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77 साल के शंकर सिंह वाघेला को नहीं संभाल पाई कांग्रेस

Thu, 27 Jul 2017 04:39 PM IST
शशिधर पाठक/ नई दिल्ली
शशिधर पाठक/ नई दिल्ली Updated Thu, 27 Jul 2017 04:39 PM IST
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Congress can not handle Gujarat leader Shankarsinh Vaghela
shankersinh vaghela - फोटो : PTI

गुजरात के कद्दावर नेता शंकर सिंह वाघेला ने कांग्रेस पार्टी को छोडऩे से पहले जिस वाक्य का प्रयोग किया, कांग्रेस के भीतर भी तमाम नेता उसे सही मान रहे हैं। वाघेला ने अपने भीतर के दर्द को कटाक्ष का रूप देते हुए कहा था-विनाश काले विपरीत बुद्धि। कांग्रेस पार्टी के एक प्रतिष्ठित महासचिव का कहना है कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

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सूत्रों का कहना है कि शंकर सिंह वाघेला को यदि कांग्रेस पार्टी नहीं संभाल पाई तो यह इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। पार्टी को इसे दूर करना चाहिए। वहीं गुजरात राज्य के प्रभारी अशोक गहलोत के पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं है। इस तरह से लगातार अपनी उपेक्षा से पीडि़त शंकर सिंह वाघेला ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को छोड़ दिया है।
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कांग्रेस को पता था-
कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को काफी पहले से पता था कि बाघेला को यदि गुजरात में आगामी विधानसभा चुनाव का पार्टी का चेहरा न बनाया गया तो वह पार्टी छोड़ सकते हैं। सूत्र बताते हैं कि वाघेला के विरोधी कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने इसे हथियार की तरह इस्तेमाल किया और तिकड़म करके ऐसा नहीं होने दिया। कुछ दिन पहले गुजरात के प्रभारी अशोक गहलोत से इसके बाबत पूछा गया तो गहलोत ने कहा कि वाघेला को मनाने की कोशिश चल रही है।
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हालांकि गहलोत ने कहा कि पार्टी गुजरात में किसी को मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं घोषित करेगी। चेहरे का फैसला विधानसभा चुनाव के बाद विधायक दल की बैठक में किया जोगा। वहीं वाघेला इसे अपनी आखिरी राजनीतिक बताकर हर हाल में पार्टी का मुख्यमंत्री पद का भावी चेहरा घोषित होना चाहते थे।

कांग्रेस के एक बड़े धड़े का मानना है कि वाघेला पार्टी के दमदार नेता थे

Congress can not handle Gujarat leader Shankarsinh Vaghela
shankersinh vaghela - फोटो : PTI

वाघेला समर्थक उन्हें पंजाब का कैप्टन अमरिंदर सिंह बताते हैं। कांग्रेस के एक बड़े धड़े का भी मानना है कि वाघेला पार्टी के दमदार नेता थे और उनके रहने पर गुजारत में इस बार भाजपा को जोरदार चुनौती दी जा सकती थी। ऐसे में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की टीम के सदस्य तोल-मोल में लगे थे।


वाघेला को रोकने के लिए विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी की सीटों में उनकी चलने का आश्वासन दिया जा रहा था।  पार्टी दलील दे रही थी कि वाघेला को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घषित किए जाने के बाद वरिष्ठ नेता शक्ति सिंह गोहिल, भरत सिंह सोलंकी और अर्जुन मोढवढिय़ा नाराज हो सकते हैं।

इस आंतरिक भितरघात का बुरा असर पड़ सकता है। कांग्रेस के नेताओं को उम्मीद थी इस तरह से वाघेला मान जाएंगे। वहीं, कांग्रेस की नब्ज से वाकिफ वाघेला इस तरह के किसी राजनीतिक झांसे में आने के लिए तैयार नहीं हुए। वह पार्टी छोडऩे की स्थिति में आने से पहले अपना हर दांव भी अजमाए। कांग्रेस उपाध्यक्ष और अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी मिले, लेकिन बात नहीं बनी तो पार्टी छोड़ दी।



शंकर सिंह वाघेला का कांग्रेस छोडना जहां पार्टी के बुरी खबर है, वहीं भाजपा ने गुजरात विधानसभा के चुनाव को लेकर राहत की सांस ली है। ऐसे में समझा जा रहा है कि 17 साल पहले भाजपा को छोड़कर कांग्रेस में आए वाघेला जल्द ही एक मोर्चे का गठन कर सकते हैं। वह एनसीपी के शरद पवार, जद(यू), हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी आदि को एक मंच पर लाकर कांग्रेस और भाजपा को चुनौती दे सकते हैं। इसके लिए उन्होंने प्रयास भी शुरू कर दिया है।  

वाघेला के एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल से मुलाकात की भी खबर है। हालांकि वाघेला यह कोशिश कांग्रेस की राह में रोड़ा और भाजपा की जीत आसान करने वाली ही मानी जा रही है। वहीं कांग्रेस का एक धड़ा वाघेला की बगावत को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के साथ वाघेला के गुप्त समझौते की हवा दे रहा है।

क्या है वाघेला की हैसियत-
शंकर सिंह वाघेला गुजरात में बापू के नाम से मशहूर हैं। गुजरात की स्थानीय राजनीति, सामाजिक समीकरण समेत अन्य स्थितियों के पारखी हैं। 40 से अधिक साल से गुजरात की राजनीति में सक्रिय वाघेला 90 के दशक में राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और उन्हें कभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का राजनीतिक गुरू माना जाता था। वाघेला को राजनीतिक के हर तिकड़म का पूरा ज्ञान है और उन्हें हर स्थिति काट भी आसानी से समझ में आ जाती है। पूरे गजरात में उनका जनाधार फैला हुआ है और जन नेता के तौर पर जाने जाते हैं।

आसान हुआ मिशन 150
भाजपा गुजरात के भावी विधानसभा चुनाव में मिशन 150 का लक्ष्य लेकर चल रही थी, लेकिन वाघेला उसकी राह में बड़ा रोड़ा माने जा रहे थे। पाटीदार आंदोलन, ऊना में दलितों के साथ अत्याचार ने भी सत्तापक्ष को बैकफुट पर धकेल दिया था। लेकिन अब माना जा रहा है कि इसका भाजपा को लाभ मिलना तय है। भाजपा के लिए 2017 में गुजरात विधानसभा का चुनाव जीतना वैसे भी काफी अहम माना जा रहा है।

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