सीआरपीएफ मुख्यालय ने अपने अफसरों और जवानों से बनाई दूरी, आला अफसरों से मिलना हुआ मुश्किल...
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देश के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ के अफसरों और जवानों के बीच दूरियां बढ़ गई है। दूर-दराज के क्षेत्रों में बैठे अफसर और जवान मुख्यालय में बैठे आला अफसरों से अपनी परेशानी, दुख-दर्द या कोई दूसरी अहम बात जो बल के मनोबल के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं, सामने सीधेतौर पर अपनी बात नहीं रख सकेंगे।
जवान अब केवल विषम परिस्थितियों जैसे, मेडिकल आधार आदि के मामले में ही मुख्यालय आ सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें कई औपचारिक बाधाएं पार करनी होंगी। सीआरपीएफ मुख्यालय ने सभी सक्षम अफसरों, जिनमें स्पेशल डीजी, एडीशनल डीजी, आईजी, डीआईजी और कमांडेंट शामिल हैं, को निर्देश जारी कर दिया गया है। वे सुनिश्चित करेंगे कि कोई अफसर सीधे मुख्यालय में न आने पाए। खासतौर पर वे जिनका मामला किसी न किसी स्तर पर जोन और क्षेत्र में चल रहा हो।
सीआरपीएफ के आईजी (पर्सनल) अतुल करवाल द्वारा चार अक्तूबर को जारी किए गए पत्र के मुताबिक, बल में सहायक कमांडेंट या उससे ऊपर का कोई अधिकारी सीधे तौर पर अपनी बात कहने के लिए मुख्यालय नहीं आ सकेगा। उसे अपने कमांडेंट या डीआईजी से पहले बात करनी होगी।
अगर वे उचित समझेंगे तो ही संबंधित अधिकारी को मुख्यालय में आने की इजाजत मिलेगी। यहां पर इस बात का उल्लेख करना बहुत जरूरी है कि सक्षम अधिकारी आसानी से किसी शिकायतकर्ता को आला अधिकारियों के पास नहीं भेज सकता। अनुशासन का मामला होने के कारण उसे सदैव ऊपर से यह डर रहता है कि यदि उसने अपने मातहत किसी अधिकारी का केस मुख्यालय के लिए मंजूर कर दिया तो उसे आला अफसरों का क्रोध झेलना पड़ेगा।
सीआरपीएफ के एक अधिकारी का कहना है कि इसी वजह से कोई केस जायज होते हुए भी ऊपर नहीं भेजा जाएगा। पत्र में साफ लिखा है कि कोई भी अधिकारी, जिसके तबादले की मांग या अन्य कोई व्यक्तिगत शिकायत से संबंध है, यदि वह मामला किसी भी जोन के अधिकारी के समक्ष चल रहा है तो उसे मुख्यालय के लिए न भेजा जाए। केवल वही अधिकारी मुख्यालय आए, जिसका जोन परिवर्तन का केस हो। जैसे सीआरपीएफ में चार जोन हैं।
किसी अधिकारी को एक जोन से दूसरे जोन में तबादला कराना है तो वही नीचे के अधिकारी की मंजूरी के बाद मुख्यालय आ सकता है। इसके लिए भी उसे अनेक तरह के दस्तावेज अपने प्रार्थना पत्र के साथ लगाने होंगे। अंत में उसे भी अपने तत्कालीन बॉस की मंजूरी लेनी होगी।
बता दें कि सात-आठ साल पहले सीआरपीएफ के पूर्व डीजी के. विजय कुमार ने अपने कार्यकाल के दौरान सीआरपीएफ मुख्यालय में प्रत्येक वीरवार को खुला दरबार लगाना शुरू किया था। इसमें कोई भी कर्मचारी या उनका परिवार अपनी बात रख सकता था।
इसके सार्थक नतीजे भी देखने को मिले थे। उनके जाते ही जब दिलीप त्रिवेदी ने डीजी का पदभार संभाला तो उन्होंने सबसे पहले यह खुला दरबार बंद कर दिया। इसके बाद अभी तक कई डीजी आए और चले गए, मगर किसी ने भी वह परंपरा दोबारा से चालू नहीं की।
पिछले साल जवानों को अपनी बात कहने के लिए मोबाइल एप शुरू किया गया है। बल के जवानों की कुल संख्या को देखें तो उसका पांच-दस फीसदी भी एप पर रेस्पांस नहीं आ रहा है। सीआरपीएफ के एक अधिकारी बताते हैं कि इसका कोई फायदा नहीं है।
कर्मचारी को पता है कि उसने अपनी परेशानी या किसी अफसर की शिकायत एप पर की है तो उसके खिलाफ किसी दूसरे बहाने से कार्रवाई होने में देर नहीं लगेगी। यदि किसी को डीजी से मिलना है तो उसकी राह बहुत मुश्किल है। अब नए आदेश में अफसरों के बल मुख्यालय जाने के नियम कठोर कर दिए गए हैं ऐसे में जवानों का यहां तक पहुंचने का सवाल ही नहीं उठता।
जवान को मुख्यालय जाने से पहले अपने डिप्टी कमांडेंट को आवेदन देगा, फिर वह टू-आईसी के पास से होता हुआ कमांडेंट तक पहुंचेगा। इसके बाद डीआईजी, आईजी और उसके बाद एडीजी या स्पेशल डीजी की टेबल से होता हुआ वह आवेदन डीजी तक पहुंचेगा। इनमें अगर किसी भी अफसर को लगता है कि कर्मचारी की शिकायत जायज नहीं है तो वह उसे रद्दी की टोकरी में फेंक सकता है।
पिछले कुछ दिनों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं कि जिनमें जवानों और अफसरों को कथित तौर पर प्रताड़ित किया गया है। उनकी बातें जायज होते हुए भी वे बल मुख्यालय तक नहीं पहुंच सके।
