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Congress: ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्रालय को लिखा पत्र, बोले-ईआई प्रक्रिया मजाक बनी
Sun, 10 May 2026 04:00 PM IST
नितिन गौतम
आईएएनएस, नई दिल्ली
आईएएनएस, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Sun, 10 May 2026 04:00 PM IST
सार
कांग्रेस नेता ने पूर्व पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के 2015 के लोकसभा बयान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि तब प्रकाश जावड़ेकर ने गुजरात सरकार की रैपिड ईआईए के आधार पर मंजूरी देने की मांग को खारिज कर दिया था और कहा था कि सिर्फ एक मौसम के डेटा पर आधारित अध्ययन पर्यावरणीय चिंताओं को नहीं समझ सकता।
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जयराम रमेश, महासचिव, कांग्रेस
- फोटो : ANI
विस्तार
कांग्रेस नेता और राज्यसभा सदस्य जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार डेवलपमेंट प्रोजेक्ट को लेकर केंद्र सरकार और पर्यावरण मंत्रालय पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री को एक विस्तृत पत्र लिखकर कहा कि सरकार जिस मजबूत और व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन यानी ईआईए का दावा कर रही है, वह दस्तावेजों और रिपोर्टों में कहीं दिखाई नहीं देता। जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि इस परियोजना के लिए किए गए पर्यावरणीय अध्ययन बेहद सीमित, अधूरे और वैज्ञानिक मानकों के खिलाफ हैं।
उन्होंने अपने पत्र में कहा कि 1 मई को सरकार ने 'ग्रेट निकोबार परियोजना: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न' जारी कर दावा किया था कि परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का व्यापक अध्ययन किया गया है और उन्हें प्रभावी तरीके से मैनेज किया जा रहा है। जयराम रमेश ने कहा कि उन्होंने 3 मई को इन पूछे जाने वाले प्रश्न का जवाब दिया था, लेकिन अब वे कुछ और महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखना चाहते हैं।
जयराम रमेश ने कहा कि कानून के मुताबिक अंडमान-निकोबार जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में बनने वाले बड़े पोर्ट प्रोजेक्ट्स के लिए व्यापक ईआईए जरूरी होता है। इसके तहत कम से कम तीन मौसमों का विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिए ताकि पर्यावरण और जैव विविधता पर पड़ने वाले असर का सही आकलन हो सके। उन्होंने 3 नवंबर 2009 के पर्यावरण मंत्रालय के ऑफिस मेमोरेंडम का हवाला देते हुए कहा कि 50 लाख टन प्रति वर्ष से बड़े पोर्ट प्रोजेक्ट्स के लिए व्यापक ईआईए, गणितीय मॉडलिंग और जमीनी सत्यापन अनिवार्य है।
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जयराम रमेश ने कहा कि मंत्रालय की क्षेत्र-विशिष्ट ईआईए नियमावली भी कम से कम दो मौसमों के भौतिक, रासायनिक और जैविक आधारभूत डेटा की मांग करती है। उन्होंने दावा किया कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट में इन मानकों का पालन नहीं किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि इसरो की 2021 मैपिंग में गलाथिया बे के बड़े हिस्से को इरोजन जोन बताया गया था। ऐसे में तटीय विनियमन क्षेत्र नियमों के तहत और ज्यादा विस्तृत अध्ययन जरूरी था।
जयराम रमेश ने दावा किया कि ग्रेट निकोबार परियोजना की फाइनल ईआईए रिपोर्ट खुद यह स्वीकार करती है कि आधारभूत अध्ययन सिर्फ दिसंबर 2020 से फरवरी 2021 तक यानी केवल एक मौसम में की गई थीं। उन्होंने कहा कि परिस्थितिकी और जैव विविधता का 'क्विक सर्वे' सिर्फ 14 से 22 दिसंबर 2020 के बीच हुआ, जबकि लेदरबैक कछुओं का सर्वेक्षण केवल 12 से 18 फरवरी 2021 तक चला।
उन्होंने कहा कि ईआईए रिपोर्ट में खुद माना गया है कि घने जंगलों की वजह से गहन सर्वेक्षण संभव नहीं हो सका और कई हिस्सों का अध्ययन बेहद सीमित रहा। रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया कि जंगलों में जो अभी तक सामने नहीं आया, वह और ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।
जयराम रमेश ने भारतीय प्राणी सर्वेक्षण और भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि ये अध्ययन भी कुछ दिनों या हफ्तों तक सीमित 'त्वरित मूल्यांकन' थे। उन्होंने कहा कि एएनआईआईडीसीओ द्वारा जमा आवेदन पत्र में भी स्थलीय और समुद्री ईआईए अध्ययन की अवधि बेहद कम दिखाई गई है।
उन्होंने आरोप लगाया कि इन अधूरे अध्ययनों के आधार पर पर्यावरण मंजूरी देना 'विज्ञान का अपमान' और ईआईए प्रक्रिया का मजाक है। उन्होंने कहा कि वे अब तक सरकार द्वारा दावा किए गए 'मजबूत ईआईए' और ईएमपी' को ढूंढ नहीं पाए हैं। जयराम रमेश ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी के 3 अप्रैल 2023 के फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें पर्यावरण मंजूरी में 'अनुत्तरित कमियां' की बात कही गई थी और उच्च-स्तरीय समिति (एचपीसी) गठित करने का निर्देश दिया गया था। उन्होंने सवाल उठाया कि जब पूरा पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया सार्वजनिक थी, तो फिर एचपीसी रिपोर्ट को गोपनीय क्यों रखा गया।
उन्होंने कहा कि सरकार का एचपीसी रिपोर्ट को गोपनीय बताना पारदर्शिता और जवाबदेही के खिलाफ है। उन्होंने मांग की कि अच्छी शासन व्यवस्था और सार्वजनिक बहस के हित में इस रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए। पत्र में जयराम रमेश ने कहा कि ग्रेट निकोबार की जैव विविधता दुनिया में अनोखी है और यह परियोजना इस पूरे इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा सकती है। उन्होंने क्षतिपूरक वनीकरण के तर्क को 'पूरी तरह गलत' बताया और कहा कि कई सुरक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि देश की सुरक्षा जरूरतें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना पूरी की जा सकती हैं। उन्होंने सरकार से इस परियोजना के मौजूदा डिजाइन और स्वरूप पर दोबारा विचार करने की अपील की।
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उन्होंने अपने पत्र में कहा कि 1 मई को सरकार ने 'ग्रेट निकोबार परियोजना: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न' जारी कर दावा किया था कि परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का व्यापक अध्ययन किया गया है और उन्हें प्रभावी तरीके से मैनेज किया जा रहा है। जयराम रमेश ने कहा कि उन्होंने 3 मई को इन पूछे जाने वाले प्रश्न का जवाब दिया था, लेकिन अब वे कुछ और महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखना चाहते हैं।
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जयराम रमेश ने कहा कि कानून के मुताबिक अंडमान-निकोबार जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में बनने वाले बड़े पोर्ट प्रोजेक्ट्स के लिए व्यापक ईआईए जरूरी होता है। इसके तहत कम से कम तीन मौसमों का विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिए ताकि पर्यावरण और जैव विविधता पर पड़ने वाले असर का सही आकलन हो सके। उन्होंने 3 नवंबर 2009 के पर्यावरण मंत्रालय के ऑफिस मेमोरेंडम का हवाला देते हुए कहा कि 50 लाख टन प्रति वर्ष से बड़े पोर्ट प्रोजेक्ट्स के लिए व्यापक ईआईए, गणितीय मॉडलिंग और जमीनी सत्यापन अनिवार्य है।
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जयराम रमेश ने कहा कि मंत्रालय की क्षेत्र-विशिष्ट ईआईए नियमावली भी कम से कम दो मौसमों के भौतिक, रासायनिक और जैविक आधारभूत डेटा की मांग करती है। उन्होंने दावा किया कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट में इन मानकों का पालन नहीं किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि इसरो की 2021 मैपिंग में गलाथिया बे के बड़े हिस्से को इरोजन जोन बताया गया था। ऐसे में तटीय विनियमन क्षेत्र नियमों के तहत और ज्यादा विस्तृत अध्ययन जरूरी था।
जयराम रमेश ने दावा किया कि ग्रेट निकोबार परियोजना की फाइनल ईआईए रिपोर्ट खुद यह स्वीकार करती है कि आधारभूत अध्ययन सिर्फ दिसंबर 2020 से फरवरी 2021 तक यानी केवल एक मौसम में की गई थीं। उन्होंने कहा कि परिस्थितिकी और जैव विविधता का 'क्विक सर्वे' सिर्फ 14 से 22 दिसंबर 2020 के बीच हुआ, जबकि लेदरबैक कछुओं का सर्वेक्षण केवल 12 से 18 फरवरी 2021 तक चला।
उन्होंने कहा कि ईआईए रिपोर्ट में खुद माना गया है कि घने जंगलों की वजह से गहन सर्वेक्षण संभव नहीं हो सका और कई हिस्सों का अध्ययन बेहद सीमित रहा। रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया कि जंगलों में जो अभी तक सामने नहीं आया, वह और ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।
जयराम रमेश ने भारतीय प्राणी सर्वेक्षण और भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि ये अध्ययन भी कुछ दिनों या हफ्तों तक सीमित 'त्वरित मूल्यांकन' थे। उन्होंने कहा कि एएनआईआईडीसीओ द्वारा जमा आवेदन पत्र में भी स्थलीय और समुद्री ईआईए अध्ययन की अवधि बेहद कम दिखाई गई है।
उन्होंने आरोप लगाया कि इन अधूरे अध्ययनों के आधार पर पर्यावरण मंजूरी देना 'विज्ञान का अपमान' और ईआईए प्रक्रिया का मजाक है। उन्होंने कहा कि वे अब तक सरकार द्वारा दावा किए गए 'मजबूत ईआईए' और ईएमपी' को ढूंढ नहीं पाए हैं। जयराम रमेश ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी के 3 अप्रैल 2023 के फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें पर्यावरण मंजूरी में 'अनुत्तरित कमियां' की बात कही गई थी और उच्च-स्तरीय समिति (एचपीसी) गठित करने का निर्देश दिया गया था। उन्होंने सवाल उठाया कि जब पूरा पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया सार्वजनिक थी, तो फिर एचपीसी रिपोर्ट को गोपनीय क्यों रखा गया।
उन्होंने कहा कि सरकार का एचपीसी रिपोर्ट को गोपनीय बताना पारदर्शिता और जवाबदेही के खिलाफ है। उन्होंने मांग की कि अच्छी शासन व्यवस्था और सार्वजनिक बहस के हित में इस रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए। पत्र में जयराम रमेश ने कहा कि ग्रेट निकोबार की जैव विविधता दुनिया में अनोखी है और यह परियोजना इस पूरे इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा सकती है। उन्होंने क्षतिपूरक वनीकरण के तर्क को 'पूरी तरह गलत' बताया और कहा कि कई सुरक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि देश की सुरक्षा जरूरतें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना पूरी की जा सकती हैं। उन्होंने सरकार से इस परियोजना के मौजूदा डिजाइन और स्वरूप पर दोबारा विचार करने की अपील की।
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