढ़े, जबकि सोपुर, श्रीनगर, मंड्या, देहरादून, शिमोगा, जम्मू और हिंदूपुर में 2 से 7 दिन ऐसी स्थिति देखी गई।
सबसे अधिक प्रभावित शहर पश्चिम बंगाल और असम के जलपाईगुड़ी, गुवाहाटी, सिलचर, डिब्रूगढ़, सिलीगुड़ी हैं, जहां जलवायु परिवर्तन के कारण औसतन 80 से 86 दिन अधिक तापमान बढ़ा है। केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पंजाब, जम्मू-कश्मीर और आंध्र प्रदेश के शहरों में जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग 50 से 80 दिन अधिक तापमान बढ़ा है। मुंबई जैसे महानगर में अतिरिक्त 65 दिन तापमान में बढ़ोतरी हुई है। देश भर के कई शहरों में 15 से 50 ऐसे अतिरिक्त दिन देखे गए, जहां न्यूनतम तापमान 25 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा। राजस्थान की राजधनी जयपुर में जलवायु परिवर्तन के कारण अतिरिक्त 19 दिन तापमान बढ़ा है। इसके अलावा लखनऊ, कोलकाता और अहमदाबाद जैसे अन्य बड़े शहरों में न्यूनतम ग्रीष्मकालीन तापमान लगभग 25 डिग्री सेल्सियस से अधिक है।
प्रयागराज में तापमान।
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अमर उजाला
जलवायु परिवर्तन का असर हम पर क्या हो रहा है?
जलवायु परिवर्तन के चलते हम पर चौतरफा असर पड़ रहा है। क्लाइमेट ट्रेंड्स के एक अध्ययन का दावा है कि लू पहले से ही मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है। मानव त्वचा आमतौर पर 35 डिग्री सेल्सियस के आसपास होती है, और जब यह पसीना बहाती है तो यह शरीर के गर्म हिस्से से गर्मी खींचती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि लगभग छह घंटे से ज्यादा समय तक 35 डिग्री सेल्सियस के तापमान के संपर्क में रहना, स्वस्थ मनुष्यों के लिए भी घातक है।
रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 32 डिग्री सेल्सियस TW (वेट-बल्ब तापमान) पर, स्वस्थ, गर्मी के अनुकूल लोगों के लिए भी काम करना असंभव हो जाता है। TW 26 डिग्री सेल्सियस पर भी बुजुर्ग लोग, श्वसन, हृदय या गुर्दे की समस्या वाले लोग, बुजुर्ग और अधिक गतिविधि करने वाले लोग गंभीर या घातक हीट स्ट्रोक के जोखिम में रहते हैं।
जलवायु परिवर्तन के चलते हम पर चौतरफा असर पड़ रहा है। क्लाइमेट ट्रेंड्स के एक अध्ययन का दावा है कि लू पहले से ही मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है। मानव त्वचा आमतौर पर 35 डिग्री सेल्सियस के आसपास होती है, और जब यह पसीना बहाती है तो यह शरीर के गर्म हिस्से से गर्मी खींचती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि लगभग छह घंटे से ज्यादा समय तक 35 डिग्री सेल्सियस के तापमान के संपर्क में रहना, स्वस्थ मनुष्यों के लिए भी घातक है।
रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 32 डिग्री सेल्सियस TW (वेट-बल्ब तापमान) पर, स्वस्थ, गर्मी के अनुकूल लोगों के लिए भी काम करना असंभव हो जाता है। TW 26 डिग्री सेल्सियस पर भी बुजुर्ग लोग, श्वसन, हृदय या गुर्दे की समस्या वाले लोग, बुजुर्ग और अधिक गतिविधि करने वाले लोग गंभीर या घातक हीट स्ट्रोक के जोखिम में रहते हैं।
श्रम
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Istock
गर्मी के चलते उत्पादकता घट सकती है
अध्ययन के अनुसार, बढ़ते तापमान के चलते उत्पादकता में कमी और श्रम घंटों की संख्या में कमी हो सकती है। यदि वेट बल्ब ग्लोब तापमान वैश्विक स्तर पर 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो वैश्विक श्रम क्षमता 80% से गिरकर लगभग 70% तक हो सकती है, जबकि 4 डिग्री सेल्सियस पर यह और गिरकर 60% से कम हो जाती है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में क्षमता में गिरावट और भी अधिक होगी। यह परिस्थिति सीधे श्रमिकों द्वारा उत्पादित सकल उत्पादन को प्रभावित करती है और देश के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बनती है। रिपोर्ट की मानें तो 2030 में राष्ट्रीय स्तर पर जीडीपी घाटे में काफी वृद्धि हो सकती है, जिसमें भारत में जीडीपी में 5 प्रतिशत से अधिक की कमी होने की आशंका है।
नवीनतम शोध से पता चलता है देशभर में शहर शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन के मिश्रित प्रभावों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं। शोध का दावा है कि भारत के शहरों में गर्मी की प्रवृत्ति के लिए अकेले शहरीकरण ही 60% जिम्मेदार है।
अध्ययन के अनुसार, बढ़ते तापमान के चलते उत्पादकता में कमी और श्रम घंटों की संख्या में कमी हो सकती है। यदि वेट बल्ब ग्लोब तापमान वैश्विक स्तर पर 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो वैश्विक श्रम क्षमता 80% से गिरकर लगभग 70% तक हो सकती है, जबकि 4 डिग्री सेल्सियस पर यह और गिरकर 60% से कम हो जाती है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में क्षमता में गिरावट और भी अधिक होगी। यह परिस्थिति सीधे श्रमिकों द्वारा उत्पादित सकल उत्पादन को प्रभावित करती है और देश के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बनती है। रिपोर्ट की मानें तो 2030 में राष्ट्रीय स्तर पर जीडीपी घाटे में काफी वृद्धि हो सकती है, जिसमें भारत में जीडीपी में 5 प्रतिशत से अधिक की कमी होने की आशंका है।
नवीनतम शोध से पता चलता है देशभर में शहर शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन के मिश्रित प्रभावों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं। शोध का दावा है कि भारत के शहरों में गर्मी की प्रवृत्ति के लिए अकेले शहरीकरण ही 60% जिम्मेदार है।
समुद्र तट
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एएनआई
कृषि और समुद्र स्तर पर भी असर
भारत में कृषि पर लू का काफी असर हो सकता है। इससे खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका पर संभावित रूप से गंभीर परिणाम हो सकते हैं। फसल की विफलता, मिट्टी की नमी में कमी, कीटों का प्रकोप, पशुधन का खराब स्वास्थ्य और पानी की कमी जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।
भारत भूमध्य रेखा के करीब है, इसलिए उपमहाद्वीप में समुद्र के स्तर में बहुत अधिक वृद्धि देखी जाएगी। समुद्र के स्तर में अधिक वृद्धि संभवतः वायुमंडल और महासागरों के गर्म होने के कारण हुई है। ग्लोबल वार्मिंग ने भारतीय समुद्रों में समुद्र के स्तर में 10%-15% की वृद्धि की है। भारी वर्षा के साथ मिलकर यह नुकसान को और बढ़ा सकता है।
भारत में कृषि पर लू का काफी असर हो सकता है। इससे खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका पर संभावित रूप से गंभीर परिणाम हो सकते हैं। फसल की विफलता, मिट्टी की नमी में कमी, कीटों का प्रकोप, पशुधन का खराब स्वास्थ्य और पानी की कमी जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।
भारत भूमध्य रेखा के करीब है, इसलिए उपमहाद्वीप में समुद्र के स्तर में बहुत अधिक वृद्धि देखी जाएगी। समुद्र के स्तर में अधिक वृद्धि संभवतः वायुमंडल और महासागरों के गर्म होने के कारण हुई है। ग्लोबल वार्मिंग ने भारतीय समुद्रों में समुद्र के स्तर में 10%-15% की वृद्धि की है। भारी वर्षा के साथ मिलकर यह नुकसान को और बढ़ा सकता है।